आखिर ऑक्सीजन चोर कौन है?

 जिन शासकों ने पहली लहर में मिली चेतावनियों से, दूसरी लहर में ऑक्सीजन जैसी न्यूनतम जरूरतों के इंतजाम के संबंध में कुछ भी नहीं सीखा, दूसरी लहर में ऑक्सीजन की वास्तव में कमी पैदा होने से ही इंकार करेंगे, तो तीसरी लहर के लिए क्या सीखेंगे और क्या सुधारेंगे। 
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कोरोना COVID-19

 After all, who is the oxygen thief?

फ्रांस के बोरबोन राजाओं के बारे में कहावत जो प्रसिद्ध है कि ये राजा न कुछ भूलते थे और न कुछ सीखते थे, भारत के मौजूदा मोदी निजाम पर एकदम फिट बैठती है। और कोविड महामारी के वर्तमान भयानक संकट के बीच भी, वर्तमान निजाम की इस खासियत में रत्तीभर कमी नहीं आयी है। वह सारे देश और दुनिया की देखी-जानी सचाइयों को ही झुठलाने में लगा हुआ है। इसका ताजातरीन साक्ष्य, दिल्ली में तथा देश के अन्य अनेक हिस्सों में ऑक्सीजन की कमी के मुद्दे पर एक कथित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के बहाने से

जाहिर है कि मोदी सरकार के इशारे पर, भाजपा के शीर्ष राष्ट्रीय प्रवक्ता समेत, पूरे संघ तंत्र द्वारा छेड़ा गया प्रचार हमला था। इस हमले के जरिए दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर न सिर्फ दूसरी लहर के चरमोत्कर्ष के दौर में यानी अप्रैल के दूसरे तथा मई के पहले पखवाड़ों के दौरान, दिल्ली की ऑक्सीजन की मांग को पूरे चार गुना बढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया जा रहा था बल्कि कमोबेश खुल्लमखुल्ला इसके आरोप भी लगाए जा रहे थे कि ऑक्सीजन की अपनी अतिरंजित मांग से दिल्ली सरकार ने, दूसरे राज्यों के हिस्से में से ऑक्सीजन हड़प ली थी। और इस तरह देश के अनेक हिस्सों में ऑक्सीजन की कमी और उसकी वजह से हुई मौतों के लिए भी, आप जैसी विपक्षी पार्टियों की सरकारें ही जिम्मेदार थीं, न कि नरेंद्र मोदी की सरकार।

और जैसाकि अब आम नियम ही हो गया है, संघी ट्रोल सेनाएं इसके प्रचार के लिए टूट पड़ीं कि कैसे विपक्षी पार्टियों ने ‘षड़यंत्र’ रच कर देश में ऑक्सीजन की झूठी कमी पैदा करने की कोशिश की थी, ताकि देश-विदेश में नरेंद्र मोदी की सरकार को बदनाम किया जा सके!

याद रहे कि इससे पहले इसी तरह, कोविड-19 की दूसरी लहर में मोदी सरकार की घोर विफलता की बढ़ती आलोचनाओं को, कांग्रेस पार्टी के ‘‘टूल किट’’ की ही उपज साबित करने की कोशिश की गयी थी, जिसके सिलसिले में भाजपा के शीर्ष राष्ट्रीय प्रवक्ता समेत कुछ मंत्रियों के ट्वीटों पर ‘फर्जी मीडिया’ का ठप्पा लगाने के ‘अपराध’ लिए, ट्विटर के खिलाफ मोदी सरकार द्वारा छेड़ा गया युद्ध अब तक शांत नहीं हुआ है।

बेशक, दिल्ली सरकार पर ऑक्सीजन की अतिरंजित मांग करने के आरोपों की आड़ में, महामारी की दूसरी लहर के तेजी से बढ़ते प्रकोप के बीच, देश में ऑक्सीजन की भारी और प्राणघाती कमी पैदा होने के लिए जिम्मेदारी से मोदी सरकार को बचाने की यह कोशिश इतनी बेतुकी थी कि अगर इसमें भविष्य के लिए खतरनाक इशारे नहीं छुपे होते तो, इसका मजाक भर उड़ाकर छोड़ा जा सकता था।

आखिरकार, अगर बहस के लिए यह भी मान लिया जाए कि दिल्ली की सरकार ने वाकई ऑक्सीजन की अपनी मांग को बढ़ा-चढ़ाकर रखा था, तब भी उसकी बढ़ी-चढ़ी मांग, देश के अनेक हिस्सों में देखने में आयी ऑक्सीजन की कमी की जिम्मेदारी से, मोदी सरकार का बचाव कैसे हो सकती है?

पहली बात तो यही है कि इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं कि दिल्ली सरकार की ऐसी किसी अंतरंजित मांग के केंद्र सरकार द्वारा पूरा किए जाने से, अन्य राज्यों के हिस्से की ऑक्सीजन में कोई कमी हुई हो।

सचाई यह है कि दिल्ली में खासतौर पर ऑक्सीजन की कमी से हाहाकर मचने और अस्पतालों के बाहर ही नहीं अस्पतालों में भी ऑक्सीजन की कमी से अनेक मौतें होने और कई अस्पतालों व नागरिक संगठनों के इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने और अदालत में हफ्ते भर से ज्यादा की खींचतान के बावजूद, यही तथ्य सामने आया था कि वास्तव में दिल्ली के लिए केंद्र सरकार द्वारा तय किए कोटा के बराबर ऑक्सीजन की भी, मुश्किल से ही आपूर्ति हो पा रही थी। यहां तक कि अदालत के दिल्ली के केंद्र द्वारा तय किए गए कोटा से दोगुनी ऑक्सीजन देने के आदेश के बाद भी, हाईकोर्ट में ही दी गयी जानकारी के अनुसार, दिल्ली को कई दिन तक उसके केंद्र द्वारा निर्धारित किए गए बिल्कुल अपर्याप्त कोटे से भी कम ऑक्सीजन ही मिल रही थी। तब यह कहा जा रहा था कि दिल्ली की सरकार चूंकि ऑक्सीजन उत्पादक कारखानों से ऑक्सीजन की ढुलाई के लिए क्रायोजैनिक टेंकरों की पर्याप्त संख्या नहीं जुटा पायी थी, इसीलिए दिल्ली को अपने हिस्से की पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही थी। यह दूसरी बात है कि ज्यादा हो-हल्ला मचने पर मोदी सरकार को मानना पड़ा कि हजारों किलोमीटर दूर से और विशेषीकृत टैंकरों में द्रव ऑक्सीजन की ढुलाई का जिम्मा राज्यों पर ही नहीं छोड़ा जा सकता है और तब तो और भी नहीं जब मामला चिकित्सकीय ऑक्सीजन जैसी, आपदा नियंत्रण कानून के अंतर्गत आवश्यक वस्तु की उपलब्धता सुनिश्चित करने का हो।

जाहिर है कि जब ऑक्सीजन संकट के सबसे गंभीर दौर में दिल्ली को खुद केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए कोटे से ज्यादा ऑक्सीजन मिली ही नहीं थी, तो केजरीवाल सरकार के बढ़ी-चढ़ी मांग करने से भी, देश के दूसरे हिस्सों के लिए ऑक्सीजन में कमी कैसे पैदा हो सकती थी? साफ है कि दिल्ली सरकार के ऑक्सीजन की बढ़ा-चढ़ाकर मांग करने का प्रचार तो सिर्फ बहाना था, मकसद मोदी सरकार को ऑक्सीजन की कमी के संकट की जिम्मेदारी से बचाना था।

आखिरी बात यह कि अगर दिल्ली सरकार की मांग के दबाव में, ऑक्सीजन की सीमित मात्रा में से दिल्ली का हिस्सा बढ़ भी गया होता और दूसरे राज्यों का हिस्सा कम भी हो गया होता, तब भी मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार, दूसरे राज्यों में ऑक्सीजन की तंगी की जिम्मेदारी से कैसे बच सकती थी।

आखिरकार, आपदा नियंत्रण कानून के तहत, देश में ऑक्सीजन के वितरण के निर्णय पूरी तरह से केंद्र सरकार के ही हाथों में थे, जबकि राज्य सरकारें अपनी-अपनी मांगों को उसके सामने उठा भर सकती थीं। ऐसे में कोई भी राज्य सरकार, अपनी मांग को बढ़ा-चढ़ाकर रख सकती है बल्कि राज्य सरकारों से सामान्यत: ऐसा ही करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन, आपदा नियंत्रण कानून के अंतर्गत देश में चिकित्सकीय ऑक्सीजन के वितरण में सर्वेसर्वा के अधिकार अपने हाथ में लिए बैठी केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी थी कि उपलब्ध सीमित संसाधनों का राज्यों के बीच वितरण करे और किसी ऐसे वस्तुगत मानक के आधार पर वितरण करे, जिससे यह वितरण न्यायपूर्ण तरीके से हो। लेकिन, मोदी सरकार न सिर्फ महामारी के पहले दौर के अनुभव से सीखकर देश में चिकित्सकीय ऑक्सीजन की उपलब्धता में आवश्यक बढ़ोतरी करने नाकाम रही थी, ऑक्सीजन का न्यायपूर्ण वितरण करने में भी विफल रही थी। इसका पता इस तथ्य से भी चलता है कि दिल्ली सरकार द्वारा न्यायालय के सामने ऑक्सीजन के वितरण के केंद्र सरकार के मानदंड पर उठाए गए ऐसे प्रश्नों तक का, केंद्र सरकार अदालत को संतुष्ट करने वाला कोई जवाब नहीं दे पायी थी कि क्यों दिल्ली के लिए उसकी मांग के आकलन से बहुत कम कोटा तय किया गया था, जबकि दूसरे कई राज्यों को मांग के उनके अपने आकलन से काफी ज्यादा कोटा दिया गया था?

यह केंद्र सरकार को ऑक्सीजन संकट के लिए जिम्मेदारी से बचाने की भाजपा समेत समूचे संघ परिवार की कोशिशों की बदहवासी का ही सबूत है कि सुप्रीम कोर्ट में पेश की गयी एक तथाकथित रिपोर्ट के आधार पर, पिछले हफ्ते पूरे सत्ताधारी परिवार द्वारा यह साबित हो जाने के दावे किए जा रहे थे कि अप्रैल-मई के देश के ऑक्सीजन संकट के लिए, दिल्ली की केजरीवाल सरकार का राजधानी के लिए ज्यादा ऑक्सीजन की मांग किया जाना ही जिम्मेदार था! लेकिन, जल्द ही ऐसी किसी रिपोर्ट के अस्तित्व पर ही सवाल उठने शुरू हो गए।

पहले तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के दो सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए जाने के लिए ऐसी किसी रिपोर्ट के स्वीकार किए जाने में अपनी भागीदारी से ही साफ शब्दों में इंकार कर दिया।

बाद में तथाकथित रिपोर्ट की वैधता पर बढ़ते सवालों की पृष्ठभूमि में, खुद संबंधित कमेटी के अध्यक्ष, एम्स के निदेशक, रणधीर गुलेरिया को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना पड़ा है उक्त कमेटी की अंतिम रिपोर्ट अभी तैयार ही नहीं हुई है। और जो अंतरिम रिपोर्ट तैयार भी की गयी थी, उस पर जबरन इस तरह के निष्कर्ष थोपने की कोशिश की जा रही है कि दिल्ली सरकार, वास्तविक आवश्यकता से चार गुनी ऑक्सीजन की मांग कर रही थी।

उन्होंने साफ तौर पर कहा कि दिल्ली के वास्तविक मांग से चार गुनी ऑक्सीजन की मांग करने की बात निराधार थी।

लेकिन, यह सब जानते हुए भी दिल्ली की ऑक्सीजन की मांग पर विचार के लिए गठित विशेषज्ञ समिति की तथाकथित रिपोर्ट के लीक किए गए हिस्सों के आधार पर, पूरे सत्ताधारी परिवार द्वारा दिल्ली सरकार को देश भर में ऑक्सीजन संकट का कारण साबित करने की और इस तरह ऑक्सीजन संकट की सचाई को ही नकारने की या उसे विपक्षी साजिश साबित करने की कोशिश की जा रही थी। यह दिखाता है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की छवि को बचाने के लिए, सत्ताधारी संघ परिवार किस हद तक जा सकता है।

और ठीक इसी में बोरबोन राजाओं के वर्तमान भारतीय अवतार का असली खतरा छुपा हुआ है। यह तेजी से अलोकप्रिय होती एक पार्टी की अपने किसी भी तिकड़म से अपने खिसकते समर्थन को संभाले रखने की या एक मैग्लोमीनिएक नेता की अपनी छवि की रक्षा करने के लिए, यथार्थ को ही झूठ से प्रतिस्थापित करने की, कोशिश का ही मामला नहीं है।

यह संकट के इस दौर में एक निरंकुश शासन के कुछ न सीखने तथा कुछ न भूलने के चलते, बार-बार साबित हुई गलतियों को भी दुरुस्त करने के बजाए दोहराने का भी मामला है

जिन शासकों ने पहली लहर में मिली चेतावनियों से, दूसरी लहर में ऑक्सीजन जैसी न्यूनतम जरूरतों के इंतजाम के संबंध में कुछ भी नहीं सीखा, दूसरी लहर में ऑक्सीजन की वास्तव में कमी पैदा होने से ही इंकार करेंगे, तो तीसरी लहर के लिए क्या सीखेंगे और क्या सुधारेंगे। और यह सिर्फ तार्किक निष्कर्ष का ही नहीं, वास्तव में जो कुछ हो रहा है, उसका भी मामला है।

यह संयोग नहीं प्रयोग है

यह संयोग ही नहीं है कि मई के महीने में देश में पैदा हुए कोविड टीके के गंभीर संकट और टीकाकरण की रफ्तार में आयी उल्लेखनीय कमी के बाद भी, नरेंद्र मोदी सरकार ने टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाने के ठोस कदमों के लिहाज से शायद ही कुछ भी सीखा है। 7 जून को नयी टीकाकरण नीति का एलान कर, इस सरकार ने 1 मई से देश पर थोपी अपनी पिछली बेतुकी टीकानीति को आंशिक रूप से पलटा जरूर, लेकिन उसका ज्यादा ध्यान 21 जून को बड़ा टीकाकरण ईवेंट आयोजित करने पर ही था। नतीजा यह कि खासतौर पर भाजपा-शासित राज्यों में इस ईवेंट से पहले-पीछे खट्टर फार्मूले से टीके बचाकर, एक दिन में 88 लाख टीके लगाने का रिकार्ड जरूर कायम किया गया, लेकिन साप्ताहिक औसत के हिसाब न टीकों की उपलब्धता और न वास्तविक टीकाकरण उस स्तर पर पहुंच सके हैं, जहां इस साल के आखिर तक भी पूरी टीका पाने लायक आबादी का टीकाकरण हो पाना संभव हो। लेकिन, इस चुनौती का सामना करने के बजाए, मोदी सरकार और सत्ताधारी संघ परिवार, एक दिन में टीकाकरण के रिकार्ड के बाद, अब इसी पर गाल बजाने में लगे हुए हैं कि भारत में लगाए गए टीकों की कुल संख्या, अमरीका से आगे निकल गयी है। यह तब है जबकि भारत में टीके की दोनों खुराकों से सुरक्षित आबादी का अनुपात, जो तीसरी लहर की संभावनाओं के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है, टीके के लिहाज से साधनसंपन्न अन्य देशों से बहुत-बहुत पीछे है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह के प्रचार टोटके मोदी और उनकी सरकार की छवि भले ही बचा सकते हों, महामारी के कहर से भारतवासियों को नहीं बचा सकते हैं।                                                 

0 राजेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लोकलहर के संपादक और हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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