हिंदी आज़ादी की लड़ाई की राष्ट्रभाषा थी, जो सत्ता की राजभाषा बन गयी?

अंग्रेजी का विरोध क्यों हुआ? स्वतंत्रता सेनानियों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पेशकश क्यों की थी? हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के क्या उद्देश्य थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लक्ष्य क्या थे?
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Hindi Diwas

Hindi Diwas : Hindi was the national language of the freedom struggle, which became the official language of power?

What were the objectives of making Hindi the national language?

हिंदी दिवस पर रस्म अदायगी (Rituals on Hindi Diwas) करने वालों से निवेदन है कि भारत के सभी प्रान्तों के मनीषियों और विशेष तौर पर स्वतंत्रता सेनानियों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पेशकश क्यों की थी? हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के क्या उद्देश्य थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लक्ष्य क्या थे?

अपने गिरेबाँ में कम से कम आज झांककर देखें कि हम उन उद्देश्यों और लक्ष्यपन के प्रति कितने ईमानदार हैं?

अंग्रेजी का विरोध क्यों हुआ? Why was there opposition to English?

अंग्रेजी का विरोध इसलिए हुआ कि वह नस्ली साम्राज्यवाद और सत्ता की भाषा है। हिंदी की वकालत इसलिए की जाती रही है कि देश का हर नागरिक हिंदी समझता है, भले लिख या पढ़ न सके। इसमें भी हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का बड़ा हाथ है।

हिंदी को आम लोगों, गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की भाषा बनाने की महत्वाकांक्षा थी।

हिंदी को मुक्त बाजार, सामन्तवाद, साम्राज्यवाद और निरंकुश सत्ता की भाषा कौन बना रहे हैं?

हिंदी को जाति, वर्ण, नस्ल क्षेत्र के वर्चस्व की भाषा बनाने  के एकाधिकार अभियान के कुलीनत्व के बाद हम किस हिंदी का दिवस बना रहे हैं, जिसके साहित्य और मीडिया में सिर्फ सत्ता की बर्बर अभिव्यक्ति है और आम जनता, गरीबों, स्त्रियों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, विस्थापितों, बेदखल लोगों की हाशिये की आवाज गायब है?

हिंदी आज़ादी की लड़ाई की राष्ट्रभाषा थी जो सत्ता की राजभाषा बन गयी?

क्या हमने इस माफिया तंत्र का कभी विरोध किया?

क्या हिंदी को हम ज्ञान विज्ञान, इतिहास भूगोल, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र की भाषा बना सके?

क्यों हमारे घरों में हिंदी की पुस्तकें और पत्र पत्रिकाएं नहीं हैं?

क्यों हमारे सबसे मेधावी बच्चे हिंदी नहीं पढ़ते?

क्यों हिंदी जनता से कोई सरोकार नहीं है साहित्य, कला, रंगकर्म, सिनेमा और मीडिया को?

कम से कम आज इन अप्रिय प्रश्नों पर सोचें जरूर।

पलाश विश्वास

50 साल से हिंदी का एक अजनबी कलमकार

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