देश हित में है जाति आधारित जनगणना

जातीय आधार पर जनगणना से जातियों के फर्जी आंकड़ों के आधार पर होने वाला राजनैतिक ध्रुवीकरण रुकेगा। इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि पूरे देश में जाति आधारित मतगणना हो।
 | 
आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial)

Caste based census is in the interest of the country

बिहार की राजनैतिक पार्टियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से की मुलाकात

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today

देश में जातिगत आधार पर जनगणना कराये जाने की मांग (Demand to conduct census on the basis of caste in the country) को लेकर बिहार की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की है।  प्रधानमंत्री  ने तत्काल कोई फैसला तो नहीं किया है परन्तु यह समझा जा सकता है कि केन्द्र इस पर जो भी निर्णय लेगा वह काफी सोच-समझकर लेगा, विशेषकर वह कुछ ऐसा फैसला करेगा कि उससे सत्तारूढ़ दल यानी भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) को चुनावी नुकसान न पहुंचे। केन्द्र सरकार से उम्मीद की जानी चाहिये कि वह देशहित में निर्णय ले ताकि देश के सभी वर्गों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। स्वयं बिहार के नेता मानते हैं कि यह मसला केवल उनके प्रदेश का नहीं वरन पूरे देश से संबंधित है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से की मुलाकात करने वालों में कौन-कौन शामिल थे?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जनता दल यूनाईटेड), विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव (राष्ट्रीय जनता दल) सहित बिहार के 10 दलों के 11 नेता इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। जदयू व राजद के अलावा हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा से पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी, भाजपा के जनक राम (मंत्री), विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी (मंत्री), कांग्रेस के अजीत शर्मा, सीपीआई के सूर्यकांत पासवान, सीपीएम के अजय कुमार, सीपीआई माले के महबूब आलम और एआईएमआईएम से अख्तरुल इमान शामिल हुए।

बिहार के मुख्यमंत्री व प्रतिनिधिमंडल के नेता अनुकूल फैसले को लेकर आशान्वित हैं। उन्होंने बैठक के बाद बताया कि प्रधानमंत्री ने मांग को अस्वीकार नहीं किया है और उनकी बात ध्यान से सुनी है।

तेजस्वी यादव का भी मानना है कि यह ऐतिहासिक काम होगा। उनका तर्क रहा है कि जब पेड़-पौधों एवं जानवरों की गिनती हो सकती है एवं धर्म के आधार पर गणना हो सकती है तो जाति के आधार पर क्यों नहीं होनी चाहिये।

कांग्रेस विधायक दल के नेता अजीत शर्मा भी जाति आधारित जनगणना को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार आरक्षण को पारदर्शी बनाने में इससे मदद मिलेगी और सामाजिक द्वेष दूर होगा। विशेषकर क्रीमी एवं नॉन क्रीमी लेयर का प्रतिशत भी स्पष्ट हो सकेगा।

सीपीआईएम के अजय कुमार का अभिमत है कि जातीय आधार पर शोषण से छुटकारा दिलाने के लिए जाति आधारित जनगणना ज़रूरी है।

पिछली बार कब हुई थी जाति के आधार पर जनगणना

जाति के आधार पर 2011 में जनगणना हुई थी। यह रिपोर्ट आते तक (2014 में) केन्द्र में भाजपा की सरकार आ गई थी। चूंकि उसमें बड़ी संख्या में फर्जी आंकड़े पाये गये थे इसलिए सरकार ने उसे रद्द कर दिया था।

यह भी माना जाता है कि पिछड़े वर्गों के समर्थन से भाजपा को काफी फायदा मिला है। अगर पारदर्शी रिपोर्ट आती है तो अनेक लोगों को राजनैतिक नुकसान पहुंच सकता है, जिनमें भाजपा भी शामिल है। इसलिये वह जाति आधारित जनगणना कराने के हक में नहीं है।

इधर हाल ही में संसद में एक कानून के जरिये अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने वाली सूची में शामिल करने का अधिकार राज्यों को दे दिया गया है, ऐसे में जाति आधारित अनेक नेता और दल जो जाति विशेष के नुमाइंदे होने का दावा करते हैं, उन्हें तो नुकसान पहुंचेगा ही, जो जातिगत आरक्षण का अनावश्यक लाभ लेकर वास्तव में हकदार जातियों व लोगों का हक छीन रहे हैं, उन पर भी रोक लग सकेगी। वैसे भी किसी भी समुदाय के लिए दी जाने वाली सुविधाएं तब तक सही ढंग से निर्धारित नहीं हो सकती जब तक कि उस समुदाय या वर्ग में शामिल लोगों की सही-सही संख्या का पता न चले। सारी योजनाएं एवं कार्यक्रम इसी आधार पर तय किये जाते हैं।

जातीय आधार पर जनगणना से जातियों के फर्जी आंकड़ों के आधार पर होने वाला राजनैतिक ध्रुवीकरण रुकेगा

यह इस मायने में भी आवश्यक है कि जातियों के फर्जी आंकड़ों के आधार पर होने वाले राजनैतिक ध्रुवीकरण रुक सकेंगे। सटीक आंकड़े उपलब्ध न होने से समाज में एक-दूसरे के खिलाफ वैमनस्यता, द्वेष और घृणा को फैलने से भी रोका जा सकेगा।

इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि पूरे देश में जाति आधारित मतगणना हो। यह मांग चाहे राजनैतिक दलों की ओर से उठाई गई हो परन्तु जिस तरह से सभी दल इस पर एकमत हैं, उससे स्पष्ट है कि समग्र देश इस आधार पर जनगणना कराये जाने का हिमायती है। मोदी सरकार को इसी पक्ष में फैसला सुनाना चाहिये।

देखना तो यह होगा कि अगर प्रधानमंत्री बिहार की इस मांग को नहीं मानते तो क्या बिहार की राजनीति में नये समीकरण बनेंगे और वहां भाजपा सरकार खतरे में आएगी? वैसे भी नीतीश एवं तेजस्वी की बढ़ती नजदीकियां भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। हाल ही में राजद के कद्दावर नेता लालूप्रसाद यादव ने नीतीश की प्रशंसा की थी। भाजपा के एक तथा सहयोगी दल के एक मंत्री का इस प्रतिनिधिमंडल में शुमार होना भी भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ये नेता किसी न किसी पिछड़ी जाति का प्रतिनिधित्व भी करते हैं।

इस मांग को न मानने का अर्थ होगा अनेक जातियों के वोटों से हाथ धो बैठना। अपने-अपने राज्यों के ओबीसी को प्रभावित करने के लिए कई दल बिहार के राजनीतिज्ञों द्वारा उठाई गई मांग को अन्य प्रदेशों में भी दोहरा सकते हैं।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription