राहुल गांधी एक उम्मीद का नाम है जिसका अर्थ उम्मीद ही होना चाहिए

 यह तो नहीं हो सकता है कि राहुल गांधी दिल्ली में ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ की निशानदेही करें और उनके एक मुख्यमंत्री क्रोनी कैपिटलिस्ट की सेवा में आतुर दिखें।
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राहुल ने मोदी से पूछा, क्या देश सिर्फ 15 लोगों के लिए ही है, जिन्हें 1,25,000 लाख करोड़ रुपये का कर लाभ मिला है

Rahul Gandhi is a hope name which should mean hope

एक प्रखर छात्र नेता रहे और अब कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के करीबी सलाहकार संदीप सिंह ने आज एक ट्वीट में राहुल गांधी और देश के मूड के बारे में बहुत आश्वस्ति जताई। उन्हें एहसास हो रहा है कि देश अब राहुल की तरफ देख रहा है। आगामी चुनाव में कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापिसी करेगी। उनके एहसास और एतबार के साथ देश का संविधान और लोकतन्त्र का हिमायती हर व्यक्ति अपनी हामी देना चाहेगा। कम से कम वो लोग भी जो फिलहाल किसी और विकल्प के बारे में सोच नहीं पा रहे हैं।

संदीप ऐसे अकेले व्यक्ति या नेता नहीं हैं जो ऐसा सोचते हैं और उम्मीद करते हैं। देश के तमाम उदार- बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग भी इसी तरह की कामना कर रहे हैं। सोशल मीडिया के मार्फत ‘इन्फ़्लुएन्सर’ बन चुके कई नामी पत्रकार इसी अभिव्यक्ति के साथ मुखर हैं। इस मनोकामना में उन्होंने ‘कॉर्पोरेट मीडिया’ या ‘गोदी मीडिया’ के बरक्स ‘पप्पू मीडिया’ का तमगा हासिल कर लिया है।

इन उदार बुद्धिजीवी पत्रकारों का संकट यह है कि एक तरफ वो राहुल गांधी के हर बयान को एम्प्लीफाई करने की बेइंतिहा कोशिश तो करते हैं लेकिन राहुल गांधी की कथनी के खिलाफ उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री और सरकारें अपने -अपने राज्यों में क्या कर रही हैं इससे सतर्कता और चतुराई पूर्ण तटस्थता भी बरतते हैं बल्कि कई मौकों पर उनका बचाव भी करते हैं। कई ऐसे मौके आए जब कांग्रेस शासित राज्य सरकारों के काम -काज पर भी आलोचनात्मक ढंग से कुछ बोलना ज़रूरी था लेकिन ऐसा करना उन्हें ‘फासीवाद’ के खिलाफ संघर्ष को कमजोर करना जान पड़ता है।

अगर उन्हें यह लगता है कि और ऐसा ही वो देश को बताना चाहते हैं कि वो वो देश के हितैषी हैं, संविधान के हितैषी हैं और लोकतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता और तमाम सांवैधानिक मूल्यों के हितैषी हैं और राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ही इन संकटों का निदान है तो यह उनका पहला दायित्व होना चाहिए कि वो राहुल गांधी और कांग्रेस को बताएं कि उनकी बातें, उनकी सोच, उनका स्वप्न केवल ट्विटर तक पहुँच रहा है। इन ट्वट्स का असर कांग्रेस शासित राज्यों की नीतियों या निर्णयों में दिखलाई नहीं देता।  

छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार यह तय कर चुकी है कि ‘मध्य भारत के फेफड़े’ कहे जाने वाले ‘हसदेव अरण्य’ के सघन, जैव विविधतता से भरपूर, वन्य जीवों के नैसर्गिक पर्यावास और आदिवासियों के सदियों से बसे गांवों को अब उजाड़ दिया जाएगा। घोषित तौर पर यह अपरिवर्तनीय नुकसान ‘हम दो हमारे दो’ के नारे में ‘हमारे दो’ में निहित एक यानी अडानी के मुनाफे के लिए किया जा रहा है। इस अभियान में कांग्रेस नीत राजस्थान सरकार भी मुस्तैदी से शामिल है। अंतत: राजस्थान राज्य विद्युत निगम के लिए आबंटित ये कोयला खदानें अडानी के मुनाफे को बढ़ाने लिए ही हैं।

ऐसा कहने का ठोस आधार यह है कि हसदेव जैसे जंगलों को उजाड़ने का अन्य कोई औचित्य बतलाया ही नहीं जा सकता। खुद कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने राहुल गांधी के दिए इस नारे से बहुत पहले इस जंगल को ‘नो -गो एरिया’ घोषित किया था। यानी इस जंगल के बने रहने का औचित्य किसी भी अन्य कारण से ज़्यादा महत्वपूर्ण था।

‘नो- गो एरिया’ घोषित करार दिये जाने का मतलब यह था कि यहाँ अन्य कोई ऐसी गतिविधियों को इजाजत नहीं दी जाएगी जिनकी वजह से इस जंगल को कोई नुकसान पहुंचे।   

यह कहने का एक ठोस आधार यह भी है कि इस विशाल वन क्षेत्र में खनन की इजाजत न केवल तमाम क़ानूनों को ताक पर रखकर दी जा रही है बल्कि उसी संविधान की धज्जियां तार-तार करके दी जा रही है जिसकी रक्षा के लिए राहुल गांधी हर रोज़ अपनी प्रतिबद्ध्त्ता दोहराते हैं। हसदेव अरण्य और इसके बहाने संविधान की रक्षा का वचन पहली दफा उन्होंने इसी जंगल में बसे एक गाँव में स्थानीय आदिवासियों के बीच बैठकर दिया था। तारीख थी 15 जून 2015। इस छोटी सी सभा में उन्होंने तीन बातें कहीं थीं जो अब तक स्थानीय आदिवासी समुदायों को याद हैं। पहली, मोदी मॉडल के बरक्स कांग्रेस सरकार आदिवासियों को ताक पर रखकर विकास के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी, ग्राम सभाओं के संवैधानिक अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध है और तीसरी बात, पूरी कांग्रेस हसदेव अरण्य को बचाने के संघर्ष के साथ खड़ी है और खड़ी रहेगी। आज उनकी इन प्रतिबद्धताओं को निभाने का अवसर इन आदिवासियों ने राहुल को दिया है।

राहुल गांधी, देश में गहरी जड़ें जमा चुके ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के खिलाफ पूरी स्पष्टता व ईमानदारी से प्रहार करते आ रहे हैं। इस बात के लिए पूरा देश उन्हें एक ईमानदार नेता मान चुका है।

आज जब चुनावी राजनीति में कॉर्पोरेट के सहयोग के बिना चुनाव लड़ने की कल्पना नहीं की जा सकती तब एक दल का प्रमुख नेता इन कोरपोरेट्स से खुलेआम बगाबत करता है। इससे निसंदेह पार्टी को खामियाजा भी भुगतना भी पड़ता है। लेकिन यही कांग्रेस की अब दीर्घकालीन राजनीति का रास्ता भी है जो उसे सत्ता तक पहुंचाएगा। यही बात राहुल गांधी को अन्य राष्ट्रीय नेताओं से जुदा करती है और उन्हें एक संवेदनशील और जनोन्मुखी नेता का ओहदा देती है।

उदार पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को यह बात हल्के में नहीं लेना चाहिए और खासकर तब, जब वो यह जानते हैं कि संविधान का हनन केवल केंद्र में बैठी सरकार ही नहीं करती बल्कि एक गाँव में बैठा सरपंच भी कर सकता है। बात यहाँ राज्य सरकार की हो रही है तो जितना दायित्व संविधान के अनुसार सरकार और काम- काज चलाने का केंद्र का है उससे कहीं ज़्यादा दायित्व राज्य सरकारों का है। उन्हें यह तथ्य भी याद दिलाने की ज़रूरत है कि अंतत: संविधान की शक्ति का स्रोत यानी हम ‘भारत के लोग’ किसी न किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के तहत भू-भाग में रहते हैं। राज्य इस लिहाज से ज़्यादा महत्वपूर्ण इकाई है।

उन उदार शुभेच्छुओं को यह बात भी समझना चाहिए कि वो चाहकर भी राहुल की छवि नए सिरे से नहीं गढ़ सकते जब तक की खुद उनकी पार्टी के नेता उन्हें गंभीरता से न लें। यह तो नहीं हो सकता है कि राहुल गांधी यहाँ ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ की निशानदेही करें और उनके एक मुख्यमंत्री उनकी सेवा में आतुर दिखें। इसका  केवल एक और एक ही मतलब होगा कि भले ही उनकी पार्टी में उनके मुख्यमंत्री को किसी भी तरह से ‘व्यावहारिक’ कहकर स्वीकार भी कर लिया जाए लेकिन जनता इस व्यावहारिकता के पर्दे के पीछे एक ऐसे नेता को देख लेगी जिसके कहने और करने में एक लंबी गहरी खाई है। राहुल को एक उम्मीद की तरह देखने का आधार मौजूदा सत्तासीन नेता है जो बहुत बड़बोला है। हर रोज़ कुछ कहता है और उसके खिलाफ काम करता है। कहने और करने के बीच के अंतर को पाटने का काम राहुल और कांग्रेस को शिद्दत से करना होगा वरना विकल्प की ज़रूरत इस देश को नहीं है।

हसदेव अरण्य को क्यों ऐसे ही बचा रहना चाहिए? क्यों उसे एक कोरपोरेट्स के मुनाफे की हवश के लिए हमेशा हमेशा के लिए नष्ट नहीं होने देना चाहिये?

यह समझने के लिए ज़्यादा नहीं बस एक दशक पीछे की यात्रा करना चाहिए। इस एक दशक में हसदेव अरण्य क्षेत्र के रहवासी ग्रामसभाओं की सांवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निरंतर इस जंगल को बचाने के कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं।  

पर्यावरणविद कांची कोहली एक दशक से इस हसदेव अरण्य बचाने के संघर्ष से जुड़े अन्य साथी इसके महत्व को निम्नलिखित बिन्दुओं में बताते हैं कि-

  • हसदेव को बचाने का मतलब है संविधान को बचाना। हसदेव अरण्य संविधान की पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र में है। पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र में ग्राम सभाओं को विशिष्ट अधिकार दिये गए हैं। इस क्षेत्र में ज़मीन अधिग्रहण से पहले ग्राम सभाओं से परामर्श और उनकी सहमति के प्रावधान हैं। 2015 से हसदेव अरण्य क्षेत्र की ग्राम सभाएं लगातार यह बात कहती आ रही हैं कि पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र में ग्रामसभाओं की सांवैधानिक भूमिका है और इस भूमिका का निर्वाह करते हुए वह केंद्र सरकार व राज्य सरकार को लिखित में यहा बताते आ रही हैं कि उनके क्षेत्र में किसी भी गैर-वानिकी परियोजनाओं के लिए सहमति नहीं दी जाएगी। इस सबसे प्राथमिक संवैधानिक इकाइयों की बात आधिकारिक बात को दोनों सरकारें लगातार नकार रही हैं।

  • हसदेव अरण्य बचाने का मतलब है अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना। हसदेव अपने आप में एक उदाहरण है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का। ग्रामीणों की पूरी अर्थव्यवस्था हसदेव अरण्य पर आधारित है। जब पूरी दुनिया बढ़ते हुए कार्बन फुट प्रिंट की चुनौतियों का सामना कर रही है ऐसे में ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन पर आधारित आजीविका और जीवन शैली का संरक्षण किया जाना चाहिए। हमें यह याद रखने की भी ज़रूरत है कि देश के किसी एक भू-भाग की अर्थव्यवस्था भी अंतत: देश की समूल अर्थव्यवस्था का ही हिस्सा है।

  • कोयला राष्ट्रीय संपदा है। उसका इस शर्त पर दोहन नहीं किया जाना चाहिए कि दीर्घकालीन लाभ-घाटे के हिसाब में अंतत: यह घाटे का सौदा हो। ऐसे में जबकि पूरी दुनिया में कोयले की मांग और ज़रूरत लगातार घट रही है, खुद देश की ऊर्जा आपूर्ति के लिए कोयले की पूर्ति सुनिश्चित की जा चुकी हो तब इन नयी खदानों को खोलने का कोई अन्य औचित्य नहीं है सिवा इसके कि क्रोनी कैपिटलिस्ट को अथाह संसाधन दिये जाने के लिए प्राकृतिक विरासत का विनाश किया जा रहा है।

  • हसदेव बचना मतलब पर्यावरण को बचना है। पानी, हाथी, जैव विविधतता, यह मामला केवल खदान का नहीं है बल्कि खनन से जुड़ी तमाम संरचनाएं होती हैं जिनसे एक बहुत बड़े क्षेत्र पर हमेशा के लिए नकारात्मक प्रभाव पैदा करती हैं। हसदेव अरण्य हाथियों का सबसे बड़ा नैसर्गिक पर्यावास है। मानव- हाथी संघर्ष जब राज्य के अखबारों की रोज़ की खबरें बन गईं हों, हथियों ने मानव बस्तियों को उजाड़ना शुरू कर दिया हो, तब उन हाथियों के उनके अपने पर्यावास को सुरक्षित व संरक्षित किया जाना ज़रूरी है न कि उन्हें उजाड़ना।

  • हसदेव अरण्य बांगों नदी का कैचमेंट क्षेत्र है। इससे लगभग 3 लाख हेक्टेयर की कृषि भूमि सिंचित होती है। जांजगीर-चम्पा जिला, देश के उन कुछ जिलों में शुमार है जहां 90 प्रतिशत कृषि भूमि न केवल बहुफलसीय है बल्कि पूरे साल पानी की उपलब्धतता रहती है। पानी का इतना बड़ा नैसर्गिक रिजर्व केवल किसी एक कंपनी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।

  • हसदेव को बचाना जन स्वास्थ्य और सेहत को बचाना है। कोरोना के समय में हमने उस सेहत के महत्व को समझा है। साफ हवा, साफ पानी, साफ जलवायु और उसके सहज उत्पाद पोषण, अंतत: सार्वजनिक स्वास्थ्य की न्यूनतम ज़रूरतें हैं। इस जंगल के कारण पूरे मध्य भारत का ऋतु चक्र प्रभावित होता है। वर्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक इस जंगल को देश के नैसर्गिक मौसमी स्वास्थ्य के लिए इन खदानों को खोलने की ज़रूरत नहीं है। प्राथमिकता तय करना देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए इतना दुर्लभ काम नहीं होना चाहिए।
  • हसदेव अरण्य को बचाने का मतलब कानून के राज़ और कानून के भरोसे को बचाना भी है। ये जानते हुए भी कि कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी तरह नकारा जा रहा है। इस खनन से जुड़ी तमाम स्वीकृतियाँ मनमाने ढंग से दी जा रहीं हैं, भूमि-अधिग्रहण, वन स्वीकृतियां, पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र को प्राप्त सांवैधानिक सुरक्षाओं, पर्यावरणीय स्वीकृतियां हासिल करने की प्रक्रियाओं को जिस तरह संचालित किया जा रहा है वह उन आदिवासी समुदायों व ग्राम सभाओं को दंड दिये जाने जैसा है जो एक दशक से कानून के राज पर यकीन कर रही हैं। अगर हसदेव अरण्य क्षेत्र में अडानी के मुनाफे के लिए कोयले की खदानें खुलती हैं तो यह न केवल आदिवासियों और ग्राम सभाओं की हार होगी बल्कि यह देश से कानून के राज के खत्म हो जाने की घोषणा भी होगी। ऐसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है जिसका पालन हसदेव के आंदोलन ने न किया हो। एक दशक के इस संघर्ष में अभी तक एक इंच ज़मीन भी नहीं दी ली जा सकी। बावजूद इसके अगर हसदेव में खनन खुलता है तो यह न केवल हसदेव के संघर्ष की हार होगी बल्कि उस सांवैधानिक संरचना की भी हार होगी जिसकी पुनर्स्थापना के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस अपनी प्रतिबद्धताएं दोहरा रही है।
कांग्रेस और राहुल गांधी से अपेक्षाएँ क्यों हैं?

कांग्रेस और राहुल गांधी से अपेक्षाएँ इसलिए भी हैं क्योंकि हसदेव अरण्य को ‘लोकसंरक्षित हाथी रिजर्व बनाने की दुनिया में अनोखी परिकल्पना खुद भूपेश बघेल जी ने प्रस्तावित की है जिसे लेमरू हाथी रिज़र्व कहा गया। यह एक ऐसी परिकल्पना है जो अगर वाकई ज़मीन पर उतरती है तो वैश्विक स्तर जलवायु परिवर्तन के विकट आसन्न संकट का एकमात्र समाधान प्रस्तुत कर सकती है।

कांग्रेस और राहुल गांधी की हसदेव अरण्य को बचाने की ज़िम्मेदारी क्यों है ?

इसके अलावा कांग्रेस और राहुल गांधी से हसदेव अरण्य को बचाने की ज़िम्मेदारी इसलिए भी है क्योंकि इसे उन्हीं क़ानूनों से रोका जा सकता है जो कांग्रेस की सरकार ने बनाए थे और जिन्हें कल्याणकारी राज्य की मंशा के अनुसार बनाया गया था। इन क़ानूनों में प्रमुख रूप से वन अधिकार कानून, 2006 और भूमि अधिग्रहण के लिए 2013 में लाया गया कानून है जिनकी समूल अवहेलना करके ही हसदेव अरण्य में अडानी के मुनाफे के लिए कोयला खदानें खोली जा रही हैं।   

राहुल गांधी के शुभेच्छु उदार और प्रगतिशील पत्रकारों व बुद्धिजीवियों का सामयिक कर्तव्य है कि वो यह बातें भी उन्हें बताएं और जहां ज़रूरत हो वहाँ उनके नेतृत्व की दृढ़ता को परखें भी। अन्यथा उनकी छवि को बनाने -बिगाड़ने के खेल में फिर वो ताक़तें सफल हो जाएंगीं जो अब तक सफल हैं।

सत्यम श्रीवास्तव

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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