राजनीति के अपराधीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय का तमाचा

भाजपा और मोदीजी ने भी राजनीति को अपराध मुक्त बनाने का जो वादा किया था वह उनके सत्ता संभालने के सवा सात साल बाद भी पूरा होने के बजाय कोरा जुमला ही साबित हुआ।
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Jaishankar Gupta जयशंकर गुप्त, वरिष्ठ पत्रकार हैं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य रहे हैं, देशबन्धु अखबार के कार्यकारी संपादक हैं।

Supreme Court slap on criminalization of politics

राजनीति का तेजी से हो रहा अपराधीकरण (rapid criminalization of politics) पिछले कई दशकों से भारतीय राजनीति और हमारे संसदीय लोकतंत्र को भी डसे जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की नजर में 'राजनीतिक व्यवस्था के अपराधीकरण का खतरा लगातार बढ़ते जा रहा है। राजनीतिक व्यवस्था की शुद्धता के लिए आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को कानून निर्माता बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।'

'राजनीति के अपराधीकरण' पर आज तक रोक नहीं लग सकी

कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो यह किसी भी राजनीतिक दल और आम जनता के लिए भी विशेष चिंता का विषय नहीं रह गया है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र (world's largest democracy) कहे जाने वाले भारत में चुनाव सुधारों (election reforms in india) की बात तो लंबे समय से होती रही है। लेकिन, आज तक 'राजनीति के अपराधीकरण' पर रोक नहीं लग सकी है। 

अपराधी पृष्ठभूमि के सांसदों की संख्या कितनी है?

2004 में अपराधी पृष्ठभूमि के सांसदों की संख्या 128 थी जो वर्ष 2009 में 162, 2014 में 185 और वर्ष 2019 में बढ़कर 233 हो गई।

भाजपा ने 7 अप्रैल 2014 को लोकसभा चुनाव के लिए जारी अपने चुनाव घोषणा पत्र में अपराधियों को राजनीति से बाहर करने के लिए कटिबद्धता जाहिर की थी। मोदी जी ने खुद राजस्थान में अपने चुनावी भाषणों में कहा था, ''आजकल यह चर्चा जोरों पर है कि अपराधियों को राजनीति में घुसने से कैसे रोका जाए। मेरे पास इसका एक ठोस इलाज है। मैंने भारतीय राजनीति को साफ करने का फैसला कर लिया है। मैं इस बात को लेकर आशान्वित हूं कि हमारे शासन के पांच सालों बाद पूरी राजनीतिक व्यवस्था साफ-सुधरी हो जाएगी और सभी अपराधी जेल में होंगे। इसमें कोई भेदभाव नहीं होगा और मैं अपनी पार्टी के दोषियों को भी सजा दिलाने से नहीं हिचकूंगा।''

प्रधानमंत्री बनने के बाद 11 जून 2014 को संसद में अपने पहले भाषण में भी उन्होंने चुनावी प्रक्रिया से आपराधिक छवि के जन प्रतिनिधियों को बाहर करने की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा था कि उनकी सरकार ऐसे नेताओं के खिलाफ मुकदमों के तेजी से निपटारे की प्रक्रिया बनाएगी।

मोदी जी की मंत्रिपरिषद में 31% के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज थे

लेकिन उनकी इन घोषणाओं का हुआ क्या! 2014 के चुनाव में जीते भाजपा के 282 सांसदों में से 35 फीसदी (98) सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से 22 फीसदी के खिलाफ तो गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। इन्हें उम्मीदवार किसने और क्यों बनाया था। यही नहीं, मोदी जी की मंत्रिपरिषद में भी 31 फीसदी के विरुद्ध आपराधिक और इनमें से 18 फीसदी यानी 14 मंत्रियों के खिलाफ तो गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। इन्हें ठोक बजाकर मंत्री भी तो मोदी जी ने ही बनाया था ! 14 दिसंबर 2017 को केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर बताया था कि उस समय 1581 सांसद व विधायकों पर करीब 13500 आपराधिक मामले लंबित हैं और इन मामलों के निपटारे के लिए 12 विशेष अदालतों का गठन होगा। इसके बाद 12 मार्च 2018 को केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि देश के 1,765 सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।

जाहिर सी बात है कि भाजपा और मोदीजी ने भी राजनीति को अपराध मुक्त बनाने का जो वादा किया था वह उनके सत्ता संभालने के सवा सात साल बाद भी पूरा होने के बजाय कोरा जुमला ही साबित हुआ।

इस दौरान उनकी पार्टी के कई सांसदों, मंत्रियों और विधायकों पर भी कई अपराध कर्म में शामिल होने के गंभीर आरोप लगे लेकिन उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की बात तो दूर, उन्होंने सामान्य नैतिकता के आधार पर किसी का इस्तीफ़ा तक नहीं लिया।

राजनीति के अपराधीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

यह सच है कि राजनीति में तेजी से बढ़ रहे अपराधीकरण को रोकने के लिए कोई भी राजनीतिक दल ठोस कदम उठाने को तैयार नहीं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी और आदेशों के जरिए न सिर्फ सरकार बल्कि हमारी पूरी राजनीतिक व्यवस्था पर भी करारा तमाचा जड़ा है।

उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं करने को अदालत के आदेश की अवमानना मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा और कांग्रेस समेत आठ राजनीतिक दलों पर एक लाख से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया। उन्हें सख्त निर्देश जारी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों को चयन के 48 घंटों के भीतर अपने उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि को अपने वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा। उम्मीदवार के चयन के 72 घंटे के अंदर इसकी रिपोर्ट चुनाव आयोग को भी सौंपनी होगी। चुनाव आयोग से भी इन सब बातों पर निगरानी रखने के लिए एक अलग प्रकोष्ठ बनाने को कहा गया है। यह प्रकोष्ठ सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के पालन पर निगरानी रखेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने एक और मामले में महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए कहा है कि राज्य सरकारें अब आपराधिक मामलों का सामना कर रहे जन प्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को हाई कोर्ट की अनुमति के बिना वापस नहीं ले सकेंगी। आपराधिक मामलों में सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों को हमेशा के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2020 के बाद सांसदों-विधायकों के विरुद्ध वापस लिए गए मुकदमों को दोबारा खोलने का आदेश भी दिया।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह बड़ा कदम एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया की रिपोर्ट के मद्देनजर उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी बीजेपी विधायकों तथा कुछ अन्य लोगों के खिलाफ 76 मामले तथा कर्नाटक सरकार अपने विधायकों के खिलाफ 62 मामलों को वापस ले चुकी है। उत्तराखंड और महाराष्ट्र सरकारें भी इसी तरह केसेज वापस लेना चाहती हैं। इससे पहले भी राज्य सरकारें अपने करीबी नेताओं पर चल रहे आपराधिक मुकदमों को जनिहत के नाम पर वापस लेती रही हैं।

बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के इन आदेशों के बाद कहा जा सकता है कि अपराधी छवि वाले नेताओं के लिए चुनाव लड़ने और राजनीतिक दलों को उन्हें उम्मीदवार बनाने में मुश्किलें होंगी। लेकिन क्या इससे राजनीति में अपराधीकरण पर रोक भी लग सकेगी! इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए फैसले और टिप्पणियां करते रहा है। 2002 में सभी तरह के चुनाव में उम्मीदवारों को उनकी आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि की घोषणा को अनिवार्य बनाया गया।

2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने दो साल से ज्यादा कारावास की सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी थी। 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी ठहराए गए, सांसदों और विधायकों को उनके पद पर बने रहने की अनुमति के खिलाफ फैसला सुनाया था। इसी साल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ईवीएम में नोटा का बटन भी जोड़ा गया था।

2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से गंभीर अपराध के आरोपों वाले नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने की सिफारिश की थी। 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों के तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन का आदेश दिया था। लेकिन इनमें से कितनों पर अमल हुआ !

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं। वह विधायिका के कार्यों पर सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

अगर राजनीतिक दल इस मामले में अपनी ओर से कोई पहल नहीं करें तो सर्वोच्च न्यायालय क्या कर सकता है! लिहाजा हमारे राजनीतिक दलों को ही एक राय से गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को राजनीति से परे रखने के लिए संसद से कड़ा कानून बनाना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि संसद से कानून बनाकर आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को राजनीति में आने से रोका जाना चाहिए। कई बार बहुत सारे राजनीतिक दलों के नेता-कार्यकर्ताओं पर राजनीतिक विरोध, धरना, प्रदर्शन और आंदोलन के क्रम में तथा आंदोलन के दौरान यदा-कदा हुई हिंसक घटनाओं को लेकर भी मुकदमे दर्ज होते रहते हैं। उनका क्या होगा। इस पर भी हमारी सर्वोच्च अदालत, संसद और अन्य संबद्ध संस्थाओं को विचार करने की आवश्यकता है।

बहरहाल, क्या हमारी सरकार और हमारे राजनीतिक दल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश-निर्देशों के अनुरूप इस मामले में कोई ठोस पहल करेंगे ! दरअसल, सभी दल चुनाव सुधारों की बात तो जोर-शोर से करते हैं लेकिन मौका मिलते ही अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए उन सभी बुराइयों का लाभ लेने में जुट जाते हैं जिनका चुनाव सुधारों के क्रम में निषेध आवश्यक है।

जयशंकर गुप्त

लेखक Jaishankar Gupta जयशंकर गुप्त, वरिष्ठ पत्रकार हैं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य रहे हैं, देशबन्धु अखबार के कार्यकारी संपादक हैं। 

(यह लेख मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित हुआ है। उस लेख का संपादित रूप साभार)

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