लखीमपुर खीरी नरसंहार के निहितार्थ : आखिरकार, फासीवाद का यही रास्ता है

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Implications of Lakhimpur Kheri Massacre: After all, this is the path of Fascism

प्रधानमंत्री जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पिछले संबोधन में भारत के दुनिया भर में लोकतंत्र की ‘‘मां’’ होने की शेखी बघार रहे थे, शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं होगा कि उनकी सरकार का वास्तविक आचरण, मुश्किल से एक पखवाड़े में सारी दुनिया के सामने उनके राज की ‘जनतांत्रिकता’ की पोल खोल देगा। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी की हाल की अमरीका यात्रा (PM Modi's recent visit to America) के दौरान, असम में दारांग में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जों से बेदखल करने के नाम पर, मोदी की ही पार्टी की सरकार की सशस्त्र पुलिस द्वारा दो निहत्थे गरीब मुसलमान बंगाली किसानों को, जिनमें एक तो बारह साल का लडक़ा ही था, घेर कर गोली से उड़ा दिए जाने की नृशंसता ही काफी होनी चाहिए थी। लेकिन, मोदी निजाम के लिए तो उसके अगले ही हफ्ते में, सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए लखीमपुर खीरी में तिकुनिया में, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और उसके बेटे की कारों के काफिले से जान-बूझकर किसानों को कुचल डालने की बर्बरता भी काफी नहीं हुई। इसीलिए, मोदी-शाह निजाम ने न सिर्फ इस बर्बरता के शिकार हुए चार किसानों, एक पत्रकार और यहां तक कि अपनी पार्टी के तीन कार्यकर्ताओं के लिए भी संवेदना के दो शब्द तक बोलना जरूरी नहीं समझा, बल्कि अपनी सरकार के उस जूनियर मंत्री को कम से कम किसी तरह की जांच होने तक हटाने से भी बड़ी हिकारत से इसके बावजूद इंकार कर दिया कि सीधे उसका ही उकसावा इस बर्बरता की जड़ में था, जिसके लिए एफआइआर में उसका नाम भी आया है और उसके बेटे पर सीधे इस बर्बरता को अंजाम देने के आरोप हैं।

मोदी सरकार की इसी दीदादिलेरी ने, देश की समूची कानून-व्यवस्था के सामने एक ऐसी शर्मिंदगी की स्थिति पैदा की है, जिसकी दूसरी मिसाल शायद ही मिलेगी। लखीमपुर खीरी कांड के पांचवे दिन, देश की सर्वोच्च अदालत ने इस बर्बरता पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई करते हुए, न सिर्फ उत्तर प्रदेश की सरकार को पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाने के लिए फटकार लगायी तथा पूछा कि पुलिस सामान्यत: ऐसे मामले में गिरफ्तारी आदि की जो कार्रवाई करती, क्यों नहीं कर रही है, बल्कि अदालत की सख्त नाराजगी ने प्रदेश सरकार के वकील, हरीश साल्वे को भी यह कबूल करने के लिए मजबूर कर दिया कि, ‘जो किया जाना चाहिए था, नहीं किया गया है!’

लेकिन, इस सबसे भी असाधारण यह कि इस सारी नाराजगी के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिकाकर्ता की इस प्रकरण की जांच सीबीआइ को सौंपने की मांग को एक ऐसे कारण से फिलहाल टाल दिया, जो कारण इससे पहले शायद ही कभी इस अदालत की जुबान पर आया होगा। सुप्रीम कोर्ट ने नाम न लेते हुए भी बलपूर्वक कहा कि इस कांड से जो लोग जुड़े हुए हैं उन्हें देखते हुए, सीबीआइ जांच को विकल्प नहीं माना जा सकता।

इशारा एकदम साफ था। चूंकि यह कांड मोदी सरकार के एक मंत्री और उसके बेटे से जुड़ा हुआ है, इसलिए केंद्र सरकार के आधीन सीबीआइ पर इस मामले में भरोसा नहीं किया जा सकता! मोदी सरकार और उसके राज में कानून के शासन की स्थिति पर, इससे सख्त टिप्पणी दूसरी नहीं हो सकती है। केंद्र सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले कभी इस तरह अविश्वास नहीं जताया होगा(

इसके बावजूद, मोदी सरकार अजय मिश्र टेनी को मंत्रिपद से हटाकर अपनी भूमिका के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट की उक्त आशंका को दूर करने का प्रयास करेगी, इसकी उम्मीद शायद ही किसी को होगी।

इसका संबंध मोदी सरकार की आम तौर पर बढ़ती निरंकुश हेकड़ी से है, जो तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर, पिछले दस महीने से देश में चल रहे किसान आंदोलन के संंबंध में खासतौर पर नंगी हठधर्मिता बनकर सामने आयी है।

शायद इसकी वजह यह है कि मोदी सरकार, दमन, दुष्प्रचार, विभाजन, आदि आदि अपने सारे हथियारों को आजमाने के बावजूद, इस किसान आंदोलन को न तो कमजोर कर पायी है, न बांटकर दबा पायी है। बल्कि जैसाकि इसी 27 सितंबर को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर आयोजित और ट्रेड यूनियनों, विभिन्न अन्य जनसंगठनों तथा अधिकांश विपक्षी राजनीतिक पार्टियों द्वारा समर्थित भारत बंद की असाधारण सफलता ने दिखाया है, यह आंदोलन सीधे मोदी राज को ही चुनौती दे रहा है और यह चुनौती समय के साथ अपनी क्षेत्रीय व्यापकता तथा मेहनतकशों के समर्थन की गहराई में, बढ़ती ही जा रही है।

किसान आंदोलन का आने वाले विधानसभाई चुनावों में भाजपा को हराने के नारे के साथ आपरेशन यूपी तथा आपरेशन उत्तराखंड छेडऩा, मोदी राज की सबसे कमजोर नस दबाता है।

   इसके बावजूद, मोदी राज जिस कार्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ पर टिका है, उसे देसी-विदेशी कार्पोरेटों की बड़े पैमाने पर घुसपैठ तथा उनके नियंत्रण के लिए, कृषि क्षेत्र को खोलने वाले उक्त कृषि कानूनों का वापस लिया जाना, मंजूर नहीं है। जाहिर है कि इसके पीछे इसका एहसास भी है कि इस मामले में एक बार उन्होंने पांव पीछे खींचे तो, आगे ऐसे कदम उठाना शायद ही संभव होगा। यही है जो मौजूदा किसान आंदोलन के लिए चुनौती को और केंद्र सरकार के लिए इस किसान आंदोलन की चुनौती को भी, प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान देखने को मिले, भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को कमजोर करने के खिलाफ आंदोलन से कई गुना गंभीर बना देता है, जिसके सामने मोदी राज को झुकना पड़ा था।

बहरहाल, दूसरे कार्यकाल में जब कार्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ और पुख्ता हो गया है, अपने अस्तित्व की चिंता से किसानों के इन कृषि कानूनों की वापसी की मांग पर डट जाने और इस प्रक्रिया में उनके आंदोलन के मजदूरों समेत अन्य सभी तबकों के असंतोष के आंदोलनों का रूप लेने के लिए उत्प्रेरण बन जाने से, मौजूदा निजाम खुद को घिरता हुआ देख रहा है। और चूंकि झूठे दावों व प्रचार के अलावा यह गठजोड़ और उसका निजाम, सांप्रदायिक विभाजन के जिस इकलौते हथियार को जानता है, वह इस मामले में काम नहीं कर रहा है या भोंथरा होता जा रहा है; बौखलाहट में वे बढ़ते पैमाने पर शासन के दमनतंत्र के अलावा शासन-इतर हिंसा का सहारा लेने की ओर बढ़ चले हैं।

किसान आंदोलन के संदर्भ में इसकी शुरूआत तो तभी हो गयी थी, जब 26 जनवरी की लाल किले की प्रायोजित घटना को दुहने की अपनी सारी कोशिशों के खास कारगर साबित न होने के बाद, संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने विभिन्न बार्डरों पर किसानों के शिविरों पर हमले करने की कोशिश की थी। लेकिन, जब यह कोशिश खास काम नहीं आयी और उसके बाद किसानों को अनदेखी के जरिए थकाने की कोशिशों से भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ, तो हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि में स्थानीय रूप से शासन की हिंसा का सहारा लिया गया। लेकिन, इन कोशिशों से भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ है, उल्टे इन कोशिशों के जवाब में किसान आंदोलन को ही ताकत मिलती नजर आयी है। ऐसे में उनके लिए एक शासन-इतर हिंसा का ही सहारा रह गया है।

इसीलिए, अचरज की बात नहीं है कि अजय मिश्र टेनी ने, हाल के भारत बंद से दो दिन पहले, 25 सितंबर को ही संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए, किसान आंदोलन तथा उसके नेताओं को ‘सामना करा के दो मिनट में ठीक करने’ की धमकी दी थी और यह भी कहा था कि वह अपनी असलियत पर आ गया तो उन्हें लखीमपुर-खीरी जिला ही छोड़ना पड़ जाएगा। असलियत पर आने का अर्थ भी उसने खुद ही स्पष्ट कर दिया--जो वह मंत्री, सांसद, विधायक आदि बनने से पहले थे यानी हत्या समेत चार मामलों में आरोपी रहे तथा अपने इलाके के थाने में हिस्ट्रीशीटर का ‘सम्मान’ प्राप्त, गुंडा!

क्या बाहुबली होने की इसी विशेष योग्यता के चलते, मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के पिछले विस्तार में अजय मिश्र को राज्य मंत्री बनाया था और अमित शाह की मदद करने की जिम्मेदारी सौंपी थी, इस पर तो दो रायें हो सकती हैं। लेकिन, इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि मोदी राज को टेनी जैसों की आगे-आगे और ज्यादा जरूरत होगी। और यह सिर्फ उत्तर प्रदेश के आने वाले चुनाव का मामला नहीं है, जिसके जाति समीकरण के लिए संघ परिवार के लिए ब्राह्मण बाहुबली की उपयोगिता स्वयंसिद्ध है। बाहुबली की अपनी भी उपयोगिता है। इसीलिए, मोदी निजाम राजनीतिक नैतिकता जैसी नफासतों के लिए, ऐसे एसेट को कुर्बान करने के लिए तैयार नहीं है। इसकी वजह से किसानों के हत्यारों को बचाने की कोशिश करने के लिए थोड़ी-बहुत आलोचना झेलनी भी पड़े तो, उसके लिए वह तैयार है।

याद रहे कि यह मिश्रा पिता-पुत्र जैसे इक्का-दुक्का बाहुबलियों के उपयोग का ही मामला नहीं है। जिस रोज लखीमपुर खीरी की नृशंसता की खबर आयी, उसी रोज हरियाणा के मुख्यमंत्री, मनोहरलाल खट्टर का भी एक वीडियो वाइरल हो रहा था। वीडियो में खट्टर को भाजपा के किसान कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में इसका आह्वान करते देखा जा सकता है कि राज्य के किसान आंदोलन के ज्यादा प्रभाव वाले इलाकों में, नये खड़े किए जा रहे किसान संगठनों को बढ़ावा देने के अलावा, जिले-जिले में अपने पांच सौ, सात सौ, हजार वालंटियर खड़े करें और ‘उठा लो लट्ठऔर हो जाए दो ‘जैसे को तैसा’।

मुख्यमंत्री ने न सिर्फ यह आश्वासन दिया कि उनके रहते किसी को सजा-वजा की परवाह करने की जरूरत नहीं है और जो चार-छ: महीने जेल में रह आया, खुद ही नेता बन जाएगा! बेशक, खट्टर ने बाद में ‘उठा लो लट्ठकर दो ‘जैसे को तैसा’ के अपने बयान वापस लेने का एलान किया है। लेकिन, सवाल बयान का नहीं, उसके जरिए सामने आ रही कार्यनीति का है। किसान-मजदूर आंदोलन और बढ़ते जन-असंतोष की चुनौती के सामने मोदी निजाम में संघ-भाजपा जोड़ी, फूट डालने से आगे अब उसे हिंसा का औजार बनाने की ओर बढ़ते नजर आते हैं। इसके लिए शांति की बलि चढ़ाने में उन्हें कोई हिचक नहीं होगी। आखिरकार, फासीवाद का यही रास्ता है।                

0 राजेंद्र शर्मा

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