जातिगत आधार पर जनगणना : जाति में विश्वास है तो गिने जाने में शर्म क्यों?

 प्रश्न है कि जब जातीय पहचान जिन्दा है, जाति और जाति समूह जीवित है तो उनकी पहचान करने से परहेज क्यों? जो सोच जाति को समाज से हटाना चाहती है उन्हें यह बताना होगा कि गिनती नहीं होने देने से क्या समाज से जाति खत्म हो जाएगी? अगर ऐसा होता तो बीते 80 साल में जाति खत्म हो चुकी होती।
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debate issue बहस मुद्दा

If you have faith in caste, why are you ashamed to be counted?

जातिगत आधार पर जनगणना से जातीय वैमनस्यता मजबूत होगी- ऐसा कहते या मानते हुए 80 साल से जातिगत जनगणना या तो की नहीं गयी या फिर उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। इस सोच के साथ देश का वह नेतृत्व भी था जो अंग्रेजों से स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहा था और वह नेतृत्व भी रहा जिसने क्रमश: खुद को बदलते हुए देश को 21वीं सदी तक खींच लाया है। सीधे तौर पर जातीय जनगणना नहीं कराने के विचार को खारिज भी नहीं किया जा सकता, लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में इस विचार पर पुनर्विचार जरूरी है कि 80 साल बाद भी आखिर जातीय आधार पर जनगणना की जरूरत बनी हुई है और इसकी मांग जोर-शोर से होने लगी है तो क्यों?

आजादी के बाद मजबूत हुई है जातीय पहचान

सच यह है कि आजादी के बाद से जातीय पहचान मजबूत हुए हैं। जाति के नाम पर संस्थान, संगठन और समीकरण मजबूत हुए हैं। जाति से बाहर विवाह करना आज भी सामान्य बात नहीं है और जिन्दगी से जुड़े हुए इसके कई ख़तरे हैं। हर व्यक्ति अपने जाति सूचक टाइटल के साथ जीना चाहता है। मौका पड़ने पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे पदों पर सुशोभित लोग भी अपनी जाति खुलकर बताते हैं। जब जाति बताने से परहेज नहीं है, पहचान उजागर करना ही गर्व की बात तो है जाति के आधार पर गिनती में शर्म क्यों?

जाति में विश्वास और जातीय जनगणना की मांग परस्पर विरोधी नहीं हैं। जो लोग जाति में विश्वास करते हैं लेकिन जातीय जनगणना नहीं चाहते, निश्चित रूप से वे अपने किसी न किसी स्वार्थ का बचाव करना चाहते हैं। मगर, ऐसा नहीं है कि जाति में विश्वास और जातीय जनगणना दोनों की बात करने वाले नि:स्वार्थ हैं। अपने-अपने स्वार्थ के लिए ये दोनों समूह एक बार फिर जातीय जनगणना, आरक्षण और जातिवाद से जुड़ी सोच का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आरक्षित वर्ग में गिने जाने की होड़

मंडल कमीशन लागू करते समय आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी बनकर देश बंटा दिखा। जब यह तय हो गया कि आरक्षण हटाने की सियासत मुश्किल है तो आरक्षण में हिस्सेदारी के लिए गैर आरक्षित वर्ग में होड़ शुरू हुई। हर बार अदालत सामने आ गयी- 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता। जाट, मराठा जैसी जातियों को भी आरक्षण चाहिए जिनमें सत्ता बनाने-बिगाड़ने की क्षमता रही है।

अब प्रादेशिक स्तर पर आरक्षित वर्ग को तय करने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार के पास आ जाने से इस किस्म की सियासत और बढ़ने वाली है। इस बीच आरक्षण विरोधी वर्ग ने आर्थिक आधार पर गरीबों के लिए आरक्षण को भी सच कर दिखलाया। वहीं क्रीमी लेयर के नाम पर आरक्षित वर्ग से कुछ लोगों को हटाने की असफल कोशिश भी हुई।

आरक्षण को लेकर ही ताजा सियासत है जातीय आधार पर जनगणना। अब सबकी नज़र है ओबीसी वोट बैंक पर जो मंडल कमीशन के मुताबिक 52 फीसदी हैं। 1931 वाला आधार निश्चित रूप से बदल चुका होगा और ओबीसी की जनसंख्या बढ़ चुकी होगी। ऐसे में जहां ओबीसी वर्ग के लिए आबादी के आधार पर आरक्षण की उम्मीद जगायी जा सकती है वहीं इस वर्ग का रहनुमा भी बना जा सकता है। इसी उम्मीद में बहुत भोला-भाला प्रश्न उठाया जा रहा है कि जब पेड़-पौधों की गिनती हो सकती है, पशुओं की गिनती हो सकती है तो इंसानों की गिनती जातीय आधार पर क्यों नहीं हो सकती? जाहिर है प्रश्न भोला है मगर नीयत भोली नहीं है।

जातीय वैमनस्यता घटी कब?

जातीय जनगणना से वैमनस्यता बढ़ेगी तो यह सवाल भी लेना होगा कि जातीय वैमनस्यता घटी कब? यह प्रश्न भी पूछा जाना जरूरी है कि जातीय वैमनस्यता को कम करने के लिए इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या प्रयास हुए हैं? जो सीटें एससी-एसटी या ओबीसी वर्ग में आरक्षित होती हैं उनसे इतर सीटों पर इन वर्गों के कितने लोगों को चुनाव में उम्मीदवार बनाया जाता है? अगर एक बस में महिला के लिए आरक्षित 10 सीटें हैं और उन्हें 11वीं सीट पर बैठने नहीं दिया जाए क्योंकि वे उन सीटों पर बैठने की होड़ नहीं कर पातीं तो ऐसा आरक्षण क्या अन्याय नहीं हो जाता? यही स्थिति वास्तव में जिनकी जितनी संख्या भारी उतनी होगी हिस्सेदारी के विचार को जन्म देती है।

1941 में जातीय जनगणना हुई लेकिन आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गये। यह वह समय था जब बाबा साहब अंबेडकर के प्रयास से कम्युनल अवार्ड में दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया गया था लेकिन महात्मा गांधी के आमरण अनशन के बाद पूना पैक्ट हुआ और पहले अंबेडकर, फिर बाद में अंग्रेज मान गये। खुद भीम राव अंबेडकर जाति के बजाए वर्ग के आधार पर आरक्षण के पैरोकार रहे। यही सोच आगे बढ़ती रही। 1951 में जातीय आधार पर जनगणना का विरोध सरदार वल्लभ भाई पटेल ने यह कहकर विरोध किया कि इससे देश में सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सकता है।

मंडल कमीशन के बाद संसद में ओबीसी की हिस्सेदारी दुगुनी हुई

सामाजिक ताना-बाना बिगड़ने के नाम पर ही मंडल कमीशन को ठंडे बस्ते में रखा गया। जब 90 के दशक में मंडल कमीशन लागू किया गया और आरक्षण के लाभुक वर्ग में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी शामिल हुआ तो देश में जातीय दंगे की स्थिति बनी। मगर, इस घटना ने देश की राजनीति बदल दी। जो ओबीसी वर्ग हाशिए पर था, उसे शासन में नेतृत्वकारी भूमिका मिली। मंडल कमीशन से पहले जहां लोकसभा में ओबीसी की हिस्सेदारी 11 फीसदी हुआ करती थी, वहीं अब यह बढ़ कर दुगुनी हो चुकी है।

अब यह बहुत स्पष्ट बात है कि आरक्षण का जातिगत जनसंख्या से संबंध रहा है। एससी और एसटी वर्ग को आरक्षण देने का आधार उनकी जनसंख्या रहा है। लेकिन, ओबीसी को आरक्षण देते वक्त इस आधार को भुला दिया गया। अदालत ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर दी। इस वजह से कुल आरक्षण को 49.5 फीसदी बांधते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण तय कर दी गयी क्योंकि एससी और एसटी के लिए 22.5 फीसदी आरक्षण पहले से तय था। अब ओबीसी वर्ग को यही बात समझायी जा रही है कि जब आबादी 52 फीसदी या उससे ज्यादा है तो आरक्षण केवल 27 फीसदी क्यों होगा?

ओबीसी वर्ग की आकांक्षा को जगाता है जातीय जनगणना

जातीय जनगणना ओबीसी वर्ग की आकांक्षा को जगाता है। यह मांग राजनीतिक दलों के लिए एक अवसर है। इस अवसर को कोई भी राजनीतिक दल चूकना नहीं चाहती। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिहार से आए 11 दलों के प्रतिनिधिमंडल में बीजेपी भी रही। जबकि, बीजेपी सरकार के गृह राज्य मंत्री नित्यानन्द राय साफ तौर पर जातीय जनगणना कराने से मना कर चुके हैं।

देश में 1931 तक जातीय आधार पर जनगणना हुआ करती थी। 1941 की जनगणना में यह परंपरा टूटी। अब उसी परंपरा को जिन्दा करने के लिए राजनीतिक दल कमर कस रहे हैं।

प्रश्न सही और गलत का नहीं है। प्रश्न है कि जब जातीय पहचान जिन्दा है, जाति और जाति समूह जीवित है तो उनकी पहचान करने से परहेज क्यों? जो सोच जाति को समाज से हटाना चाहती है उन्हें यह बताना होगा कि गिनती नहीं होने देने से क्या समाज से जाति खत्म हो जाएगी? अगर ऐसा होता तो बीते 80 साल में जाति खत्म हो चुकी होती।

वहीं जो सोच गिनती गिना कर ओबीसी वर्ग को उसका हक दिलाने की बात करती है उन्हें यह भी सोचना होगा कि मुट्ठी भर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मारामारी से आरक्षित वर्ग को न्याय नहीं मिल सकता। अधिक से अधिक शिक्षा की अनिवार्यता पर जोर देना जरूरी है।

(लेखक प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी, प्रिंट व डिजिटल पत्रकारिता में 25 साल का अनुभव है, जो पत्रकारिता पढ़ाते हैं और देश के राष्ट्रीय व क्षेत्रीय न्यूज़ चैनलों पर बतौर पैनलिस्ट सक्रिय रहते हैं।)


 


 


प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी, प्रिंट व डिजिटल पत्रकारिता में 25 साल का अनुभव है, जो पत्रकारिता पढ़ाते हैं और देश के राष्ट्रीय व क्षेत्रीय न्यूज़ चैनलों पर बतौर पैनलिस्ट सक्रिय रहते हैं।

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