ज्ञानवापी पर बड़ा अदालती फैसला

जहां तक सवाल मंदिर तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाने का है, तो यह इतिहास इतना सरल-सपाट नहीं है। इसे समझने के लिए अकबर से लेकर औरंगजेब तक के इतिहास की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुजरना पड़ेगा। 
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आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial)

ज्ञानवापी मस्जिद मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से चंद महीने पहले एक अहम अदालती फैसला आया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ज्ञानवापी मस्जिद मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए मस्जिद परिसर में पुरातत्व विभाग यानी एएसआई के सर्वेक्षण पर रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय ने वाराणसी सिविल कोर्ट के 8 अप्रैल के उस फैसले पर रोक लगा दी है जिसमें सिविल कोर्ट ने मस्जिद परिसर की जांच के लिए एएसआई सर्वेक्षण का आदेश पारित किया था। इस आदेश के खिलाफ यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड (UP Sunni Central Waqf Board) और मस्जिद कमेटी की ओर से सर्वेक्षण पर रोक लगाए जाने की मांग की गई थी।

वाराणसी की अदालत के फैसले का विरोध करते हुए मस्जिद पक्ष ने कहा था कि इस संबंध में एक मामला पहले ही उच्च न्यायालय में है। ऐसे में वाराणसी की अदालत ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकती है और इस आदेश को रद्द किया जाना चाहिए। साथ ही वाराणसी की अदालत के आदेश को 1991 के पूजा स्थल अधिनियम का खुले तौर पर उल्लंघन बताया गया था।

गौरतलब है कि पूजा स्थल अधिनियम 1991 के तहत 15 अगस्त 1947 के पहले के किसी भी धार्मिक स्थल में कोई भी तब्दीली या फेरबदल नहीं किया जा सकता। जबकि मंदिर पक्षकारों का कहना है कि 1664 में मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर को तोड़कर उसके अवशेषों पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया था जिसकी वास्तविकता जानने के लिए मस्जिद परिसर का सर्वेक्षण कराना जरूरी है।

मंदिर पक्ष का दावा है कि मस्जिद परिसर की खुदाई के बाद मंदिर के अवशेषों पर बनी मस्जिद के सबूत अवश्य मिलेंगें। इसलिए एएसआई सर्वेक्षण किया जाना बेहद जरूरी है।

उच्च न्यायालय ने सभी पक्षों से दो हफ्ते में नए सिरे से जवाब दाखिल करने को कहा है। तब तक के लिए निचली अदालत के फैसले पर रोक लगी रहेगी। अदालत के फैसले से मुस्लिम पक्षकारों को फौरी राहत मिली है।

दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं, जिसमें किसके तर्क न्याय की तुला को अपनी ओर झुकाते हैं, यह न्यायालय में ही तय होगा। फिलहाल एएसआई के सर्वे पर रोक से कम से कम उस सांप्रदायिक तनाव से बचा जा सकेगा, जिसे खड़ा कर चुनाव में जीतने के मंसूबे अक्सर राजनैतिक दल अब करने लगे हैं। उत्तरप्रदेश चुनाव की घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन सियासी फिज़ाओं में नफरत और विभाजन की गंध को महसूस किया जा सकता है।

रथयात्रा पर बैठकर अयोध्या से दिल्ली तक का जो सफर भाजपा ने तय किया है, अब बहुत से दलों को सत्ता के सफर का ये तरीका अच्छा लगने लगा है। इसलिए उत्तरप्रदेश में कोरोना कुप्रबंधन, बेरोजगारी, महंगाई, अपराध, महिला उत्पीड़न, अस्पतालों की दुर्दशा, बच्चों की अकाल मौत इन तमाम मुद्दों पर चर्चा से अधिक जातीय और धार्मिक समीकरण साधने में राजनैतिक दल जुट गए हैं।

दलितों के उत्थान के उद्देश्य से राजनीति में आईं मायावती अब ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के साथ-साथ मुसलमानों को मलियाना और मुजफ्फरनगर न भूलने की हिदायत दे रही हैं। उनका इशारा कांग्रेस और सपा की ओर है, लेकिन ऐसा करके वे भाजपा की ही मदद कर रही हैं।

Communal polarization has always been in BJP's advantage

असद्दुदीन ओवैसी बिहार की सफलता के बाद अब उत्तरप्रदेश में मुस्लिम वोटों को बटोरने पहुंचे हैं और ऐसा करके वे भी हिंदुओं को भाजपा की ओर भेजने का काम कर रहे हैं।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भाजपा के फायदे में हमेशा रहा है। सपा भी छोटे दलों के साथ ब्राह्मणों को लुभाने में लगी है। कांग्रेस में प्रियंका गांधी काफी हद तक जमीनी मुद्दे उठाने का काम कर रही हैं, लेकिन उनके सामने इस वक्त बड़ी चुनौती कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरना है। कांग्रेस अगर उत्तरप्रदेश में जमीन पर मजबूत हो जाएगी, तो उसके लिए सांप्रदायिक सद्भाव को लेकर जनशिक्षण करना आसान हो जाएगा।

कांग्रेस यह मजबूती जब तक हासिल करे, तब तक समाज को और नुकसान न हो जाए, इसकी आशंका तो लगातार बनी हुई है, क्योंकि सत्ता में जो लोग बैठे हैं, उनका उद्देश्य हिंदुत्व के बहाने कट्टरता और धर्मांधता को बढ़ावा देना है, यह बात कई बार साबित हो चुकी है। एक अयोध्या का नुकसान देश ने बहुत बुरी तरह भुगता है। दक्षिणपंथी जब अयोध्या को झांकी और काशी, मथुरा को बाकी कहते हैं, तो उनके इरादे समझना कठिन नहीं है कि ये बाकी और क्या-क्या नुकसान देश का कराएगा।

जहां तक सवाल मंदिर तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाने का है, तो यह इतिहास इतना सरल-सपाट नहीं है। इसे समझने के लिए अकबर से लेकर औरंगजेब तक के इतिहास की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुजरना पड़ेगा। जहां कदम-कदम पर ये नजर आएगा कि सत्ता के लिए कई जगह मंदिर बने, कई जगह मस्जिदें बनीं, कई जगह मुगल शासकों ने मंदिरों में दान दिए, अपनी सेना और दरबार में हिंदुओं को ऊंचे पदों पर रखा और कई बार उनकी मदद से दूसरे हिंदू राजाओं को हराया भी। इस इतिहास में राज्यहित में धर्म से ऊपर उठकर फैसले लिए गए थे, और तब भारत एक देश नहीं था, न धर्मनिरपेक्षता वाला हमारा संविधान था।

अब हमारे पास संविधान है, जो किसी किस्म का भेदभाव नहीं करता और सबको साथ रहने का अवसर देता है। इस अवसर को हम क्यों और किसके लिए गंवा रहे हैं, ये सवाल काशी बाकी है, का उद्घोष करने से पहले खुद से पूछना चाहिए।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

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