मान लो रेखाओं को सीता ने पार ही ना किया होता तो !

 | 
सीता पर कविता
 

जंगलों में

कुलांच भरता

मृग

सोने का है

या मरीचिका ?

जानना उसे भी था

मगर

कथा सीता की रोकती है

खींच देता है

लखन,लकीर

हर बार

धनुष बाण से

संस्कृति कहती

दायरे में हो,

हो तभी तक

सम्मान से

हाँ यह सच है

रेखाओं के पार

का रावण

छलेगा

फिर

खुद को रचने में

सच का

आखर

आखर भी जलेगा

मगर

इन खिंची लीकों पे

किसी को

पाँव तो धरना ही होगा

डरती सहमती

दंतकथाओं

का

मंतव्य

बदलना ही होगा

गर स्त्रीत्व को

सीता ने

साधारणतः

जिया होता

मान लो रेखाओं को

पार ही ना किया होता

तो

राक्षसी दंश से

पुरखे

कहाँ बचे होते

इतिहास ने भी

राम के गर्व ना रचे होते ...

डॉ. कविता अरोरा

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription