जलियांवाला बाग स्मारक का सौंदर्यीकरण : इतिहास का ध्वंस

आधुनिक इतिहास की क्या जरूरत है? मालाबार विद्रोह की पृष्ठभूमि क्या है ? पर्यटक स्थल विकास का मॉडल. जलियांवाला बाग स्मारक का सौंदर्यीकरण इतिहास का ध्वंस क्यों है
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Jallianwala Bagh जलियांवाला बाग

Beautification of Jallianwala Bagh Memorial: Destruction of History

इतिहास के मुकम्मल अंत की ओर

अचरज की बात नहीं है कि अमृतसर के ऐतिहासिक जलियांवाला बाग के नरेंद्र मोदी की सरकार के हाथों से हुए कथित नवीनीकरण या सुंदरीकरण ने, उसी तरह से तीखा विवाद पैदा किया है, जैसे इसी सरकार की नयी संसद समेत, सेंट्रल विस्टा के नव-निर्माण की योजना कर रही है। दोनों ही मामलों में विवादित निर्माण इस अर्थ में पूरी तरह से मोदी सरकार के ही हाथों से हुआ है या हो रहा है, कि इससे संबंधित एक-एक फैसला, सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार का है। और तो और, इन दोनों ही निर्माणों के लिए मौजूदा शासकों के कृपाप्राप्त गुजराती कारोबारियों की कंपनियों को ही चुना जाना भी। इससे, इस प्रकार के मामलों में निर्णय की प्रक्रिया से लेकर, छांट-छांटकर चहेतों को सरकारी ठेके दिए जाने के पक्षपात/ भ्रष्टाचार के भी सवाल बेशक उठते हैं। फिर भी हम यहां खुद को इस प्रकार के नव-निर्माण की प्रकृति के सिलसिले में, विशेष रूप से जलियांवाला के संदर्भ में उठे सवालों तक ही सीमित रखना चाहेंगे।

नयी संसद व सेंट्रल विस्टा के विपरीत, चूंकि जलियांवाला बाग का प्रसंग नये निर्माण का नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक स्मारक के नवीकरण/ संरक्षण का है, इसलिए यह सवाल विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है कि क्या इस नवीकरण में, इस स्मारक का ऐतिहासिक रूप संरक्षित रहा है? अगर नहीं, तो यह निश्चित रूप से इस ऐतिहासिक धरोहर के साथ और इसलिए उससे जुड़े इतिहास के साथ ही हिंसा है।

जलियांवाला बाग के इस नवीनीकरण में, जिसे अनेक आलोचकों ने उचित ही सुंदरीकरण कहना ही बेहतर समझा है, मुख्य जोर इस स्मारक के मूल स्वरूप को ज्यादा से ज्यादा संरक्षित रखने तथा उसके संरक्षण के लिए नितांत अपरिहार्य बदलाव ही करने के बजाए, उसे दर्शकों के लिए ज्यादा से ज्यादा आकर्षक तथा सुविधाजनक बनाने पर ही रहा लगता है।

संक्षेप में कहें तो यह नवीनीकरण वास्तव में, एक पर्यटन स्थल के रूप में जलियांवाला बाग के विकास को संबोधित था, जैसे पर्यटक स्थल विकास का मॉडल गुजरात में साबरमती रिवर फ्रंट के मुख्यमंत्री मोदी के समय में हुए विकास से निकला था। अब तक आयी जानकारियों के अनुसार, कथित नवीकरण में किए गए तीन बड़े बदलाव, इसी तरह के पर्यटन विकास मॉडल का संकेत देते हैं।

History of Jallianwala Bagh

इनमें पहला और शायद जलियांवाला बाग के इतिहास की स्मृति के साथ सबसे ज्यादा हिंसा करने वाला बदलाव तो, उस तंग से किंतु अपेक्षाकृत लंबे गलियारे का आडंबरपूर्ण तरीके से चमक-दमक भरा पुनर्निर्माण है, जो गलियारा हर तरफ से घरों की दीवारों से घिरे इस उजड़े हुए पुराने छोटे से बाग तक पहुंचने का और उसमें से निकलने का भी, एकमात्र रास्ता था। आने-जाने के इस इकलौते गलियारे को बंद कर के, ब्रिटिश सेना ने एक विरोध सभा के लिए जमा हुए निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाकर, भारत में अपने राज के सबसे क्रूर तथा सबसे बड़े नरसंहारों में से एक को अंजाम दिया था। इस गलियारे को, जो उस इतिहास की स्मृति के प्रवेश द्वार के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए था, ऐसा रूप दे दिया गया है जो उस गलियारे से गुजरकर ब्रिटिश फौज द्वारा बरपा की गयी विभीषिका की याद को बढ़ाने के बजाए, उसकी ओर से ध्यान बंटाने का ही काम कर सकता है।

इसी तरह का दूसरा बदलाव, इस बाग में रहे एकमात्र कुंए के साथ किया गया है, हताशा में जिसमें कूद कर पचासों लोगों ने जान बचाने की उम्मीद में अपनी जान गंवायी थी क्योंकि उजाड़ बाग के इस खुले मैदान में, ऐसा कुछ था ही नहीं जिसकी ओट में कोई गोलियों की बौछार से खुद को बचाने की कोशिश करता। निर्दोष नागरिकों की हताशा और विदेशी शासन की क्रूरता के इस स्मारक को, अन्य बदलावों के अलावा कमल के फूलों से सजा दिया गया है। और ऐसा ही तीसरा बदलाव यह किया गया है कि चूंकि मरने वालों और घायल होने वालों के शरीर में लगी गोलियों के अलावा बाकी गोलियां इस बाग की तीन ओर की दीवारों से जाकर टकरायी थीं, इन दीवारों पर पचासों जगह पर इन गोलियों के निशान थे। ये निशान अपनी विशाल संख्या से भी इसकी याद दिलाते थे कि जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सेना ने निहत्थे नागरिकों पर कैसी भयानक गोलीबारी की थी। लेकिन, इन दीवारों को संरक्षित करने के जरूरी काम के नाम पर, प्रतीकात्मक रूप से कुछ निशानों को छोडक़र, इनमें से ज्यादातर निशानों को मिटा दिया गया है।

और इस सब के ऊपर से है एक ‘लाइट एंड साउंड शो’ का इस ऐतिहासिक स्थल के साथ जोड़ा जाना, जो सीधे-सीधे इस इतिहास के साथ कितना सही सलूक करेगा, उसके संबंध में भी मौजूदा निजाम में ज्यादा आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है, फिर भी वह सबसे बड़ा काम यह करेगा कि साधारण नागरिकों की शहादत और खून से पवित्र हुए इस स्थल की गरिमा और गंभीरता को घटाकर, इसे एक शोर-शराबे भरे पर्यटन स्थल में बदले जाने को मुकम्मल कर देगा।

कोई कह सकता है कि इसमें भी क्या बुराई है, अगर इस सब से आकर्षित होकर पर्यटक बनकर ही सही, ज्यादा लोग इसे देखने आएंगे? बेशक, जितने ज्यादा लोग जलियांवाला बाग देखने जाएंगे, उतना ही अच्छा होगा। लेकिन, इतना ही महत्वपूर्ण यह है कि जाने वाले, अब जलियांवाला बाग में क्या देखेंगे? बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि हमारे शासक, जलियांवाला बाग में लोगों को क्या दिखाने का इंतजाम कर रहे हैं; बाग या नरसंहार का इतिहास!

लेकिन, इतिहास को और उसमें भी आधुनिक यानी वर्तमान से कुछ ही पहले के तथा खासतौर पर ब्रिटिश राज से आजादी के लिए संघर्ष के इतिहास को भुलाने/ मिटाने का, सुंदरीकरण तो सिर्फ एक तरीका है, जिसे हमारे देश के मौजूदा शासकों द्वारा आजमाया जा रहा है।

इसी इतिहास के कुछ दूसरे रंगों को और खासतौर गैर-हिंदुओं से संबंधित हिस्सों तो सीधे-सीधे खारिज करने या मिटाने का ही रास्ता अपनाया जा रहा है।

इसी कोशिश का एक उदाहरण हाल ही में मोदी राज में पूरी तरह से पुनर्गठित भारतीय अनुसंधान परिषद की, एक तीन सदस्यीय समीक्षा कमेटी इसके निर्णय के रूप में सामने आया है कि पहले विश्व युद्ध के बाद के दौर में केरल के मालाबार के इलाके में भडक़े ब्रिटिशविरोधी तथा जमींदारविरोधी विद्रोह के नेताओं समेत, जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा अपने खिलाफ बगावत करने के लिए मौत की सजा दी गयी थी, 387 शहीदों के नाम, ‘डिक्शनरी ऑफ मार्टियर्स: इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)’ के पांचवें खंड से काट दिए जाएं। यानी उन्हें शहीदों से अपराधी बना दिया जाए, जिन्हें एक वैध शासन की हैसियत से ब्रिटिश शासन ने सजा दी थी!

मालाबार विद्रोह की पृष्ठभूमि क्या है

इसकी पृष्ठभूमि यह है कि स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास की ब्रिटिशविरोधी धार को भोंथरा करने और उसके बहुधार्मिक स्वरूप को काटने की कोशिश में आरएसएस परिवार और उनकी वर्तमान भाजपायी सरकार, प्रमुखत: मुस्लिम मोपला किसानों की बगावत होने के चलते, जिसकी थोड़ी-बहुत आंच मालाबार के इलाके के हिंदू जमींदारों पर भी आयी थी, मालाबार विद्रोह को हिंदूविरोधी आतंकवाद घोषित करने में लगे हुए हैं। जो ताकतें इस मीडिया युग में, नौ महीने से ज्यादा से राजधानी के बार्डरों पर जारी ऐतिहासिक किसान आंदोलन को, खालिस्तानी या सिख आतंकवादी आंदोलन करार दे सकती हैं, उनके 1920 के दशक के किसान विद्रोह को जिसमें मुसलमान किसानों की प्रमुखता थी, हिंदूविरोधी आतंकवाद करार देने पर किसे अचरज होगा।

अचरज नहीं कि अफगानिस्तान में ताबिलान की वापसी के बाद, आरएसएस-भाजपा के एक प्रमुख ‘‘बौद्घिक’’ ने मोपला विद्रोह को बाकायदा, भारत में तालिबान राज कायम करने की पहली कोशिश ही करार दे दिया है। खुद स्वतंत्रता आंदोलन से सिरे से गायब ही रहे बल्कि वास्तव में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ाने के जरिए, स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करते रहे और सांप्रदायिक बंटवारे की राजनीति के जरिए, मुस्लिम लीग की तरह ही ब्रिटिश राज की सेवा ही करते रहे, आरएसएस कुनबे का, स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों की मौजूदगी को छुपाने/ मिटाने की कोशिश करना, स्वाभाविक है। इसीलिए ये ताकतें, ब्रिटिश हुकूमत को युद्घ के मैदान में चुनौती देने, एक से ज्यादा लड़ाइयों में हराने और अंतत: लड़ते-लड़ते युद्घ के मैदान में शहादत देने वाले, मैसूर के शेर टीपू सुल्तान की ब्रिटिशविरोधी भूमिका को नकारने की भी, तमाम कोशिशें करती आयी हैं। लेकिन, दर्ज करने वाली खास बात यह है कि अब यह प्रक्रिया उस मुकाम पर पहुंच गयी है, जहां भारतीय इंतिहास अनुसंधान परिषद ने, जो कि भारत में इतिहास शोध की शीर्ष अधिकारिक संस्था है, खुद इस खेल का जिम्मा संभाल लिया है।

हाल ही के ऐसे ही एक अन्य प्रसंग में, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में, जाहिर है कि उसके कुख्यात वीसी जगदेश कुमार की अगुआई में, इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए, एसी तथा ईसी में कोई बहस कराए बिना ही, ‘‘काउंटर टैररिज्म’’ का एक नया कोर्स थोपा गया है, जिसे खड़ा ही इस तरह के सरासर झूठे तथा सांप्रदायिक दावों के आधार पर किया गया है कि ‘जेहादी आतंकवाद’ ही ‘तत्ववादी-धार्मिक आतंकवाद’ का इकलौता रूप है! मौजूदा शासकों को खुश करने की कोशिश में इस पाठ््यक्रम के निर्माताओं को पड़ौस में श्रीलंका में दसियों वर्ष लड़ा लिट्टे तो दिखाई नहीं ही दिया, यह भी दिखाई नहीं दिया कि खुद भारत सरकार, कम से कम उत्तर-पूर्व में कई गैर-मुस्लिम ग्रुपों को आतंकवादी मानती है। लेकिन, शासकों को खुश करना हो तो कॉमनसेंस का बोझ ढोने की क्या जरूरत है? इसीलिए, शासकों का पूरी तरह से मनचीता करने के ख्याल से उक्त कोर्स में यह बेतुका दावा भी जोड़ दिया गया है कि पूर्ववर्ती सोवियत संघ तथा चीन की कम्युनिस्ट हुकूमतें ही ‘मुख्य आतंकवाद प्रायोजक हुकूमतें’ रही थीं! यह तब है जबकि यह एक जानी-पहचानी बात है कि अफगानिस्तान में सोवियत-समर्थित जनतांत्रिक शासन के खिलाफ लडऩे के लिए और सबसे बढक़र सीआइआइ द्वारा धन व हथियार देकर तथा पाकिस्तानी भू-भाग का इस्तेमाल कर, ओसामा बिन लादेन समेत उन आतंकवादी फौजों को खड़ा किया था, जिन्होंने तालिबान के नाम से अफगानिस्तान पर कब्जा किया और दुनिया के अनेक हिस्सों में जेहादी आतंक फैलाने का काम किया। ऐसे पाठ्यक्रम और इतिहास को पढक़र निकलने वाले छात्रों की योग्यता का तो भगवान ही मालिक है!

आधुनिक इतिहास के अंत के मुकम्मल होने में जो भी कसर रहती थी, उसे पूरा करने का संकेत दिया दिल्ली विश्वविद्यालय ने। वहां बीए के अंग्रेजी के पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की कहानी ‘द्रौपदी’ को और दो दलित लेखिकाओं, बामा और सुकिर्तरानी की कहानियों को हटा दिया गया। आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार के यथार्थ को रखने वाली कहानी ‘द्रौपदी’ को इसलिए हटा दिया गया कि इससे सिपाहियों की गलत छवि बनती है और दलित लेखिकाओं की कहानियों को इसलिए हटा दिया गया क्योंकि निर्णायकगण न ‘जात-पांत’ में विश्वास करते हैं, न मानते हैं। फिर कौन दलित और कैसा दलित स्त्रियों का यथार्थ? इसके बाद किसी आधुनिक इतिहास की क्या जरूरत है? बाकी के लिए वेद-पुराण तो हैं ही।      

0 राजेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लोकलहर के संपादक हैं।

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