राजधानियों में ही नहीं, हर जिले में हर गांव में किसान आंदोलन की जरूरत

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राजधानियों में ही नहीं, हर जिले में हर गांव में किसान आंदोलन की जरूरत
सड़क पर ही नहीं, राजधानियों में ही नहीं, हर जिले में हर गांव में किसान आंदोलन की जरूरत है। वैचारिक लड़ाई के साथ सत्ता के प्रचारतंत्र के मुकाबले की भी जरूरत है।

Not only on the road, not only in the capitals but there is also a need for farmers' movement in every village in every district.

सड़क पर ही नहीं, राजधानियों में ही नहीं, हर जिले में हर गांव में किसान आंदोलन की जरूरत है। वैचारिक लड़ाई के साथ सत्ता के प्रचारतंत्र के मुकाबले की भी जरूरत है।

पलाश विश्वास

रुद्रपुर गोल मार्केट गुरुद्वारा (Rudrapur Gol Market Gurdwara) में हुई बैठक आम बैठक नहीं थी। यह बैठक समस्त किसान संगठनों को लेकर उत्तराखण्ड में संयुक्त किसान मोर्चा के निर्माण,  मोर्चे के कार्यक्रमों की तैयारी और आंदोलन को गांव गांव तक फैलाने के लिए किसान संगठनों के नेताओं और प्रतिनिधियों की विशेष सभा थी।

इस बैठक में शामिल होने और अपनी बात रखने का मौका देने के लिए हम किसान नेताओं और प्रतिनिधियों के आभारी हैं।

हम मानते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है। भारत मूलतः खेतों, खलिहानों और गांवों का देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि अर्थव्यवस्था है।

जबकि मुक्त बाजार के कारपोरेट राज किसान,  गांव, खेत, खलिहान, जल, जंगल जमीन,  पर्यावरण,  मौसम, जलवायु, पृथ्वी और प्रकृति के खिलाफ है।

मौजूदा तीन काला कृषि कानून देश की तबाही, खाद्य संकट और प्राकृतिक संसाधनों के साथ जल जंगल जमीन की खुली लूट का चाकचौबंद इंतज़ाम है।

खाद्य संकट, जल संकट और जलवायु संकट से भारत देश का हर नागरिक प्रभावित है।

सिर्फ किसानों के लिए नहीं, हर भारतवासी के लिए किसानों की यह अभूतपूर्व लड़ाई जीने मरने की लड़ाई है।

हमारा स्पष्ट मत है कि यह सिर्फ सड़क और संसद की लड़ाई नहीं है, यह बेहद गम्भीर राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई है।

आंदोलन खत्म हुआ नहीं है। आंदोलन जारी है और दर्जनों लोगों ने शहादतें दी है लेकिन सत्ता टस से मस नहीं हो रही। वह कारपोरेट हित साधने के लिए मेहनतकश जनता का सत्यानाश करने पर तुली हुई है।

उसका दमन, उसका प्रचार तंत्र,  उसका यंत्र मंत्र सब कुछ संस्थागत और कारपोरेट है। उसके खिलाफ गांवों में ठोस मॉर्चाबन्दी की जरूरत है।

किसान आंदोलन की विरासत (Legacy of the Peasant Movement) दो सौ साल पुरानी है। आदिवासी प्रतिरोध हजारों साल पुराना है। आंदोलन नया नहीं है लेकिन सत्ता और राष्ट्र की पूरी संरचना बदल गयी है जो जनविरोधी, निरंकुश और फासिस्ट है।

आंदोलन है, उसकी खबरें नहीं है। आम जनता और गांवों, किसानों को अपने हक हकूक और किसानों के आंदोलन के बारे में सही सूचना नहीं मिल रही है और ये तमाम लोग कारपोरेट सत्ता और बाज़ार के शिकंजे में हैं।

यह जितनी वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई है, उतनी ही सामाजिक लड़ाई भी है, उतनी ही सूचना की लड़ाई है। गलत सूचना और ब्रेन वाशिंग के खिलाफ वैकल्पिक मीडिया की लड़ाई है।

हमने चिपको आंदोलन का उदाहरण दिया, जब हम पत्र पत्रिकाओं के साथ-साथ रोजाना, साप्ताहिक और मासिक बुलेटिन से जनमत तैयार करते थे।

हम किसान संगठनों और नेताओं के साथ महापंचयतों या राजधानियों में नहीं होंगे,  लेकिन जिलों और गांवों में हम उनकी मशाल लेकर चलने को तैयार हैं। यही हमारा मिशन है।

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