सीआईए-पेंटागन की देन है तालिबान की सत्ता में वापसी

मोदी सरकार ने विदेश नीति और विदेश मंत्री को निष्क्रिय बनाकर अप्रत्यक्ष तौर पर तालिबान की मदद की है। इससे वहाँ रहने वाले भारतीयों को नुक़सान पहुँचा है। भारतीय निवेश ख़तरे में पड़ा है। साथ ही भारत इस उपमहाद्वीप में पूरी तरह अलग-अलग पड़ गया है। 
 | 
CIA-Pentagon की देन है तालिबान की सत्ता में वापसी

Taliban's return to power is due to CIA-Pentagon

अफ़ग़ानिस्तान में अराजकता (chaos in afghanistan) फैली है। वहां कोई सरकार नहीं है, जो सरकार थी वह भाग गई। सेना ने समर्पण कर दिया। तालिबान ने 31 प्रांतों पर क़ब्ज़ा कर लिया है। काबुल पर भी उनका कब्जा है लेकिन वहाँ राष्ट्रीय या क्षेत्रीय प्रशासन जैसा नियमन करने वाला ढाँचा और व्यवस्था नहीं है।

तालिबान का शासन अफ़ग़ानिस्तान में आने वाला है इस बात को दुनिया का हरेक समझदार व्यक्ति विगत एक साल से साफ़तौर पर देख पा रहा था। लेकिन भारत सरकार नहीं देख पाई, मोदी सरकार क्यों नहीं देख पाई यह अभी तक रहस्य बना है !

अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर क्या असर पड़ेगा? | What will be the impact on the Indian subcontinent after the Taliban comes to power in Afghanistan?

तालिबान के काबुल में आने के बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर व्यापक असर पड़ने की संभावनाएं हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक-आर्थिक अस्थिरता बढ़ेगी। आतंकवादी राजनीति (terrorist politics) फैलेगी। नफरत की राजनीति और अधिक ज़ोर पकड़ेगी।

ग्लोबल आतंकी फिनोमिना है तालिबान फिनोमिना | Taliban Phenomina is Global Terrorist Phenomena

तालिबान फिनोमिना महज़ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं है बल्कि वह ग्लोबल आतंकी फिनोमिना है। यह अमेरिकी साम्राज्यवाद, बहुराष्ट्रीय निगमों और कारपोरेट घरानों की सम्मिलित बृहत्तर राजनीतिक कार्य योजना का आधारभूत मॉडल है। स्थानीय स्तर पर इसके विभिन्न देशों में अलग-अलग नाम हैं। लेकिन मूलभूत मॉडल एक है। इस मॉडल का लक्ष्य है भारतीय उपमहाद्वीप सहित विश्व में सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजन पैदा करना, नफ़रत, बाहुबल-बंदूक और बम की राजनीति को अनिवार्य और अपरिहार्य बनाना।

यह मॉडल बुनियादी तौर पर सीआईए-पेंटागन के दिमाग़ की उपज है। विभिन्न नामों और वैचारिक रंगों में पाकिस्तान, भारत, बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार आदि में इस मॉडल को देख सकते हैं, साथ ही अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन आदि विकसित पूँजीवादी मुल्कों में भी देख सकते हैं। इस मॉडल के आधार पर मध्यपूर्व के देशों में बड़े-बड़े आतंकी केन्द्र विकसित किए गए हैं जो विश्व स्तर पर नफ़रत, अराजकता और आतंकवाद के वर्चस्व को स्थापित करने का काम कर रहे हैं।

सीआईए-पेंटागन ने तैयार किया आतंकी राजनीतिक श्रम विभाजन

सीआईए-पेंटागन ने विभिन्न देशों के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग कार्यनीतियों को लागू करने का ज़िम्मा अलग-अलग रंगत के संगठनों और दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों को सौंपा हुआ है। इसे आतंकी राजनीतिक श्रम विभाजन कह सकते हैं।

ग्लोबल से लेकर स्थानीय स्तर तक इस मॉडल का बुनियादी लक्ष्य है लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संप्रभु राष्ट्र की परिकल्पना और व्यक्ति के आधुनिक पहचान के जातीयतावादी रुप को नष्ट करके असंवैधानिक सत्ता केन्द्र, सैन्यवाद, जातिवाद, धार्मिक नफ़रत, राष्ट्रवाद, हिंसा आदि को बढ़ावा देना। उन राजनीतिक ताक़तों को बढ़ावा देना जो इस लक्ष्य के लिए समर्पित हों और उनको येन-केन-प्रकारेण उनको सत्ता पर बिठाना। यही वह बुनियादी विश्व परिप्रेक्ष्य है जिसकी रोशनी में अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे तालिबान प्रकरण को ऐतिहासिक नज़रिए से देखने की ज़रूरत है। सतह पर यह लोकल फिनोमिना नज़र आता है लेकिन यह लोकल -ग्लोबल दोनों है। इसके लोकल और ग्लोबल प्रभाव को समान रुप से देख सकते हैं।

कहने का आशय यह कि इन दिनों कोई भी फिनोमिना या प्रवृत्ति सिर्फ़ स्थानीय नहीं रहती, वह विश्वव्यापी असर छोड़ती है।

अफ़ग़ानिस्तान के प्रसंग में मोदी सरकार ने क्या राजनीतिक भूल की | What political mistake did the Modi government make in the context of Afghanistan?

अफ़ग़ानिस्तान के प्रसंग में मोदी सरकार ने सचेत रुप से कोई राजनीतिक पहल न करके सबसे बड़ी ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है। भारत का अफ़ग़ानिस्तान में बाइस हज़ार करोड़ रुपए से अधिक का पैसा विभिन्न परियोजनाओं में लगा है। सरकार ने इस निवेश को बचाने के लिए तालिबान से कोई संवाद क्यों नहीं किया यह अपने आपमें रहस्य है। तालिबान से बात न करने से भारत की व्यापक धन, जन और राजनीतिक क्षति हुई है। जबकि विभिन्न देश अपने निवेश और हितों की रक्षा के लिए तालिबान के साथ विगत एक साल से नियमित संवाद करते रहे हैं। इस काम में उनको अभीप्सित सफलता भी मिली है।

तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में आने से अफ़ग़ानी उदारवादियों और धर्मनिरपेक्ष लोगों के जीवन के लिए गंभीर असुरक्षा बोध पैदा हुआ है। इसके कारण हज़ारों अफ़ग़ानी वहाँ से भाग रहे हैं और दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं। इनमें अफ़ग़ानिस्तान के मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा शामिल है, इनमें वे लोग भी शामिल है जो विगत बीस साल से अमेरिकी प्रशासन की अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय तौर पर मदद कर रहे थे।

आम अफ़ग़ानी जनता को निरंतर आतंक में रहने के कारण विश्वास नहीं हो रहा कि तालिबान का शासन उनको सुरक्षा और शांति दे पाएगा। यही वजह है तालिबान के काबुल में क़ब्ज़ा कर लेने के बाद से पूरे देश में असुरक्षा की लहर चल पड़ी है। आम अफ़ग़ानी परेशान है। पूरे देश में संचार और परिवहन प्रणाली एकदम ठप्प है। बैंक ख़ाली पड़े हैं। बाज़ार में अफरा तफरी मची। औरतों और युवाओं में भयानक दहशत है। इस समूची परिस्थिति का प्रधान कारण तालिबान का बुनियादी आतंकी चरित्र (Basic Terrorist Character of Taliban)

अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा, अब आगे क्या होगा? 

सवाल यह है क्या इस अवस्था से अफ़ग़ानी समाज बच सकता था ? क्या भारत अपने मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर कोई सकारात्मक संवाद-संपर्क और वैकल्पिक राजनीतिक समाधान पेश कर सकता था ? भारत सरकार ने कोई राजनीतिक पहल क्यों नहीं की ? क्यों समय रहते अफ़ग़ानिस्तान से भारतीयों को निकाला नहीं ?

सबसे बड़ी बात यह भारत की विदेश नीति को क्यों निष्क्रिय किया गया ? इन सभी सवालों के उत्तर मोदी सरकार को देने चाहिए।

मोदी सरकार ने विदेश नीति और विदेश मंत्री को निष्क्रिय बनाकर अप्रत्यक्ष तौर पर तालिबान की मदद की है। इससे वहाँ रहने वाले भारतीयों को नुक़सान पहुँचा है। भारतीय निवेश ख़तरे में पड़ा है। साथ ही भारत इस उपमहाद्वीप में पूरी तरह अलग-अलग पड़ गया है। राजनीतिक तौर पर कमजोर हुआ है। यह स्थिति तब है जब भारत में क़ाबिज़ मोदी सरकार के पास पूर्ण बहुमत है। आरएसएस जैसे संगठन का सत्ता पर क़ब्ज़ा है। वे शक्तिशाली भारत बनाने के दावे करते रहे हैं लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के घटनाक्रम ने भारत को कमजोर और दीन-हीन देश, एक ऐसे देश के रूप में पेश किया है जिसकी कोई आवाज़ नहीं है, असर नहीं है, भूमिका नहीं है। वह सिर्फ़ अमेरिका का पिछलग्गू है।

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?

उपरोक्त स्थिति का प्रधान कारण है आरएसएस-भाजपा का अघोषित तौर पर सीआईए-पेंटागन के ग्लोबल लक्ष्यों की संगति में काम करना। इसके कारण वे अमेरिका की अफ़ग़ान नीति से भारत की अफ़ग़ान नीति को अलगाने में असमर्थ रहे।

विगत तीस सालों में आरएसएस-भाजपा ने सीआईए-पेंटागन के आतंकी मॉडल से अपने को अलगाने की बजाय जाने-अनजाने उसके साथ राजनीतिक एकीकरण की गंभीर कोशिशें की हैं और उसी की संगति में रंग-बिरंगी आतंककारी राजनीति की है यह वह बुनियादी कारण है जिसकी वजह से भारत की संप्रभु राष्ट्र के रुप में विदेश नीति को कोल्ड स्टोरेज में बंद कर दिया गया है। इससे भारत की एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपूरणीय क्षति हुई है।

प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription