देश और जनता के लिए खतरनाक है झूठा छवि निर्माण

सरकार की प्राथमिकता, मोदी की छवि बचाने के लिए प्रचार की आंधी चलाने की थी और उसने खर्चे की परवाह किए बिना वही किया, जबकि मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने से बिल्कुल हाथ खड़े कर दिए
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Narendra Modi

पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाली मोदी सरकार के पास नहीं हैं 4 लाख रुपए !

न मुफ्त, न सार्वभौम, न सबसे बड़ा, न सबसे तेज और न मोदीजी का टीका

The Modi government with a five trillion dollar economy does not have 4 lakh rupees for the dependents of COVID deceased!

इस विडंबना को अनदेखा करना मुश्किल है, हालांकि मोदी जी के राज में विडंबना इतनी ज्यादा ‘‘मुमकिन’’ हो गयी है कि अक्सर, उसे दर्ज तक नहीं किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट में एक एफीडेविट दाखिल कर, केंद्र सरकार ने दो-टूक शब्दों में कह दिया है कि वह, कोविड मौतों के लिए, मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपए तो क्या कोई भी मुआवजा देने के लिए तैयार नहीं है।

केंद्र सरकार ने न सिर्फ सिद्धांतत: कोविड-मृतकों के लिए मुआवजे की मांग को अस्वीकार करते हुए यह दलील दी है कि जिस आपदा प्रबंधन कानून के अंतर्गत कोविड-19 का मुकाबला करने से संबंधित कदम उठाए जा रहे हैं, उसके अंतर्गत महामारी से मरने वालों के लिए मुआवजा दिया ही नहीं जा सकता है क्योंकि इस कानून के अंतर्गत बाढ़, साइक्लोन, आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं के पीडि़तों के लिए ही मुआवजे की व्यवस्था है। और यह भी कि अगर महामारी पीडि़तों को मुआवजा देने लगे तब तो, राष्ट्रीय आपदा राहत कोष ही खाली हो जाएगा।

इसके अलावा केंद्र सरकार ने महामारी के शिकार हुए लोगों के लिए मुआवजा देने की एक गैर-सरकारी संगठन की याचिका को इसलिए खारिज किए जाने की दलील दी है कि केंद्र व राज्य सरकारें, इतने मुआवजे का बोझ उठा ही नहीं सकती हैं। वे तो पहले ही महामारी का मुकाबला करने पर अतिरिक्त खर्चा कर रही हैं। और यह भी कि अगर सरकार को यह खर्चा उठाना पड़ता है तो, इसका उल्टा असर भी हो सकता है और सरकारों को कोविड से मुकाबला करने के लिए स्वास्थ्य आदि की सुविधाओं पर खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है।

सरकार ने माना, उसका खजाना खाली है | The government accepted, its treasury is empty

संक्षेप में यह कि सरकार का खजाना खाली है। सोमवार, 21 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद, इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया।

लेकिन, इससे पहले उसी सुबह जब भारतवासियों की आंख खुली, उन्होंने घरों से बाहर खिडक़ी से, सड़कों पर, सरकारी इमारतों पर बैनरों व होर्डिंगों में और सुबह के अखबारों के मुखपृष्ठों पर तथा लगभग सारे टेलीविजन चैनलों पर, देश को ‘‘मुफ्त’’ और ‘‘सबको’’ टीका लगाने के लिए और दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाने के लिए, लहक-लहक कर मोदी जी का धन्यवाद करते पाया। कम से कम पूरे भाजपा-शासित भारत में यही स्थिति थी, जहां भाजपायी मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने राज्य की जनता की ओर से ‘‘मुफ्त’’ टीके की कृपा के लिए, प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देने की जिम्मेदारी खुद ही अपने नाम कर ली थी और इसके बहाने, प्रधानमंत्री की तस्वीर के वजन पर, होर्डिंगों आदि पर अपनी तस्वीर भी साथ में छपवा ली थी।

जाहिर है कि यह सब संबंधित राज्यों तक ही सीमित नहीं रह सकता था। कथित राष्ट्रीय मीडिया तथा राष्ट्रीय चैनल भी इस मुहिम से बाहर क्यों रहते?

बहरहाल, इस कथित राष्ट्रीय फलक पर, प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की तस्वीरें, खासतौर पर छायी रही थीं। इन दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों को, हाल ही में राज्य सरकार के नेतृत्व के परिवर्तन की खबरों से फिलहाल ‘अभयदान’ मिला था। जाहिर है कि वे टीकों से बढ़कर, अपनी गद्दी बख्शने के लिए, प्रधानमंत्री का धन्यवाद कर रहे थे।

बेशक, यह कोई पहला मौका नहीं है जब मोदी राज में, ‘मोदी, मोदी’ की जय-जयकार करने का, सरकारी खजाने से भारी खर्चा कर के चौतरफा अभियान छेड़ा गया है। उल्टे, मोदी राज में तो, सरकारी खर्चे पर हर तिमाही-छमाही पर ऐसे प्रचार-छवि निर्माण अभियान छेड़े जाना, नियम ही बन गया है।

वास्तव में नरेंद्र मोदी के छवि-प्रबंधक, इस तरह के अभियान के लिए, मौके और ईवेंट गढ़ते रहते हैं और मोदी की छवि को चमकाते रहते हैं। और जब भी उन्हें और उनके सुप्रीमो को यह लगता है कि उसकी करनियों या अकरनियों से जनता में नाराजगी बढ़ रही है और देश-विदेश में सुप्रीमो की छवि की चमक मंद पड़ रही है, वे खासतौर पर ऐसे मौके खोजने तथा अभियान तैयार करने में जुट जाते हैं। खासतौर पर कोरोना की दूसरी लहर में सामने आयी, मोदी राज की चौतरफा विफलताओं और जनता की भयानक दुर्दशा से, देश भर में आम लोगों के बीच बढ़ती नाराजगी और देश-विदेश में मोदी की बिगड़ती छवि से निपटने के लिए, मोदी राज ने ऐसा छवि बचाओ अभियान नहीं छोड़ा होता, तो ही हैरानी की बात होती। इस अभियान के लिए एक अतिरिक्त अर्जेंसी भी थी। कोरोना की दूसरी लहर के बीच हुए विधानसभाई चुनावों के नतीजों ने और सबसे बढ़कर बंगाल में मोदी-शाह जोड़ी के सब कुछ झोंक देने के बावजूद आए निराशाजनक नतीजों ने, 2019 के संसदीय चुनाव के बाद हुए विधानसभाई चुनावों में बार-बार सामने आयी इस सचाई को और गाढ़े रंग से रेखांकित कर दिया है कि मोदी की चुनावी अजेयता की छवि झूठी है

दूसरी ओर, विधानसभाई चुनावों का अगला बहुत ही महत्वपूर्ण चक्र अब मुश्किल से सात-आठ महीना दूर है और इस चक्र में लोकसभा में हरेक सातवां सदस्य भेजने वाले, उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार की किस्मत का फैसला भी होना है। ऐसे में मोदी जी की छवि की मरम्मत का अभियान तो छेड़ा जाना ही था। और कोविड की दूसरी लहर की तबाही और देश में टीकाकरण के संकट में फंस जाने के बाद, इस तरह के छवि सुधार अभियान के लिए, टीकाकरण से उपयुक्त दूसरा कोई मुद्दा हो नहीं सकता था।

‘मोदी जी के मुफ्त टीके’ की कीर्ति के बखान के सहारे ही, दुनिया के सबसे बड़े टीका उत्पादक देश में, टीकाकरण को ऐसे संकट में धकेल देने के लिए, मोदी सरकार की ही करनियों तथा अकरनियों की बढ़ती आलोचनाओं पर भी, अति-प्रचार का कंबल डाला जा सकता था।

बहरहाल, उस विडंबना पर लौटें जिससे हमने चर्चा शुरू की थी।

केंद्र तथा खासतौर पर भाजपा-शासित राज्यों की सरकारों द्वारा हजारों करोड़ रु0 फूंककर, अपने सुप्रीम लीडर की छवि की मरम्मत के लिए यह प्रचार आंधी ठीक उसी दिन उन्मुक्त की गयी, जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में सरकार इसकी दलीलें दे रही थी कि कोविड की महामारी से दम तोड़ने वालों के परिवारों को, सरकार कोई मुआवजा नहीं दे सकती है। सरकार के पास इसके लिए पैसे ही नहीं हैं और उसे ऐसा मुआवजा देना पड़ा तो वह, कोविड-19 का मुकाबला करने से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं आदि की व्यवस्थाओं की कीमत पर ही ऐसा कर सकती है और इससे कोविड की तबाही और भी बढ़ जाएगी।

बेशक, यह कहा जा सकता है कि ‘सबके लिए मुफ्त टीका’ के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी के प्रचार की इस आंधी पर, चाहे कितना भी सरकारी पैसा खर्च क्यों नहीं किया गया हो, उसे बचाकर भी देश भर में चार लाख से कुछ कम कोविड मौतों के लिए, चार लाख रुपए की दर से मुआवजा नहीं दिया जा सकता था, जिसकी मांग सुप्रीम कोर्ट के सामने आयी उक्त याचिका में की गयी थी।

मोटे तौर पर इतना मुआवजा देने के लिए 15,400 करोड़ रुपए खर्च करने की जरूरत होगी और उतने में ऐसे कई-कई प्रचार अभियान चलाए जा सकते हैं। लेकिन, मुद्दा सिर्फ खर्च के लिए जरूरी राशि जुटाने का नहीं, खर्च के मामले में सरकार की प्राथमिकताओं का है।

सरकार की प्राथमिकता, मोदी की छवि बचाने के लिए प्रचार की आंधी चलाने की थी और उसने खर्चे की परवाह किए बिना वही किया, जबकि मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने से बिल्कुल हाथ खड़े कर दिए।

         जैसाकि केरल के पूर्व-वित्त मंत्री ने ट्वीट कर के ध्यान दिलाया है, इस मुआवजे के लिए जरूरी पूरी राशि भी, इसी सरकार द्वारा और कोविड के दौरान ही, कार्पोरेटों को दी गयी रियायतों में गयी राशि के, कुल दसवें हिस्से भी कम ही बैठेगी। जाहिर है कि समस्या संसाधनों की उतनी नहीं है, जितनी शासन करने वालों की प्राथमिकताओं की है।

प्रसंगवश याद दिला दें कि इस महामारी के बीच नयी संसद, प्रधानमंत्री महल आदि समेत सेंट्रल विस्टा के निर्माण पर प्रस्तावित 20 हजार करोड़ रुपए के खर्च को टाल दिया जाता, तो उक्त मुआवजे की जरूरत से फालतू राशि मिल सकती थी। लेकिन, कोविड की मार से आम जनता को राहत दिलाना तो मोदी सरकार की प्राथमिकता कभी थी ही नहीं, न पहली लहर के दौरान और न दूसरी लहर के दौरान। इसीलिए, तो इस आपदा के दौरान, दोनों चक्रों में मिलाकर भी, मोदी सरकार ने कोविड तथा उसका मुकाबला करने के लिए लगायी गयी पाबंदियों के मारे आम लोगों को मदद मुहैया कराने पर, देश के सकल घरेलू उत्पाद का मुश्किल से 2 फीसद खर्च किया होगा, जबकि अमरीका-इंग्लैंड जैसे धनी देशों ने भी, इसके लिए अपने जीडीपी का 10 से 20 फीसद तक खर्च किया है।

इस संकट की चौतरफा मार से बदहाल आम जनता की मदद करने के मामले में, मोदी सरकार की कंजूसी का आलम यह है कि महामारी के पहले चक्र के दौरान, खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में आने वालों को प्रतिव्यक्ति पांच किलो खाद्यान्न के साथ, हर महीना एक किलो दाल भी दी जा रही थी, लेकिन महमारी के दूसरे चक्र में यह सहायता देते हुए, मोदी सरकार ने एक किलो दाल देने से भी हाथ पीछे खींच लिए हैं।

अचरज नहीं कि यह सरकार, कोरोना की चपेट में आए लोगों के परिवारों को न्यूनतम मुआवजा देने से इंकार करने के लिए, अपना खाली खजाना दिखा रही है, जबकि सेंट्रल विस्टा से लेकर ‘मुफ्त टीका’ देने के प्रचार तक, मोदी की छवि बनाने पर खर्च करने के लिए, उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं है।

और चलते-चलाते, एक नजर इस प्रचार आंधी के जरिए मोदी की छवि बनाने के लिए किए जा रहे झूठे दावों पर।

पहली बात यह कि यह सब के लिए मुफ्त टीका किसी भी तरह नहीं है। चौथाई टीके निजी क्षेत्र में दिए जाने हैं और वह भी कई गुना ज्यादा दाम पर। सरकारी सुविधाओं में लगने वाला टीका ही मुफ्त होगा।

दूसरे, भारत की आबादी दुनिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा है और इसलिए अंतत: लगने वाले टीकों की कुल संख्या में भी, उसे पहले-दूसरे नंबर पर होना ही चाहिए, लेकिन फिलहाल तो भारत न तो लगाए गए टीकों की कुल संख्या में पहले नंबर के आस-पास भी है और न टीका लगवा चुकी आबादी के अनुपात में। और भाजपा अध्यक्ष, जे पी नड्डा द्वारा जोड़े गए सबसे तेज टीकाकरण के दावे के विपरीत, सचाई यह है कि टीकों की उपलब्धता की कमी के चलते, मई के महीने में देश भर में टीकाकरण की रफ्तार बहुत नीचे खिसक गयी थी। जून के महीने में इसमें कुछ सुधार जरूर हुआ है और 21 जून की ईवेंट के लिए एक दिन में टीकाकरण को रिकार्ड ऊंचाई तक बढ़ाया भी गया है, फिर भी टीकाकरण को इस स्तर पर बनाए रखने के लिए पर्याप्त टीके उपलब्ध होने में शक है।

वैसे भी, आगे इसी रफ्तार से टीकाकरण हुआ तब भी, टीकाकरण के दायरे में आने वाली आधी आबादी का ही पूर्ण टीकाकरण इस साल के आखिर तक हो पाएगा। इसके बावजूद, ‘सबसे बड़े, सबसे तेज’ टीकाकरण अभियान के दावे, एक नेता की छवि बनाने के लिए, इस देरी से जुड़े खतरों को ढांपकर हमें, तीसरी लहर के लिए और ज्यादा अरक्षित बनाने का ही काम करेंगे। झूठा छवि निर्माण इसीलिए तो वास्तव में देश और जनता के लिए खतरनाक है।                                           0 राजेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लोकलहर के संपादक और हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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