माणिक बंदोपाध्याय और समरेश बसु की कहानियों से ज्यादा मानवीय है शेखर जोशी का कथा संसार

कोसी के घटवार और दाज्यू जैसी कहानी लिखने वाले शेखर जोशी की मजदूर जीवन और मेहनतकश ज़िन्दगी की बुनियाद पर लिखे कथा संसार माणिक बंदोपाध्याय और समरेश बसु की कहानियों से ज्यादा मानवीय है।
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Top Hindi story writer Shekhar Joshi

आज हिंदी के शीर्ष कथाकार शेखर जोशी का जन्मदिन है

Today is the birthday of top Hindi story writer Shekhar Joshi.

पलाश विश्वास

आज हिंदी के शीर्ष कथाकार अपने सोमेश्वर के ओलिया गांव के शेखर जोशी का जन्मदिन है। उन्हें प्रणाम और हस्तक्षेप परिवार की ओर से जन्मदिन की बधाई।

मानवीय हैं शेखर जोशी की कहानियां

कोसी के घटवार और दाज्यू जैसी कहानी लिखने वाले शेखर जोशी की मजदूर जीवन और मेहनतकश ज़िन्दगी की बुनियाद पर लिखे कथा संसार माणिक बंदोपाध्याय और समरेश बसु की कहानियों से ज्यादा मानवीय है।

प्रेमचंद की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी जोशी जी ने पिछले कुछ वर्षों से कुमायूंनी में भी लिखा है और इसे लेकर वे बहुत उत्साहित है।

प्रवास पर आम पहाड़ी लेखकों की भावुकता से परे उनका रचना संसार ठोस और वस्तुपरक है।

वे आज भी युवाओं से कहीं ज्यादा ऊर्जा के साथ लिख रहे हैं। यह हमारे लिए प्रेरणा है।

डीएसबी नैनीताल से एमए पास करने के बाद अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी करने में इलाहाबाद विश्विद्यालय गया था। इलाहाबाद में सिर्फ शैलेश मटियानी जी और शेखर जी को जानता था। बटरोही जी इलाहाबाद में शैलेश जी के घर रहते थे। बोले, तुम उन्हीं के यहां ठहर जाना। सुबह-सुबह ट्रेन से उतरकर कर्नलगंज में मटियानी जी के घर गया तो उन्होंने नाश्ता कराकर सीधे डॉ रघुवंश जी के यहां भेज दिया, दाखिला के बारे में बात करने।

डॉ. रघुवंश चाहते थे कि मैं हिंदी में काम करूँ। लेकिन मैं डॉ. मानस मुकुल दास के निर्देशन में पीएचडी करना चाहता था अंग्रेजी में। तब वहां अंग्रेजी विभाग में डॉ. विजयदेव नारायण साही भी थे।

बहरहाल शैलेश जी के यहां उस कमरे में उनके भतीजे रहते थे। मैँ सीधे 100 Lukarganj (लूकरगंज) चला गया। शेखर जोशी और इजा के घर। प्रतुल और संजय की इजा तब सबकी इजा हुआ करती थी। उस घर में मैँ रहने लगा।

शैलेश मटियानी जी और शेखर जी के साथ इलाहाबाद के सभी साहित्यकारों से भेंट होती थी। मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल भी लूकरगंज में रहते थे। बगल में 2 खुसरो बाग में नीलाभ अपने पिता हिंदी और उर्दू के मशहूर कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क जी के साथ रहते थे।

साहित्य और देश दुनिया को समझने की दृष्टि मुझे इन सभी की सोहबत में मिली।

डॉ. मानस मुकुल दास का कोटा पूरा हो गया था। मुझे दूसरे गाइड के साथ काम करना था,जिनके साथ मेरी पट नहीं रही थी। तभी मंगलेश दा ने उर्मिलेश से मिलवाकर कहा कि जेएनयू चले जाओ। मैँ गया और वहां से सीधे धनबाद पहुंचकर पत्रकार बन गया। फिर पीएचडी करने की फुर्सत नहीं मिली।

इलाहाबाद नहीं जाता तो शायद ज़िन्दगी की दिशा और दशा कुछ और होती। लेकिन मुझे जो देशभर में आम लोगों के बीच जाकर काम करने का मौका मिला, वह कभी नहीं मिलता। इतना प्यार भी नहीं।

मैं इलाहाबाद के साहित्यकारों का ऋणी हूँ। खास तौर पर इजा और शेखर जोशी जी का। उस घर के खाने और प्यार का जायका अभी तक दिलोदिमाग में ताजा है।

प्रतुल के लिखे से पुराना वह बीता हुआ समय जैसे खड़ा है। प्रतुल ने लिखा है-

89 वर्ष के हुए पिताश्री

आकाशवाणी के नियमित श्रोता हैं पिताजी

साहित्य की निरंतर सक्रियता, बड़ी उम्र में बनाये है ऊर्जावान

अपनी जीवन संगिनी समेत ज़्यादातर समकालीनों को खो चुके पिता श्री ने पिछले कुछ वर्षों में अपने को साहित्य में पूर्व वर्षों के मुक़ाबले ज़्यादा सक्रिय किया है। इस वर्ष किताब "मेरा ओलियागाँव" के प्रकाशन ने उन्हें नई ऊर्जा दी। इन दिनों बच्चों के लिए भी लेखन कर रहे हैं। यद्यपि पिता श्री को ख्याति कथाकार के तौर पर प्राप्त हुई है, लेकिन  कविताओं से उनका लगाव कम नहीं। 89 वर्षों की अपनी जीवन यात्रा में पिताश्री को कई शल्य क्रियाओं से भी गुज़रना पड़ा। वर्ष 1968 में हर्निया, फिर वर्ष 2000 के बाद प्रोस्टेट और मस्तिष्क का ऑपरेशन। 2020 में एक बार फिर हर्निया। आँखों की परेशानी से भी वर्षों जूझते रहे। इस वर्ष अप्रैल महीने में कोरोना की चपेट में भी आ गए थे। लेकिन यह हमेशा उन के और हम सब परिवार वालों के लिए सुखद संयोग रहा कि तमाम व्याधियां और शल्य क्रियाएं एक अस्थाई समस्या के तौर पर ही उपस्थित हुईं। कहतें हैं कि मां बाप का साया जब तक औलादों पर रहता है, औलाद बच्चा रहती है। तो पिता श्री का जन्मदिन, मेरे लिए इस लिए भी विशेष रहता है कि इस से अपना बच्चा होना भी सुरक्षित रहता है।

आभार प्रतुल

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