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कांग्रेसियों को क्यों लग रहा है उनके कप्तान राहुल गांधी फार्म में आ गए हैं?

राहुल गांधी ने देर से सही मगर हिम्मत दिखाई. छवि निर्माण आज की राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण हो गया है ? बड़े नेताओं की नकली छवि के चक्कर में नहीं आते राहुल गांधी.

राहुल गांधी ने देर से सही मगर हिम्मत दिखाई। राजस्थान में भी भारी हलचल है।

Why do Congressmen feel that their captain Rahul Gandhi is back in form?

क्या 80 साल के कैप्टन अमरिंदर सिंह केवल टाइम पास कर रहे थे?

फार्म केवल बैट्समेन का नहीं होता कप्तान का भी होता है। कप्तान जब फार्म में आ जाता है तो उसे पहले से आभास होना शुरू हो जाता है कि कौन बैट्समेन क्रीज पर खाली टाइम पास करेगा और कौन रन बनाकर टीम को जिताएगा। कांग्रेसियों को लग रहा है कि उनके कप्तान राहुल गांधी फार्म में आ गए हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह (Capt Amarinder Singh) को हटाकर उन्होंने एक साहसिक साहसिक निर्णय (bold decision) लिया। 80 साल के अमरिन्दर केवल टाइम पास कर रहे थे। विधायक उनके साथ नहीं थे, जनता से वे मिलते नहीं थे और कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई होती नहीं थी। केवल गोदी मीडिया से मिलकर वे अपनी इमेज बनाते रहते थे।

छवि निर्माण आज की राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण हो गया है ? | Why image building has become important in today’s politics?

ये इमेज या छवि आजकल बहुत खास चीज हो गई है। असलियत कुछ भी हो अगर आपने राजनीति में एक धीर गंभीर छवि बना ली है तो आप अपने साथ के कई दूसरे लोगों से बहुत आगे निकल जाते हैं। हमले कम होते हैं और सम्मान ज्यादा होता है। उत्तर भारत में यह छवि बहुत महत्वपूर्ण होती है। धीर गंभीर के साथ वीर भी लग जाता है। कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने वह छवि बना रखी थी। इसलिए चाहे पुराने प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा (Pratap Singh Bajwa) हों या सुनील जाखड़ (Sunil Jakhar) या नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) मीडिया उन्हें अमरिन्दर सिंह के सामने हल्का, बौना, मसखरा ही बताता रहा।

बड़े नेताओं की नकली छवि के चक्कर में नहीं आते राहुल गांधी | Rahul Gandhi does not fall in the trap of fake image of big leaders.

लेकिन राहुल गांधी इस छवि निर्माण को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। उनके कांग्रेस में विरोध का सबसे बड़ा कारण ही यह है कि वे बड़े नेताओं की नकली छवि के चक्कर में नहीं आते। सहज, सामान्य, मानवीय गुणों से भरे लोग उन्हें ज्यादा पसंद आते हैं। हमारे यहां छवि कैसे महान बनती है और कैसे जमीन में मिला दी जाती है इसके कई उदाहरण हैं।

एच डी देवगौड़ा का मीडिया ने बहुत मजाक उड़ाया, उनके एक ऊंघते हुए फोटो को लेकर। लेकिन लंबे कार्यक्रमों, संसद, विधानसभाओं में जाने कितने बड़े नेता झपकी मार लेते हैं। बहुत सचेत नेताओं, आडवानी, सोनिया गांधी जैसों को छोड़कर। लेकिन किसकी फोटो खींचना हैं, किसको टीवी में दिखाना है यह मीडिया बहुत चालबाजी से तय करता है।

खैर, पहले देवगौड़ा की बात सुनिए। देवगौड़ा आतंकवाद के भीषण समय में प्रधानमंत्री बने थे और बनने के बाद फौरन कश्मीर दौरे पर आए।

देवगौड़ा का कश्मीर दौरा क्यों महत्वपूर्ण था? Why was Deve Gowda’s visit to Kashmir important?

उनका कश्मीर दौरा क्यों महत्वपूर्ण था? इसलिए कि उनसे पहले पांच साल प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंह राव एक बार भी कश्मीर नहीं गए थे। यही छवि का खेल है। नरसिंह राव आज भी गोदी मीडिया के पसंदीदा प्रधानमंत्री हैं। वही धीर, गंभीर छवि। और देवगौड़ा जिन्होंने कश्मीर जाकर सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने से लेकर वहां पाक समर्थित आतंकवादियों के समर्पण, बातचीत की प्रक्रिया की शुरुआत जैसी पहल की वे कभी इसका क्रेडिट नहीं पा सके।

फौज के जनरल जानते हैं कि कश्मीर में किसकी मेहनत ज्यादा कामयाब रही मगर वे भी चल रहे नरेटिव (कहानी) से हटकर पूरा सच बताने का जोखिम कभी नहीं ले पाते।

ये छवियां गढ़ी जाती हां और खुद मीडिया भी जो अक्सर कई चीजों को फर्स्ट हेंड देखता है वह भी इसके प्रभाव से बच नहीं पाता।

एक मजेदार बात बताते हैं। कभी-कभी हम अपने सहयोगी पत्रकारों से कहते थे कि ये जो खबर आपने दी है, ठीक है। मगर इस पर यकीन मत कर लेना! पत्रकार पचास अर्द्धसत्य लिखता है और उनमें से कुछ पर वह खुद ही विश्वास करने लगता है।

तो इस इमेज मेकिंग को राहुल बहुत अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने यूपीए के दस साल में देखा है कि किस तरह नकली कहानियों से कुछ बड़े कांग्रेसी नेता सोनिया गांधी को बेवकूफ बनाते थे। दस साल की सरकार जिसके खाते में जनता के लिए किए गए कामों की लंबी फेहरिस्त थी इस तरह ढह गई। प्रधानमंत्री मोदी इस मामले में अलग हैं। उनकी कोई झूठी इमेज नहीं है। जैसे हैं वैसे दिखते हैं। इसलिए उन्हें भटकाना संभव नहीं है।

भाजपा में ही वाजपेयी इस झूठी इमेज के शिकार थे। नतीजा वे इंडिया शाइनिंग को सही समझने लगे थे। मोदी जी सारी हकीकतें जानते हैं। इसलिए चुनाव आते ही वे अपने असली मुद्दे हिन्दू-मुसलमान पर आ जाते हैं। इसी पर वे उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ेंगे। हारें-जीतें अलग बात है मगर वे यह जानते हैं कि विकास और नए इंडिया की बातें खाली गोदी मीडिया के खेलने के लिए हैं। चुनाव के लिए श्मशान-कब्रिस्तान, दीवाली रमजान ही करना है।

इस इमेज मेकिंग की कहानियां जितनी सुनाएं कम हैं। एक फिल्म इंडस्ट्री से सुनाकर बस करते हैं। फिल्मों में दिलीप कुमार की एक गंभीर छवि, देवानंद की रोमांटिक और इस महान त्रयी के राजकपूर की मसखरे वाली। जबकि सिर्फ इन तीनों में ही नहीं, ऑल टाइम पूरे फिल्मी जगत में राजकपूर सबसे प्रगतिशील और जन सिनेमा बनाने वाले फिल्मकार थे। मगर इमेज अमिताभ की भी ऊंची है, और राजकपूर जोकर वाली अपनी इमेज से कभी पीछा नहीं छुड़ा पाए। सिद्धू तो क्रिकेट में भी लिमिटेड शाटों के बैट्समेन थे। उनसे तो किसी की तुलना ही नहीं। उनकी इमेज क्या यह आज की है? भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया था। समाज के विशिष्ट व्यक्तियों की श्रेणी में। गुस्से में बैट से पिटाई करने के आरोप में हत्या का मुकदमा चला। अजहर की कप्तानी के खिलाफ बगावत करके इंग्लैंड से भाग आए थे। कोई एक कहानी है।

लेकिन बड़ा कैनवास यह है कि हमाम में सब नंगे हैं। किसी का नाम नकारात्मकता में इंगित करना ठीक नहीं। मगर राजनीति और सार्वजनिक जीवन भरा है ऐसे लोगों से। नवजोत सिंह सिद्धू जैसे भी हों मगर एक बात है कि वे कंबल ओढ़कर घी पीने वालों में से नहीं हैं। क्रिकेट में फील्डिंग करना नहीं आती थी तो नहीं आती थी। इसी तरह राजनीति में नफासत नहीं आती तो नहीं आती। बैटिंग में भी नफासत नहीं थी उजड्डपन था। लेकिन क्रीज पर अड़ जाते थे। यहां भी ऐसे ही अड़ गए।

उन्हें बनाया ही इसीलिए गया था। एक फाल्स इमेज को तोड़ने के लिए छवि विध्वसंक चाहिए था। अगर दोस्त बुरा न मानें तो याद दिला दें कि ऐसी ही छवि मोरारजी देसाई की भी खूब मेहनत से बनाई थी। मगर राजनारायण ने सरकार के साथ उनकी छवि भी तहस-नहस कर दी। और वे तो दूसरे घटक के थे अपने समाजवादियों में भी भारी उठा-पटक करके किसान नेता चरण सिंह के हनुमान बन गए तो भारतीय राजनीति शिव जी की बारात है। कई छवि भंजक और कई नकली छवियों वाले यहां रहे हैं।

मीडिया मूर्खता को भी बौद्धिकता बना देता है

खास बात यह है कि सिद्धू को मुख्यमंत्री नहीं बनाना था। नहीं बनाया। हालांकि सिद्धू जैसी छवि वाले नेता सीएम भी रहे हैं, मंत्री भी रहे हैं और हैं भी। मगर मीडिया दुरुस्त रखते थे। उनका बड़े से बड़ा कांड भी मीडिया या तो दबा देता है या इस खूबसूरती से पेश करता है कि मूर्खता भी बौद्धिकता बन जाती है।

मामला पूरा विधायकों की नाराजगी का था। मुख्यमंत्री का किसी से नहीं मिलने और अफसरों एवं गोदी मीडिया के भरोसे चुनाव में जाने का था। पिछली बार 2007 में भी ऐसा ही हुआ था। अमरिन्दर हारे थे। और दस साल तक कांग्रेस वापसी नहीं कर पाई थी। सिद्धू ने जवाब नहीं दिया अच्छा किया। अमरिन्दर ने उन्हें पाकिस्तानी और देशद्रोही कहकर अपना कद और कम कर लिया।

राहुल ने देर तो की मगर हिम्मत सही दिखाई। राजस्थान में भी भारी हलचल है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत संतुलित प्रतिक्रियाएं देने में लगे हैं। इस धमाके की उम्मीद किसी को नहीं थी। अब यह राहुल पर निर्भर करता है कि वे पार्टी हाईकमान के इस इकबाल को बना कर रखते हैं या बागियों को फिर कुछ भी कहने और करने की छूट दे देते हैं।

शकील अख्तर

(देशबन्धु)

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