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जिस काकी मां के घर का ताला खोल कर उपन्यास पढ़ता था बचपन में, वे नहीं रहीं

काकीमां का निधन हो गया। काकीमां यानी अवनी काका की पत्नी। करीब दो महीने बीत चुके। उनके बाद महीने भर पहले उनकी जेठानी तुलसी जी ने भी प्राण त्याग दिए। वे आंखों से देख नहीं सकती थीं, लेकिन जब कोरोना काल से पहले मैँ उनसे मिलने गया था रुद्रपुर ट्रांजिट कैम्प के उनके घर में, तब मेरी आवाज सुनकर बहुत खुश हो गयी थीं।

भारत विभाजन की त्रासदी में अतुल काका और अवनी काका अकेले बसन्तीपुर आ पहुंचे थे। तुलसी काकी का शादी से पहले परिवार में नाम दर्ज कराकर गांव के मातबर लोगों ने उनकी जमीन एलाट कराई थी।

वे हमारी रिश्तेदार नहीं थीं। गांव में हमारा और रणजीत के दो ही परिवार पूरे दिनेशपुर इलाके में जैशोर से आये परिवार रहे हैं। बसंतीपुर में बाकी परिवार खुलना और बरीशाल जिले से हैं। लेकिन विभाजनपीड़ित आंदोलनकारियों का यह गांव तब एक संयुक्त परिवार था।

अवनी काका और अतुल काका हमारे साथ ही रहते थे।

मेरे जन्म से पहले अतुल काका का विवाह हो गया और तुलसी काकी के आने के बाद हमारे क्वार्टर के साथ लगे क्वार्टर में ही बस गए।

अवनी काका का विवाह देवला दीदी, मीरा दीदी, विधु दादा की शादी के बाद 1961 में हुई। सबसे पहले देवला दीदी, फिर हमारी दीदी मीरा दीदी की शादी हुई। इन दोनों की शादी बचपन की मेरी पहली यादें हैं।

विधुदा की शादी बंगाल में हुई। भाभी उनसे लम्बी थीं, जिन्हें आज भी लम्बी भाभी कहा जाता है।

अवनी काका की शादी में पहली बार हम बाराती बने। करीब 5 किमी दूर आनँदखेड़ा दो नम्बर में गया बारात पैदल। दूल्हा शायद रिक्शे में थे। बाद में उसी रिक्शे में दुल्हन आयी।

यह शायद नवम्बर या दिसम्बर महीने की बात थी। मुझे मेरे ताऊ जी ने एक काला कोट खरीदकर दिया था, जिसे मैं सर्दी हो या गर्मी या फिर वर्षा, हर मौसम में पहना करता था। वही कोट पहनकर में बारात गया।

तब बारात के रातोंरात लौटने की प्रथा न थी। गांवों में पक्के मकान न थे। झोपड़ियों में बारातियों के ठहरने का इंतजाम न था। जाड़े की रात पुआल के ढेर में घुस कर बिताई। भोर तड़के काकी को लेकर हम पैदल गांव लौटे।

अवनी काका आठवीं तक पढ़े थे। दिनेशपुर में तब बंगाली उदवास्तु समिति संचालित स्कूल था, जो 1965 में जिला परिषद हाई स्कूल बना। समिति का स्कूल जूनियर हाई स्कूल था। आगे पढ़ने के लिए बाहर जाने की जरूरत थी, जिसके लिए पैसे नहीं थे।

बसंतीपुर में तब बंगला प्राइमरी स्कूल था। बाहर से टीचर बुलाने की जरूरत पड़ती थी।

मेरे चाचा डॉ सुधीर विश्वास पढ़ाते थे, लेकिन वे 1960 में असम चले गए। वहां बंगाली विस्थापितों के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी। असम में 1960 के दंगों के दौरान दंगापीड़ितों की मदद के लिए वहां गए पिताजी ने चाचाजी को वहां भेज दिया।

फिर बुजुर्ग हरि ढाली पढ़ाने लगे। उनसे हमने पटरे पर गोल गोल बनाना सीखा। तब खड़िया मिट्टी से लिखना होता था। ओस पड़ती थी खूब, उसी पानी से पटरे को पोंछना होता था। हमारी बंगला पढ़ाई की यह शुरुआत इस तरह हुई।

फिर मैडम ख्रिष्टि, देवला दीदी और मीरा दीदी के साथ हम छोटी सी बरसाती नदी के पार चित्तरनजनपुर कन्या प्राइमरी स्कूल जा पहुंचे 1960 में। मैडम ख्रिष्टि का तबादला हुआ तो उन्होंने बसन्तीपुर के बच्चों को हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल में पीताम्बर पन्त के हवाले कर दिया।

इसी बीच देवला दी और मीरा दी की पांचवीं में पढ़ते हुए 1961 में शादी हो गई।

जब हम चित्तरजनपुर में आधी कक्षा के छात्र थे, तभी अवनी काका को बसंतीपुर स्कूल का अध्यापक बना दिया गया। पिताजी ने अवनी काका के आगे की पढ़ाई पर जोर दिया था। लेकिन काका की दिलचस्पी टीचरी में थी।

इसी बीच 1961 में ही अवनी काका की शादी हो गयी। काकी बंगाल से सातवीं तक पढ़ी थीं। उनके पास किताबों का खजाना था।

उन दिनों तराई में बसे बंगालियों में भी बंगाल और बांग्लादेश की तरह शादी में बांग्ला उपन्यास या कविता की पुस्तकें उपहार में देने का चलन था।

नई दुल्हनों के पास पढ़ी लिखी हो या न हों, उपहार में मिले ऐसी पुस्तकों का खजाना होता था। हम इन सभी भाभियों, चाचियों के छोटे मोटे काम करके उनकी किताबों को पढ़ ही लिया करते थे।

काका गांव में सबसे पढ़े लिखे थे तो काकी भी पहली पीढ़ी लिखी बहु बन गईं। उनकी शादी के बाद बसंतीपुर स्कूल सरकारी बना और काका को ट्रेनिंग के लिए भेज दिया गया। इस अवधि में काकी ने भी स्कूल चलाया।

अवनी काका लम्बे चौड़े कद काठी के थे। वे बसंतीपुर जात्रा पार्टी में रुआबदार राजा महाराजा, सुल्तान, बादशाह का रोल करते थे। उन्हें और हाजू साना के अभिनय का यह जलवा था कि दोनों को बॉम्बे में फ़िल्म में काम करने का प्रस्ताव भी मिला। लेकिन पैसे न होने के कारण वे नहीं गए।

दूसरी तीसरी कक्षा में आते न आते मुझे उपन्यास पढ़ने का चस्का लग गया था। शुरुआत बंगला साहित्य से हुई। सबसे पहले शरत चन्द्र का उपन्यास श्रीकांत से हुआ। फिर चाचाजी के सौजन्य से अंग्रेजी में गोर्की की मदर, पर्ल बक की गुड़ अर्थ,गलसवर्दी की ग्रोथ दी साइल, विक्टर ह्यूगो की हंच बैक ऑफ नोटरदाम, मार्क ट्वेन आदि के उपन्यास।

बचपन ऐसा था कि बिना पढ़े चैन नहीं आता था। पढ़ने के लिए तब हम आग में भी कूदने को तैयार रहते थे।

ट्रेनिंग के दौरान अवनी काका बाहर थे और काकी अक्सर मायके में जाती थी। उनके पास शरत, बंकिम, समरेश बसु, आशापूर्ण देवी, विमल मित्र जैसों के उपन्यास थे।

पढ़ने के नशे में मैं उनके घर का ताला साइकिल की सीक से खोलने लगा। एक-एक किताब पढ़कर जहां की ठान रख देता था। कभी पकड़ा नहीं गया।

चाचा और चाची दोनों अब नहीं हैं। अवनी काका का तबादला ट्रांजिट कैंप रुद्रपुर हो गया। वे टीबी के मरीज बन गए और 1984 में गेठिया टीबी अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया।

चाची चार लड़कों के साथ रुद्रपुर ट्रांजिट कैम्प में ही बस गयीं। उनका बड़ा बेटा प्रताप भी पिता की तरह अध्यापक हैं। बाकी तीनों भाई अपने-अपने कामकाज में बिजी हैं।

पलाश विश्वास

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