मोदी युग में विश्वविद्यालय प्रोफ़ेसर और उच्च शिक्षा का अवमूल्यन

इरेशनल शिक्षण का नज़रिया शिक्षक के साथ छात्रों का भी अहित करता है। अफसोस की बात यह है कि इन दिनों अधिकांश प्रोफ़ेसर और छात्र इरेशनलिज्म के शिकार हैं। इससे मोदीपंथी राजनीति को उनकी मदद मिल रही है।
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Devaluation of higher education and University professors in Modi era


 Devaluation of higher education and University professors in Modi era

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में विभिन्न क्षेत्रों में जो तबाही मची है, उनमें उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मची तबाही के बारे में बहुत कम चर्चा मिलती है। सुनियोजित ढंग से उच्च शिक्षा के ढाँचे को ख़त्म किया जा रहा है। जेएनयू लेकर विश्वभारती तक सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भयानक स्थिति है। सत्ता से जुड़े लोगों की हर स्तर पर मनमानी चल रही है।

सत्तापंथी प्रोफ़ेसरों का जो फ़ार्मूला प्रचलन में है उसकी बुनियादी नीतिगत भाषा है- ‘‘हम कुछ भी वैध नहीं कर रहे, बस कोशिश कर रहे हैं कि वैध दिखें।’’ हम जो कुछ कर रहे हैं उसे लीगलाइज कर रहे हैं। इन लोगों का मानना है वैध काम करना जरूरी नहीं है, वैध दिखना जरूरी है। ये लोग विश्वविद्यालय और विभाग के किसी भी कन्वेंशन, नियम, अकादमिक ज़िम्मेदारी, विशेषज्ञता, कामकाज में विकेन्द्रीकरण आदि को नहीं मानते। इनका मानना है नेता जो कहे वो सही।

इस क्रम में व्यापक स्तर पर जुगाड़ की कार्यशैली, जुगाड़ की शिक्षण पद्धति, जुगाड़ से नियुक्तियाँ, जुगाड़ के तहत ही जातिवाद को भी जोड़ दिया गया है।

अकादमिक विशेषज्ञता, योग्यता, अकादमिक वरिष्ठता आदि का विभिन्न स्तरों पर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में विभागाध्यक्ष नियुक्ति से लेकर डीन आदि के पदों पर नियुक्तियाँ, प्रवक्ता से लेकर प्रोफ़ेसर पद तक हो रही नियुक्तियों में मनमाने, इरेशनल और बोगस अकादमिक आधार पर लिए गए फ़ैसले सामने आए हैं। ये सारे फ़ैसले केन्द्र सरकार और उनके इशारे पर काम रहे स्थानीय असंवैधानिक केन्द्रों के संरक्षण में लिए जा रहे हैं। ये मोदीपंथी प्रोफ़ेसर गिरोह है। इसने एक पूरा सुनियोजित जुगाड़ तंत्र और अवैध कार्यशैली का परिवेश पैदा कर दिया है। वहीं दूसरी ओर नियुक्तियों में इस्तेमाल होने वाले शोध पत्रिकाओं के स्तरहीन प्रकाशन और उसके आधार पर विभिन्न पदों पर नियुक्तियों का एक राष्ट्रीय वसूली रैकेट निर्मित हो चुका है।

स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अधिकांश विषयों के विभागों में विभागीय बैठक नहीं होतीं। सामूहिक फ़ैसले लेकर काम करने की परंपरा ख़त्म कर दी गई है। या फिर ख़ानापूर्ति के लिए बैठक होती है और उसमें गिरोह की बातों को ही फ़ैसले के रुप में थोप दिया जाता है। जो शिक्षक नहीं मानता उसके ख़िलाफ़ तेज़ी से माहौल बनाया जाता है। विभाग और शिक्षकों के कामकाज को लेकर सामूहिक लोकतांत्रिक नियमानुसार आपसी विचार विमर्श की विदाई हो चुकी है। विभाग से लेकर ऊपर तक विश्वविद्यालय में अकादमिक कामकाज को एक ही दिशा में काम करने, एक ही गिरोह के इशारे पर काम करने की पद्धति में तब्दील किया जा चुका है। इस पूरे परिवेश के ख़िलाफ़ प्रोफ़ेसरों में जिस तरह का प्रतिवाद और आलोचनात्मक संवाद होना चाहिए वह एकदम नदारत है।अधिकांश केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षक संघ सिर्फ़ सत्ता के कृपाकांक्षी बन गए हैं और उनके इशारों पर काम कर रहे हैं। जो प्रोफ़ेसर इस स्थिति से परेशान होकर आलोचना करते हैं उनकी राय को अनसुना किया जा रहा है या फिर उनको प्रशासनिक कोपभाजन का शिकार होना पड़ रहा है।

यानी विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वायत्तता और लोकतांत्रिक कार्यशैली को सुनियोजित ढंग से ख़त्म किया जा रहा है। प्रशासन का विरोध करने वाले शिक्षकों को विभिन्न तरीक़ों से प्रताड़ित किया जा रहा है।

सवाल यह है इस पूरे गैर-अकादमिक परिवेश को बदला कैसे जाय ?

क्या मोदी की केन्द्रीय सत्ता की राजनीतिक जी-हुजूरी करके इस परिवेश को बदला जा सकता है ? अथवा लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रतिवाद के ज़रिए इस माहौल को बदला जा सकता है ?

सवाल यह कि प्रोफ़ेसर क्या करें ?

असल में प्रोफेसर समुदाय को वस्तुगत नज़रिए से अकादमिक और कैंपस के प्रशासनिक कामकाज और अकादमिक परिवेश की नई शैली विकसित करनी होगी।विद्यार्थियों में ज्ञान की भूख या जिज्ञासा पैदा करनी होगी और नोट्स केन्द्रित शिक्षण पद्धति, कैरियरिज्म के नज़रिए को ख़त्म करना होगा। आज स्थिति यह है कि कैंपस बंद पड़े हैं। इसके पहले विश्वविद्यालय कैंपस में छात्रों को राजनीति करने से रोकने या कैंपस परिवेश के अपराधीकरण की सचेत कोशिशें केन्द्रीय सत्ता और उनके असंवैधानिक सत्ता केन्द्रों के ज़रिए होती रही हैं। इस अपराधीकरण के विभिन्न विश्वविद्यालय परिवेश गवाह हैं।

कैंपस को अपराधीकरण और अकादमिक दमन के चंगुल से निकालने के लिए सामूहिक अकादमिक प्रयासों की जरूरत है।

प्रोफ़ेसर का पहला काम है निम्नस्तरीय शिक्षण और शोध को रोकें। अपना नज़रिया बदलें। उनका काम है शिक्षा बदले, शिक्षा का माहौल बदले और देश बदले। उनका काम खाना-पूर्ति के तौर पर कक्षा लेना मात्र नहीं है। वे डिग्री दिलाने की मशीन के कलपुर्ज़े नहीं हैं। डिग्री दिलाने, नौकरी दिलाने के कलपुर्ज़े वाली धारणा से बाहर निकलकर समग्रता में सारी चीजों को देखने की जरूरत है। उनका काम है हृदय से, मन लगाकर कक्षा लेना, शोध करना और शोध निर्देशन करना।

एक प्रोफ़ेसर का पहला काम है जानना, (खोज करना), सोचना और फिर उसके अनुरुप आचरण करना। प्रोफेसर का काम किसी नेता, मंत्री, सांसद, मुख्यमंत्री या किसी संगठन विशेष की चमचागिरी करना बुनियादी काम नहीं हैं अकादमिक समय के अलावा वह यह काम करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन अकादमिक काम के समय उसे शुद्ध अकादमिक नज़रिए और आचरण के साथ काम करने की आदत और संस्कार नए सिरे से पैदा करने होंगे। कक्षा लेते समय कोई प्रोफ़ेसर सिर्फ़ पाठ तक केन्द्रित नहीं होता। इन दिनों विभिन्न विश्वविद्यालयों में जो पाठ्यक्रम प्रचलन में हैं उनके पढ़ाने की पद्धति को बदलने की जरूरत है।

मसलन, हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन को नोट्स केंद्रित रखकर और समाज से विच्छिन्न रखकर पढ़ाने की पद्धति और दृष्टि को ख़त्म करने की जरूरत है। इस तरह का शिक्षण अनैतिहासिक और समाज विरोधी है।

इस तरह की शिक्षण पद्धति ने पाठ्यक्रम को भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीति के समकालीन यथार्थ से काट दिया है। इससे पढ़कर निकलने वाले विद्यार्थियों में सामाजिक चेतना, अधिकारों की चेतना का विकास बाधित हुआ है और उनमें डिग्री पाने की चेतना, कैरियररिज्म आदि का तेज़ी से विकास हुआ है। इसने विद्यार्थियों के एक बड़े अंश को सामाजिक-संवैधानिक और मानवाधिकारों की रक्षा के दायित्व से विरत किया है और अ-राजनीति की राजनीति का उपकरण बनाकर आरएसएस के एजेंडे के इर्दगिर्द एकत्रित किया है। यही वह युवा वर्ग है जो इन दिनों लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और संविधान पर हो रहे हमलों के साथ खड़ा है और खुलेआम मानवाधिकारों का विरोध कर रहा है।

इसके अलावा पाठ्यक्रम को समाज की सम-सामयिकता से काटकर पढ़ाने वाले शिक्षकों का बड़ा हिस्सा खुलेआम मानवाधिकार विरोधी ताक़तों के साथ विभिन्न कैंपस में खड़ा हुआ है और शिक्षकों-छात्रों के लोकतांत्रिक हक़ों पर सत्ता के दमन तंत्र का हिस्सा बन गया है। इस स्थिति को बदलने के लिए प्रोफ़ेसरों के समग्र नज़रिए को बदलने की ज़रूरत है।

पढ़ाते समय अ-राजनीति की राजनीति, प्रॉपर्टी राइटस और कैरियरिज्म की शिक्षा देने की बजाय मानवाधिकार चेतना के विकास पर ज़ोर देना चाहिए। सुरक्षा की बजाय स्वतंत्रता की भावना के विकास पर ज़ोर देना चाहिए। कैरियरिज्म, सुरक्षा की भावना और लालच पैदा करने की संगठित कोशिशों का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। छात्रों-शिक्षकों अधिकार चेतना पैदा करने कोशिशें की जानी चाहिए।

कक्षा में पढ़ाते समय अस्पष्टता से बचा जाना चाहिए। शिक्षण में सकारात्मक बोध निर्मित करने, नकारात्मक से बचने की मनोदशा को स्वयं में विकसित करना चाहिए। रेशनल शिक्षण पद्धति ही छात्रों और शिक्षा के भविष्य को संवार सकती है और वही प्रोफ़ेसर को छात्रों में लोकप्रिय शिक्षक बनाने में मदद करती है। इरेशनल शिक्षण का नज़रिया शिक्षक के साथ छात्रों का भी अहित करता है। अफसोस की बात यह है कि इन दिनों अधिकांश प्रोफ़ेसर और छात्र इरेशनलिज्म के शिकार हैं। इससे मोदीपंथी राजनीति को उनकी मदद मिल रही है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

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