औवेसी हाज़िर हैं साहब, किसान नाराज़ हैं तो क्या…?

क्या लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं भारत के प्रधानमंत्री? इस मुल्क के अमन चैन को संघी – मुसंघी मिलकर खत्म करना चाहते हैं

क्या लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं भारत के प्रधानमंत्री,एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन औवेसी की टीम

इस मुल्क के अमन चैन को संघी और मुसंघी मिलकर खत्म करना चाहते हैं

एस एम फ़रीद भारतीय

एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन औवेसी की टीम अब ज़मीन पर भी उतरेगी क्यूंकि कुछ राज्यों मैं चुनाव है, ग़ैर चुनावी राज्यों के लिए अभी वक़्त नहीं है, औवेसी ब्रदर की टीम को सड़क पर उतरने के लिए मुद्दा भी दिया जायेगा, क्यूंकि यही तो आज राजनीति का खेल है, किसान एकता ज़िंदा नहीं रहने देंगे.

भाजपा चुनाव जीतने के लिए भी नफ़रत का सहारा लेती है और चुनाव बाद नफरत का कारोबार करती है

दुनियां के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क मैं सिर्फ़ भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है जो चुनाव जीतने के लिए नफ़रत का सहारा तो लेती ही है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद भी नफ़रत के कारोबार को जारी रखते हुए लोकतंत्र की बुनियाद को खोखला कर रही है

लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं भारत के प्रधानमंत्री?

अभी टाइम मैगजीन ने अपनी मैगज़ीन में यही मज़ाक उड़ाने वाली ख़बर के साथ भारत के प्रधानमंत्री को अपनी मैगज़ीन में जगह देते हुए लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताया है, साथ ही भारतीय मीडिया पर भी लानत मलानत की है.

बात हो रही है औवेसी ब्रदर की, तब वो अपनी राजनीति के लिए लाशों के ढेर का इंतज़ार कर रहे हैं ये लाशें किसकी होंगी सत्ता किसको मिलेगी, क्यूं ये गंदी राजनीति की जा रही है ये सब मुझसे बेहतर आप लोग जानते हैं, संघी और मुसंघी मिलकर इस मुल्क के अमन चैन को अपनी कट्टरता से ख़त्म करना चाहते हैं जो मुमकिन नहीं है.

आज किसान नेता खुले मंच पर कबूल भी कर चुके हैं कि मुजफ्फरनगर काण्ड को नफ़रत के बीज के रूप में इस्तेमाल कर राजनीति के सत्ता की फ़सल उगाई गई. आज वक़्त बदल चुका है अब किसान किसान है कोई जाति धर्म नहीं, हर हर महादेव के साथ अल्लाहु अकबर के नारे को बुलंद करके दिखा भी दिया कि हम ज़्यादातर किसान एक हो चुके हैं जो रह गये हैं वो भी समझ जायेंगे.

अब इस बार ज़रूरत थी हिंदू मुस्लिम करने के लिए किसी मशहूर चेहरे की, तब औवेसी ब्रदर और उनके मजनूओं की टीम है ना, अब यूपी मैं धरना भी होगा, प्रदर्शन भी होंगे, मंच से ज़हरीले भाषण भी किये जायेंगे, औवेसी हाज़िर है साहब किसान नाराज़ हैं तो क्या, चुनाव वाला राज्य है तुम बेफ़िक्र रहो हम हैं ना आपके अपने…?

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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