चरणजीत सिंह चन्नी : पंजाब में कांग्रेस का खेला!

पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी को नया मुख्यमंत्री बनाए जाने पर टिप्पणी. पंजाब की राजनीति का यक्ष प्रश्न - क्या कांग्रेस अपना किला बचा पाएगी ? पंजाब की राजनीति का यूपी की राजनीति पर क्या असर होगा ? क्या राजस्थान और छत्तीसगढ से भी उठेंगी नेतृत्व परिवर्तन की मांग 
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This is being called a masterstroke of the Congress high command in Punjab.

पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी को नया मुख्यमंत्री बनाए जाने पर टिप्पणी

गुजरात और पंजाब दोनों राज्यों में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। गुजरात में जहां भाजपा के आलाकमान ने मुख्यमंत्री विजय रूपाणी समेत उनकी पूरी मंत्रिपरिषद को बर्खास्त कर राज्य सरकार का नेतृत्व भूपेंद्र पटेल के हवाले कर दिया वहीं कांग्रेस के आलाकमान ने भी पंजाब में खेला कर दिया। विधायकों के भारी विरोध के मद्देनजर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को पद से हटाकर पंजाब की बागडोर दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी के हाथ सौंपने का फैसला कर दिया। इसे पंजाब में कांग्रेस आलाकमान का मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है। 

लेकिन मुँह से झाग निकल गए कांग्रेस आलाकमान के

लेकिन पंजाब में मुख्यमंत्री बदलने के क्रम में कांग्रेस आलाकमान को नाकों चने चबाने पड़े। पहले तो पद से हटने के बाद खुद को अपमानित महसूस करते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बागी तेवर (Capt Amarinder Singh rebelled) अपना लिया। उसके बाद पहले उनकी सरकार में मंत्री रहे सुखजिंदर सिंह रंधावा (Sukhjinder Singh Randhawa) को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुने जाने की बात सामने आई लेकिन इसके विरोध में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) ने मुंह फुला लिया। उनके विरोध को देखते हुए कांग्रेस विधायक दल में चरणजीत सिंह चन्नी के नाम पर सहमति बनाई गई। दरअसल, सिद्धू खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष रहते आलाकमान उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं था और फिर उनके नाम पर अमरिंदर सिंह ने वीटो भी लगा दिया था।

इसके पहले चन्नी और रंधावा के साथ ही प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़, और प्रताप सिंह बाजवा के नाम भी हवा में तैर रहे थे।

पंजाब कांग्रेस का दलित चेहरा हैं चरणजीत सिंह चन्नी | Charanjit Singh Channi is the Dalit face of Punjab Congress

चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब कांग्रेस का दलित चेहरा बताए जाते हैं। लेकिन रंधावा हों या चन्नी, सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि पंजाब कांग्रेस का नया नेता क्या चार-पांच महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की चुनावी नैया को पार लगा सकेगा!

दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनाव ज्यों-ज्यों करीब आ रहे हैं, राजनीतिक दल चुनावी जीत सुनिश्चित करने की गरज से अपने संगठन और सरकार को चुस्त-दुरुस्त करने और आवश्यक होने पर नेतृत्व में फेरबदल की कवायद में भी जुट गए हैं। अगले साल फरवरी-मार्च में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मणिपुर और गोवा तथा उसके आठ-नौ महीने बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। उत्तराखंड, असम, कर्नाटक और गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन के बाद भाजपा में अभी हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में भी नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें लगाई जा रही हैं। भाजपा शासित राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन बहुत खामोशी के साथ संपन्न हो गया लेकिन कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं हो सका। 

80 सदस्यों के कांग्रेस विधायक दल में 50-60 विधायकों के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के विरोध में लामबंद हो जाने और 17 सितंबर को नेतृत्व परिवर्तन के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने के बाद आलाकमान को भी लगने लगा कि विधायकों का विश्वास खोते जा रहे अमरिंदर सिंह की कप्तानी में पंजाब में कांग्रेस की चुनावी नाव पार नहीं लग सकेगी।

गांधी परिवार के साथ स्व. राजीव गांधी के जमाने से ही कैप्टन अमरिंदर के पारिवारिक रिश्ते बहुत करीबी रहे हैं। सोनिया गांधी ने उन्हें भारी मन से 'सॉरी' कहा और चंडीगढ़ में विधायक दल की बैठक बुलाए जाने की बात कही। लेकिन आलाकमान के इस फैसले से आहत और अपमानित महसूस करते हुए अमरिंदर सिंह ने विधायक दल की बैठक से पहले ही राजभवन जाकर राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित को अपना त्यागपत्र थमा दिया।

पार्टी के विधायकों का बड़ा तबका अमरिंदर सिंह के खिलाफ हो चला था

दरअसल, पिछले कई महीनों से 79 वर्षीय कैप्टन अमरिंदर सिंह पर पार्टी के विधायकों का बड़ा तबका कांग्रेस के चुनावी वादों को पूरा नहीं करने, ड्रग्स रैकेट के साथ ही बेअदबी मामले में विपक्षी अकाली दल के नेतृत्व के प्रति नरमी बरतने, पार्टी के विधायकों की उपेक्षा, नौकरशाही के भरोसे 'महाराजा स्टाइल' में अपने फार्म हाउस से सरकार चलाने के आरोपों के साथ उनके विरुद्ध लामबंद हो रहा था।

दूसरी तरफ भाजपा से कांग्रेस में आए पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू अपने सहयोगी विधायक, भारतीय हाकी टीम के पूर्व कप्तान परगट सिंह के साथ मिलकर विधायकों के इस असंतोष को लगातार हवा दे रहे थे।

कैप्टन ने समय रहते असंतुष्टों के साथ सुलह की कोशिश भी नहीं की। वह पंजाब में एक स्वतंत्र क्षत्रप की तरह से सरकार चला रहे थे। इस बीच बड़बोले और उच्छृंखल छवि के नवजोत सिंह सिद्धू लगातार अपनी ही सरकार के मुख्यमंत्री के विरुद्ध तीखी और आक्रामक भाषा बोलते रहे। उन्हें शांत करने की गरज से कांग्रेस आलाकमान ने कैप्टन की इच्छा के विरुद्ध सिद्धू को अध्यक्ष बनाकर प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी।

सिद्धू के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी कैप्टन और क्रिकेटर का झगड़ा सुलझ नहीं सका। अंतत: अमरिंदर सिंह को कप्तानी छोड़नी पड़ी।

हालांकि कांग्रेस विधायक दल की बैठक में अमरिंदर सिंह के कार्यकाल की सराहना का प्रस्ताव भी पारित हुआ और भविष्य में भी उनका मार्गदर्शन मिलते रहने की उम्मीद भी जाहिर की गई।

कैप्टन ने अपने राजनीतिक भविष्य का विकल्प खुला होने और कोई भी फैसला अपने साथियों-सहयोगियों से मंत्रणा के बाद ही करने की बात कही है। एक अरसे से उनके भाजपा के साथ जुड़ने के कयास लगते रहे हैं और यह भी कि उन्हें सामने रखकर भाजपा सरकार अपने तीन विवादित कृषि कानूनों पर कुछ फैसला कर सकती है। हालांकि कांग्रेस के सूत्र अमरिंदर सिंह से इस तरह के बयानों से परहेज करने को कह रहे हैं। उनका मानना है कि कुछेक मुलाकातों के आधार पर किसी को पाकिस्तान का मित्र कहना गलत होगा।

वैसे भी सिद्धू और इमरान खान क्रिकेटर रह चुके हैं। कांग्रेस के एक नेता याद दिलाते हैं कि कैप्टन पर भी तो पाकिस्तान की एक डिफेंस जर्नलिस्ट अरूसा आलम के साथ गहरे और अंतरंग रिश्ते होने के आरोप लगते रहे हैं।

पंजाब की राजनीति का यक्ष प्रश्न

बहरहाल, अब पंजाब की राजनीति (politics of punjab) में एक ही सवाल सामने आ रहा है कि विधानसभा चुनाव से ठीक चार-पांच महीने पहले नेतृत्व परिवर्तन क्या कांग्रेस की चुनावी नाव को पार लगा सकेगा या इसका हश्र भी वैसा ही होगा जैसा अप्रैल 1996 में पंजाब में ही चुनाव से 10-11 महीने पहले ही कांग्रेस के हरचरण सिंह बराड़ की जगह राजेंद्र कौर भट्टल को मुख्यमंत्री बनाने के बाद हुआ था। उस चुनाव में कांग्रेस को बुरी  तरह पराजय का सामना करना पड़ा था।

कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि नेतृत्व परिवर्तन से अमरिंदर सिंह और उनकी सरकार के विरुद्ध ऐंटी इनकंबेंसी फैक्टर काफी हद तक निष्प्रभावी हो सकेगा। लेकिन इतने कम समय में नया नेतृत्व कुछ खास करिश्मा कर दिखाएगा, इसके बारे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसके लिए भी सबसे बड़ी कसौटी नेतृत्व परिवर्तन के बाद राज्य में गुटबाजी की शिकार कांग्रेस की एकजुटता को लेकर होगी। इस लिहाज से भी कैप्टन अमरिंदर सिंह की भावी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी।

पंजाब कांग्रेस के पक्ष में क्या बात जा सकती है ?

कांग्रेस के पक्ष में एक ही बात हो सकती है कि अभी पंजाब में विपक्ष भी उतना ताकतवर नहीं रह गया है जितना पहले कभी था। वहां कांग्रेस का मुख्य मुकाबला भाजपा से नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी और अकाली दल के साथ होने की संभावना है। अकाली दल ने इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया है। दलित चेहरे को सामने रखकर कांग्रेस अकाली दल और बसपा के गठजोड़ की हवा निकाल सकेगी, ऐसा कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है। लेकिन पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन के बाद इस तरह की मांग राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी जोर पकड़ सकती है। इसके लिए भी कांग्रेस आलाकमान को अभी से तैयार रहना होगा।

जयशंकर गुप्त

लेखक देशबन्धु के कार्यकारी संपादक व प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य हैं। 

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