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तुम्हें तो शर्म कभी नहीं आएगी, मगर देश शर्मसार है तुम्हारी पनौती की वजह से मनु

 यह विसंगति और दोहरापन नहीं है, यह उस सामाजिक आचरण की संगति में है जिसका आधार वह कुत्सित विचार है जिसने भारत की औरतों के विरुद्ध प्रावधानों का पाशविक सूत्रीकरण किया है – जिसे समाज के प्रभु वर्गों ने खाद पानी देकर लहलहाते हुए रखा है।

How did so many Dalit girls reach the Olympics?

बुधवार को टोक्यो में भारत की लड़कियां (Indian girls in Tokyo) जब जी-जान से अर्जेंटीना की टीम से जूझ रही थीं – शानदार मुकाबले में न जीत पाने के अफ़सोस में पूरा देश था। लड़कियां इस सबके बावजूद भारत के लिए कांस्य-पदक लाने की सामर्थ्य और हौंसला जुटा रही थीं ठीक उसी वक़्त मनु हरिद्वार में नंगा होकर नाच रहा था। इतिहास में पहली बार सेमीफइनल में पहुंचाने वाली इस टीम को गालियां बक रहा था। उनमें से एक जबरदस्त खिलाड़ी वन्दना कटारिया के घर की दीवार पर आतंकवादी लिख रहा था। त्रिपुण्ड, जनेऊ और चुटिया धारे पैदा होने से मौत तक हर मौके पर खा-खाकर मील भर की तोंद धारे बैठा मनु खुद भले गिल्ली डण्डा तक न खेल पाए – उसे बड़ी दिक्कत है कि आखिर इत्ती सारी संख्या में दलितों की लड़कियां ओलम्पिक खेलने कैसे पहुँच गयीं।

यह तब था जब टोक्यो ओलम्पिक में भारत के पदकों (India’s medals in Tokyo Olympics) का सूखा – इन पंक्तियों के लिखे जाने तक – लड़कियां ही दूर कर रही थीं। मणिपुर की सुखोमी मीराबाई चानू, तेलंगाना की पीवी सिंधु, असम की लवलीना बोर्गोहैन अपने-अपने खेलों वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन और बॉक्सिंग में मैडल जीत चुकी हैं और हरियाणा, पंजाब और बाकी प्रदेशों की गुरजीत कौर, रानी रामपाल और निशा अहमद वारसी आदि-आदि खिलाड़िनो वाली महिला हॉकी की टीम ओलम्पिक सेमीफाइनल में पहुँचने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं। अभी भी मैडल की उम्मीद सहेजे हुए है। पुरुष हॉकी में एक पदक मिला है – पहलवानी में भी एक रजत आया है। लड़कों के एक दो खेलों में भी अभी कुछेक संभावनाएं है। मगर जिस जिद और आत्मविश्वास के साथ इस ओलम्पिक में लड़कियों ने झण्डा लहराया है वह अब तक के सारे ओलम्पिक मुकाबलों की तुलना में बेमिसाल है।

यह इसलिए और ज्यादा असाधारण है कि वे उस देश की प्रतिनिधि हैं जिस देश के एक बड़े हिस्से में उनका पैदा ही होना शोक का विषय होता है। जिस देश में उनकी कोख में ही पहचान करके पैदा होने के पहले वहीं निबटा देने के पुराने और आधुनिक तरीके अपनाना एक सामान्य बात समझी जाती है। यह दावा करना कि “अरे यह सब पुरानी बात हो गयी है” उस शर्मनाक और आपराधिक सच्चाई से मुंह चुराना होगा जो ठीक उस वक़्त, जब लड़कियां जीत रहे थीं तब भी अपने नृशंशतम रूप में एक के बाद दूसरी घटना के रूप में सामने आ रहे थे।

और यह सिर्फ कहने की बात नहीं है। लड़कियां जब टोक्यो में मैडल जीतने के लिए अपनी जान झोंक रही थीं ठीक उसी समय एक मंदिर में फकत 9 वर्ष की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद पुजारी की अगुआई में उसके जलाये जाने की खबर आ रही थी। और यह घटना किसी गाँव-टोले की नहीं थीं जहां यह अभी भी आम बात है; जहां से हर घंटे औसतन 4 बलात्कारों और इससे कई गुना महिला उत्पीड़न की रिपोर्ट्स दर्ज की जाती हैं। यह घटना नरेन्द्र मोदी सरकार की राजधानी दिल्ली में घट रही थी जिसकी पुलिस सीधे गृह मंत्री अमितशाह के नियंत्रण में है। जब मैडल जीतने जा रही लड़कियां अपना-अपना पासपोर्ट और जरूरी कपड़ों का बैग भर रहे थीं तकरीबन ठीक उसी समय उन्हीं की सिस्टर्स केरल की नन्स को योगी के उत्तरप्रदेश के झांसी रेलवे स्टेशन पर कुछ हुड़दंगियों द्वारा साम्प्रदायिक गाली गलौज का निशाना बनाकर अपमानित किया जा रहा था। उन्हें जबरदस्ती रेल से उतारा जा रहा था। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड और दूसरे इलाकों से बर्बरता को भी शर्मिन्दा करने वाली यातनाओं की खबरें आ रही थीं।

इसी का दूसरा रूप था जो इंटरनेट पर पीवी सिंधु की जाति (Caste of PV Sindhu) ढूंढ रहा था। हॉकी टीम की जानदार खिलाड़िन निशा के खेल पर नेट पर पहले धूम मचा रहा था मगर जैसे ही उसके पूरे नाम निशा अहमद वारसी की जानकारी मिली वैसे ही धीमी आवाज कर दूसरे खेल तलाश रहा था।

यह विसंगति और दोहरापन नहीं है, यह उस सामाजिक आचरण की संगति में है जिसका आधार वह कुत्सित विचार है जिसने भारत की औरतों के विरुद्ध प्रावधानों का पाशविक सूत्रीकरण किया है – जिसे समाज के प्रभु वर्गों ने खाद पानी देकर लहलहाते हुए रखा है। जब तक इसकी संहारक मारकता को चीन्हकर उसे जड़ सहित उखाड़ फेंकने का काम नहीं होगा तब तक लड़कियां ओलम्पिक खेलों और दूसरे मुकाबलों में मैडल जीतने के बाद भी कठुआ और पुरानी नांगली के हादसों में हारती रहेंगी। अपनी दुनिया भर की हमनस्ल महिलाओं की तुलना में भारत की महिलाओं की हालत को और ज्यादा बदतर बनाने वाले इस सोच विचार की शिनाख्त सिर्फ औरतों के लिए ही जरूरी नहीं है – इस समाज को उसकी बेड़ियों से आजाद कर आगे की तरफ ले जाने की कामना करने वाले हर इंसान के लिए आवश्यक है। इसका नाम है मनुस्मृति। यही है जो स्त्री को सदासर्वदा के लिए बेड़ियों में बाँधने का निर्देश देते हुए प्रावधान करती है कि;

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।

पुत्रो रक्षति वार्धक्ये न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥”

(स्त्री को बचपन में पिता, युवावस्था में पति और जब उसका पति मर जाये, तो पुत्र के नियंत्रण में रहना चाहिए। स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं रहनी चाहिए। )

और उसे घृणित बताते हुए यह भी कहती है कि;

अशील: कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जित :।

उपचर्म: स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पत्ति :।।”

(इतनी गंदी बात है कि हिंदी में अनुवाद करने का मन भी नहीं होता। )

मनुस्मृति यहीं तक नहीं रुकती। शूद्रों को मनुष्यत्व से वंचित करने वाली यह पोथी स्त्री को शूद्रातिशूद्र का दर्जा देती है और फतवे जारी करती है कि “स्त्रियों में आठ अवगुण हमेशा होते हैं। जिसके चलते उनके ऊपर विश्वास नहीं किया जा सकता है। वे अपने पति के प्रति भी वफादार नहीं होती हैं। इसी के साथ उसे आदेश देते हुए मनु कहते हैं कि “पति चाहे जैसा भी हो, पत्नी को उसकी देवता की तरह पूजा करनी चाहिए। किसी भी स्थिति में पत्नी को पति से अलग होने का अधिकार नहीं है। कि पति चाहे दुराचारी, व्यभिचारी और सभी गुणों से रहित हो तब भी साध्वी स्त्री को हमेशा पति की सेवा देवता की तरह मानकर करनी चाहिए।

यूं तो यह पूरी की पूरी किताब ही इस प्रकार की आपराधिक उक्तियों से भरी हुयी है। इनमें से कुछ ही को देखें तो उनमें लिखा है कि;

कि पति पत्नी को छोड सकता हैं, सूद (गिरवी) पर रख सकता है, बेच सकता है, लेकिन स्त्री को इस प्रकार के अधिकार नहीं हैं। किसी भी स्थिति में, विवाह के बाद, पत्नी सदैव पत्नी ही रहती हैं। कि संपत्ति और मिल्कियत के अधिकार और दावों के लिए, शूद्र की स्त्रियां भी “दास” हैं, स्त्री को संपत्ति रखने का अधिकार नहीं हैं, स्त्री की संपत्ति का मालिक उसका पति, पुत्र, या पिता हैं। कि असत्य जिस तरह अपवित्र हैं, उसी भांति स्त्रियां भी अपवित्र हैं, यानी पढने का, पढाने का, वेद-मंत्र बोलने का या उपनयन का अधिकार स्त्रियों को नहीं हैं। कि स्त्रियां नर्कगामिनी होने के कारण वह यज्ञ कार्य या दैनिक अग्निहोत्र भी नहीं कर सकती। कि यज्ञ कार्य करने वाली या वेद मंत्र बोलने वाली स्त्रियों से किसी ब्राह्मण को भोजन नहीं लेना चाहिए, स्त्रियों के किए हुए सभी यज्ञ कार्य अशुभ होने से देवों को स्वीकार्य नहीं हैं। कि स्त्री पुरुष को मोहित करने वाली होती है। कि स्त्री पुरुष को दास बनाकर पदभ्रष्ट करने वाली हैं। कि स्त्री एकांत का दुरुपयोग करने वाली होती है। कि स्त्री शारीरिक सुख के लिए उमर या कुरूपता को नहीं देखती। कि स्त्री चंचल और हृदयहीन, पति की ओर निष्ठारहित होती हैं। कि स्त्री केवल शैया, आभूषण और वस्त्रों को ही प्रेम करने वाली, वासनायुक्त, बेईमान, ईर्ष्या खोर,दुराचारी हैं। कि सुखी संसार के लिए स्त्रियों को जीवन भर पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए। कि पति सदाचारहीन हो, अन्य स्त्रियों में आसक्त हो, दुर्गुणों से भरा हुआ हो, नपुसंक हो, जैसा भी हो फ़िर भी स्त्री को पतिव्रता बनकर उसे देव की तरह पूजना चाहिए।

वर्गीय शोषण की पहली शिकार औरत को भारतीय समाज में अब तक मजबूत मनु की इन बेड़ियों ने अलग से जकड़कर रखा है। टोक्यो में जब ये लड़कियां मैडल जीत रही थीं तब ये सिर्फ वे सामने वाली टीम या खिलाड़ी को ही नहीं मनु की इस पनौती को भी हरा रही थीं। मगर ये मनहूस आसानी से हारने वाले नहीं है। ये सिर्फ शीर्ष पर बैठे कपड़ों का नापजोख और जींस की बनावट का हिसाब किताब नहीं कर रहे, शबरीमलाई की चढ़ाई पर लाठियां लिए ही नहीं बैठे। ये घर में भी हैं जो पढ़ने और खेलने की उत्सुक लड़कियों को समाजभीरु माँ-बाप से हिदायत दिलवाते हैं कि ; “‘लड़कियां घर के काम ही करती हैं तुम भी करो” और यह भी कि हम तुम्हें स्कर्ट पहन कर खेलने नहीं जाने देंगे।इसके बाद भी जब वे जिद के साथ खेलती और जीतती हैं तो हर सेलेब्रिटी से अपना साबुन तेल, बीमा, शेयर और उत्पाद बिकवाने वाला कोई कारपोरेट उनका प्रायोजक बनने तक को तैयार नहीं होता।

इस देश की मेधा और कौशल, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास को 12-15 सदियों तक रोके रखकर सड़ांध मचाने वाला मनु ही है जिसने एक अच्छी खासी सवाल उठाकर उनका समाधान ढूंढने के विवेक वाली सभ्यता की रोशनी को बुझाकर सिर्फ अँधियारा ही फैलाया है। यह मनु ही है जो इन दिनों अम्बानी अडानी के मुनाफों की पालकी ढो रहा है, अमरीका की कंपनियों की आरती रहा है।

मनु तो नहीं मांगेगा – मगर आइये हम सब वन्दना और ओलम्पिक की महिला हॉकी टीम से माफी माँगे और उनसे और अपने आप से वादा करें कि इस तरह की बेहूदगी की सजा इसे दी जाएगी – सोच और चेतना को झाड़बुहार कर इसे हमेशा के लिए इतिहास के कूड़ेदान में दफन किया जाएगा।

कितना शुभ होगा कि टोक्यो से मैडल जीत कर लड़कियां वापस देश और घर वापस लौटें उसके पहले ही बर्ताव और सोच के अँधेरे कोनों को झाड़ बुहार कर उनमें बैठे मनु को घूरे पर छोड़ कर आ जाया जाता। क्या ऐसा मुमकिन है ?

बेशक ऐसा संभव है। इसी समाज में, जिसमे इन दिनों अंधेरों के घनेरे सत्ताशीर्ष पर विराजे हुए हैं, कुरीतियों और अंधविश्वास, पुरुष सत्ता और मनुवाद के खिलाफ वैचारिक और सामाजिक संघर्ष की शानदार विरासत है। इसमें जोतिबा और अम्बेडकर से लेकर जिनकी जयन्ती अभी हाल ही में निकली है उन राजा राम मोहन राय जैसे अनेक हैं तो सावित्री फुले और फातिमा शेख से लेकर आनंदी जोशी तक अनगिनत स्त्रियां है और सबसे बढ़कर यह कि उसी परम्परा को दृढ़ता से आगे बढ़ाने वाले कम्युनिस्ट और वामपंथी हैं।

उन्हें पता है कि मनु और उसकी बहाली के लिए बेकरार पनौती से लड़ना सिर्फ महिलाओं का काम नहीं है; ये सब की बात है – दो चार दस की बात नहीं।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

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