चमगादड़ों को इलाज की जरूरत नहीं होती, क्या हमें अस्पताल की जरूरत है?

दिनेशपुर में पुलिन कुमार विश्वास अस्पताल में चमगादड़ों का डेरा. चमगादड़ देख नहीं पाते। क्या हम देख पाते हैं कि विकास की हमने कितनी कीमत चुकाई ? क्या हमें इलाज की जरूरत नहीं हैं या हम भी चमगादड़ हैं?

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bats - दिनेशपुर में पुलिन कुमार विश्वास अस्पताल में चमगादड़ों का डेरा
दिनेशपुर में पुलिन कुमार विश्वास अस्पताल की दुर्दशा

दिनेशपुर में पुलिन कुमार विश्वास अस्पताल के अहाते के पेड़ों में दुनिया भर के चमगादड़ों का डेरा है।

कल प्रेरणा अंशु के दफ्तर गए थे, तो थोड़ा दिनेशपुर हाट की तरफ निकले मैं और उत्कर्ष। अचानक देखा कि एक पेड़ के नीचे बच्चों का जमावड़ा है कैनाल कालोनी परिसर में। जाकर देखा कि एक बड़ा सा चमगादड़ जमीन पर गिरा है। उसकी आंखें बड़ी-बड़ी। बच्चे उसे उड़ाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन वह उड़ नहीं सका।

हम जब दिनेशपुर हाई स्कूल के छात्र थे, तब अस्पताल के अहाते में एक बड़ा इमली का पेड़ भी हुआ करता था, जिसके इर्द गिर्द जमा होकर हम बच्चे पत्थर फेंककर इमली तोड़ा करते थे।

बसन्तीपुर से दिनेशपुर के रास्ते में और जाफ़रपुर, रुद्रपुर, गदरपुर के रास्ते पर असंख्य जामुन, आम और बहेड़ा के पेड़ हुआ करते थे। जगह-जगह बेर की झाड़ियां भी हुआ करतीं थी। हमारे घर में ही सैकड़ों फलों के पेड़ थे। हर घर में यही हाल था।

तब जामुन जमीन पर बिखरा पड़ा कभी नहीं देखा। हमारे लिए ये फल और खेतों में मटर, चना, मूली, गाजर,शलजम, टमाटर, भुट्टा, जैसी चीजें हुआ करती थीं, जिन्हें जब चाहे तोड़कर या उखाड़कर खा सकते थे। चारों तरफ गन्ने के खेत थे।

दिनेशपुर में साप्ताहिक हाट लगता था। मिठाई की दो तीन दुकानें थीं लेकिन मिठाई खरीदने के पैसे हमारे पास होते नहीं थे।

साइकिल से पन्तनगर, बाजपुर, गदरपुर, किच्छा, लालकुआं, बिलासपुर घूमने जरूर जाते थे। काशीपुर तक निकल जाते थे, लेकिन किताब और पत्रिकाएं खरीदने के अलावा कुछ खरीदते नहीं हैं।

बहरहाल हममें से हर कोई पेड़ पर चढ़ सकता था। तब गांवों में बिजली नहीं होती थी। दुपहरी हम इन्हीं पेड़ों में बिताते थे। गर्मी से बचने का आसान तरीका। बस, सांप, मधुमक्खी और ततैया से सावधानी बरतनी होती थी। हममें से कोई कभी पेड़ से गिरा नहीं।

तब तराई में जंगल भी बहुत थे। कदम-कदम पर जहरीले सांप थे। बाघ भी निकलता रहता था। घर कच्चे होते थे। सांप और जंगली जानवर अक्सर घर में घुस जाते थे।

यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी थी। तब पढ़ाई से ज्यादा जरूरी खेती थी। खेती के काम से वक्त बचा तो पढ़ने की इजाजत मिलती थी।

मान्यता थी कि किसानों के बच्चों को आखिर खेती ही करनी पड़ती है। खेती के काम में गलती होने पर या इस काम के दौरान पढ़ने बैठने पर जमकर पिटाई होती थी।

हम न पढ़ने के लिए नहीं, अक्सर पढ़ते रहने की वजह से ज्यादा पिटते थे। शौक की कोई गुंजाइश नहीं।

आज बच्चों के पास सब कुछ है। लेकिन वे पेड़ और खुल्ला खेत, खुला आसमान और जंगल नहीं है। हर तरफ बाजार। खरीददारी में भी बच्चे आगे।

तराई की सड़कों पर जमीन अब भी खूब पकते हैं लेकिन पेड़ पर कोई चढ़ता नहीं है। पेड़ पर चढ़ना भी नहीं जानते बच्चे। सड़कें क्या, गांव में भी घर के अहाते में पके हुए जामुन बिछे होते हैं। कोई तोड़ता नहीं। बाजार से ही आता है जामुन। सब्जियां कच्ची खाने की बात तो छोड़िए, सलाद भी डर-डर कर खाना पड़ता है।

जंगल नहीं हैं और न गन्ने की खेती पहले की तरह होती है। जानवर आबादी में नहीं दिखते। गांवों में गाय बैल भैंस गोबर बकरियों से लेकर मिट्टी और हरियाली भी गायब है। नदियों में मछलियां नहीं हैं। सांप भी नहीं दिखते। पेड़ों पर चिड़िया का बसेरा नहीं है।

बच्चे पेड़ों पर नहीं चढ़ते। फल चमगादड़ आकर खा जाते हैं। दिनेशपुर अस्पताल के पेड़ों में सिर्फ चमगादड़ों का ही डेरा है। वहीं से रात रात भर गांवों की उड़ान भरते हैं चमगादड़ और दिन में अस्पताल के पेड़ों में उल्टे लटके होते हैं।

चमगादड़ देख नहीं पाते।

क्या हम देख पाते हैं कि विकास की हमने कितनी कीमत चुकाई ?

चमगादड़ को इलाज की जरूरत नहीं है। फिर भी अस्पताल में उनका डेरा।

क्या हमें इलाज की जरूरत नहीं हैं या हम भी चमगादड़ हैं?

पलाश विश्वास

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