रोनाल्डो के कोका कोला बोतल हटाने वाला प्रकरण : क्या लोकतंत्र ऐसे ही मजबूत होगा ? क्या है डॉक्टर अंबेडकर का सबक

रोनाल्डो ने कोकाकोला को सामने से क्यों हटाया? क्या है डॉक्टर अंबेडकर का सबक? लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा ? क्या वाकई क्रिस्टियानो रोनाल्डो की वजह से कोका कोला के शेयर गिर गए ?
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Did Cristiano Ronaldo really cause the Coca-Cola stock to fall

Did Cristiano Ronaldo really cause the Coca-Cola stock to fall?

क्या वाकई क्रिस्टियानो रोनाल्डो की वजह से कोका कोला के शेयर गिर गए ? | Did Cristiano Ronaldo really cause the Coca-Cola stock to fall?

हिंदी के कद्दावर साहित्यकार और पत्रकार अनिल कुमार यादव लिखते हैं कि हमारे आस पास जिस भी चीज पर कचकच मची हुई है, वह सबसे पहले दिमाग फेर देने वाली एक कहानी है, जिसके पीछे की नियत, मर्म और मकसद को समझना जरूरी है। यह कहानियों के ताकत का युग है, इसलिए उनकी बुनावट के धागों पर बात होनी चाहिए।

इसका उल्लेख मैंने क्यों किया? सोशल मीडिया के गलियारों में एक कहानी फैल रही है कि फुटबॉल के मशहूर खिलाड़ी रोनाल्डो ने अपने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कोका कोला की बोतल को अपने सामने से हटाकर हाथ में पानी की बोतल लेते हुए कहा कि पानी पियो। ऐसा करते ही कोका कोला कंपनी के शेयर गिर गए।

इस कहानी पर रोनाल्डो की खूब वाहवाही हो रही है। भारत के लोगों ने तो रोनाल्डो को सर माथे बिठा लिया है। लोगों की वाहवाही से ऐसा लग रहा है जैसे वह कोका कोला के नुकसान को जानते हो और इस इंतजार में बैठे हो कि कब कोई बड़ा नाम वाला इंसान उनकी राय पर ठप्पा लगा दे ताकि कोका कोला का कारोबार (coca cola business) भरभरा कर ढह जाए।

How do such stories turn our minds?

इस कहानी में क्या है? विरोध के लिए हीरो का इंतजार। हीरो ने एक दाव खेला और लोग झूम उठे। ऐसी कहानियां हर दौर में दिलचस्प होती हैं। लोग इन्हें हाथों-हाथ खरीदते हैं। लेकिन असली बात यह है कि क्या ऐसी कहानियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंदर ऐसा असर छोड़ पाती है जिससे दुनिया थोड़ी और बेहतर हो। क्या ऐसी कहानियां उन सवालों को उजागर करती हैं, जिन सवालों के बहुत दूर तक फैलने और पहुंचने से दुनिया थोड़ी और बेहतर हो पाती।

कहने का मतलब यह है कि कहानी तो बिक गई लेकिन इसकी बुनावाट पर भी बात होनी चाहिए? ताकि इस कहानी की नियत, मर्म और मकसद का ठीक-ठाक अंदाजा लग सके। हम समझ सकें कि ऐसी कहानियां हमारे दिमाग को कैसे फेर देती हैं।

रोनाल्डो ने कोकाकोला को सामने से क्यों हटाया

न्यूज़ क्लिक के खेल पत्रकार सिद्धांत (Siddarth Sports Journalist of NewsClick) जब इस पर बात हुई तो तो सिद्धांत ने कहा कि रोनाल्डो प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे थे। उन्होंने कोका कोला के खिलाफ स्टैंड लेते हुए नहीं कोका कोला को नहीं हटाया। किस वजह से कोकाकोला को सामने से हटाया इसके बारे में सटीक तौर पर बताना मुश्किल है। लेकिन फिर भी चलिए हम मान लेते हैं कि एक खिलाड़ी के तौर पर अपनी फिटनेस को ध्यान में रखते हुए कोका कोला को अपने सामने से हटाया है।

तो इसमें कोका कोला के खिलाफ स्टैंड लेने वाली तो बात कैसे देखी जा सकती है। क्योंकि अगर ऐसा होता तो वह उस पूरे आयोजन में नहीं आते। क्योंकि आयोजन के स्पॉन्सर में कोकाकोला भी एक भागीदार था। इसलिए हो सकता है कि पानी पीने के लिए जो बोतल उठाई वह भी शायद कोका कोला की हो।

इस तरह से मामले की हकीकत हो यह है कि टेबल से कोका कोला की कोल्ड ड्रिंक की बोतल हटाने से जुड़ा सारा वाकाए के नियत मकसद और मर्म के केंद्र में ज्यादा से ज्यादा रोनाल्डो का फिटनेस शामिल है। इससे ज्यादा कुछ नहीं।

लेकिन इसे दूसरे ढंग से सोचा जाए कि फुटबॉल का सबसे बड़े खिलाड़ी ने अपने टेबल से कोका कोला को हटाया और कोका कोला के शेयर गिर गए। तो यह बहुत दिलचस्प कहानी बन जाती है। इतनी दिलचस्प कि मीडिया वाले इसे ना छापने का नुकसान नहीं उठा सकते। यही सारी कहानियां तो मीडिया की कमाई का जरिया होती है।

जहां तक शेयर बाजार की हकीकत है तो वह बिल्कुल अलग बात है। रोनाल्डो के बाद एक और खिलाड़ी ने मेज पर रखी हनिकेन नाम की ब्रांड की एक बोतल हटाई जबकि वहीं पर रखी हुई कोका कोला को नहीं हटाया। जबकि दोनों बोतलें खिलाड़ियों की सेहत के लिहाज से नुकसान देह होती है। ऐसा करने के बाद हानिकेन ब्रांड के शेयर प्राइस घटे नहीं बल्कि बढ़ गए।

रोनाल्डो की घटना के बाद कोका कोला के प्रति शेयर तकरीबन $56 से घटकर $55 हो गए। शेयर प्राइस घटने के कारण के पीछे रोनाल्डो द्वारा कोका कोका कोला की बोतल हटाए जाने को देखना शेयर बाजार को ना समझने जैसा है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के रे तो यहां तक कहते हैं कि जरूर यह खबर किसी बहुत अधिक मूर्ख या चालाक एडिटर ने ब्रेक की होगी। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव हर दिन होता रहता है। उसके पीछे कई कारण होते हैं। इन कारणों का दायरा इतना अधिक बढ़ा है कि इसे सटीक तौर पर नहीं बताया जा सकता। भारत में लॉकडाउन में जब सभी गरीब हो रहे थे तो शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले अमीर हो रहे थे। तो आप समझ सकते हैं कि शेयर बाजार किस तरह से काम करता है।

सिद्धांत कहते हैं कि अगर सचमुच रोनाल्डो द्वारा कोक को अपने सामने से हटाए जाने का असर पड़ा है टूर्नामेंट के बाद कोका कोला की शेयर प्राइस से पता चल जाएगा। एक हद के बाद यह बात को बतंगड़ बनाने वाला प्रकरण बन गया है। बहुत अधिक तूल दिया जा रहा है।

गांव कनेक्शन के चीफ रिपोर्टर मिथिलेश धर दुबे ने इस विषय पर रिसर्च कर बड़ी अच्छी पोस्ट लिखी है। मिथिलेश धर लिखते हैं कि पुर्तगाल और जुवेंट्स के स्टार फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने जब से टेबल से कोका-कोला की बॉटल हटाई है, तब से हम लहालोट हुए जा रहे हैं, सेंटी हुए जा रहे हैं, जबकि रोनाल्डो पेप्सी और कोका-कोला के विज्ञापनों से करोड़ों रुपए पीट चुके हैं। कोका-कोला यूरो 2020 का बेवरेज पार्टनर है, रोनाल्डो का नहीं। क्रिस्टियानो रोनाल्डो वेट लॉस सप्लीमेंट Herbalife के भी ब्रांड एंबेसडर हैं। 2019 में जर्नल साइंस डायरेक्ट में 'Slimming to the Death: Herbalife -Associated Fatal Acute Liver Failure' नामक रिपोर्ट छपती है जिसमें बताया गया कि भारत में एक युवती की मौत Herbalife के प्रोडक्ट की वजह से हुई। कुछ महीने के सेवन के बाद युवती का लिवर फेल हो जाता है। रिपोर्ट छपने के बाद कंपनी की तरफ से लेखक को धमकी दी जाती है और साइंस डायरेक्ट ने रिपोर्ट को डिलीट कर दिया, क्योंकि भारत में उसे बड़ा बाजार दिख रहा है। और ऐसी शिकायतें बस भारत से नहीं हैं। इजरायल, स्पेन जैसे कई देशों में Herbalife पर मुकदमा चल रहा है। 2016 में कंपनी पर हुए मुकदमा के बाद इन्होंने 200 मिलियन डॉलर देकर अपना गला बचाया था। पिछले साल Herbalife कंपनी को चीन में दर्ज हुए कई आपराधिक मुकदमों के एवज में 123 मिलियन डॉलर बतौर जुर्मना चुकाना पड़ा था।

इन सारे विवरणों का मतलब क्या है?

मतलब यह है कि हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत रहते हुए हीरो रोग से ग्रसित हैं। जब भी हमारे मन में बने महानायक भले कुछ करें या ना करें लेकिन मीडिया की कहानी में इस तरह से हमारे सामने पेश होते है जैसे उसने एक बहुत बड़ी जंग जीत ली हो तो हम अपना होशो हवास खो बैठते हैं। लोकतांत्रिक दुनिया की जमीनी हकीकत पर इसका रत्ती बराबर भी असर नहीं पड़ता। लेकिन यह मदहोश कर जाता है।

लोकतंत्र के अंदर सबको सब कुछ करने की आजादी है और सब की जिम्मेदारी है कि ऐसा व्यवहार करें ताकि सभी अपनी आजादी का इस्तेमाल कर पाए। किसी के हीरो बन जाने से पूरा समाज नहीं बदलता। बल्कि अगर किसी को बेवजह हीरो बनाया जा रहा है, उसके स्याह पक्ष को नहीं दिखाया जा रहा है तो लोकतंत्र को उसका नुकसान ही सहना पड़ता है।

खेल पत्रकार सिद्धांत बड़ी अच्छी बात कहते हैं कि हर दिन यह खिलाड़ी तकरीबन 5 करोड़ से अधिक कमाते हैं। इन्हें इतना पैसा मिलता है। यह पैसा कैसे मिलता है?

इनके नाम का इस्तेमाल कर बाजार इनके इर्द-गिर्द ऐसा नेटवर्क बनाता है जहां पर इन खिलाड़ियों पर खूब पैसा लगाया जाता है। बाजार का वह धड़ा जो खिलाड़ियों को आगे कर अपना सामान बिकवाता है। सामान बेचने वाला अच्छा बुरा कुछ भी हो, लेकिन बाजार पर राज करने लगता है। भारत के सभी क्रिकेट सितारे कोका कोला से लेकर पेप्सी, थम्स अप सब का प्रचार करते हैं। इन्हें अकूत पैसा मिलता है और इन कंपनियों को इन सितारों के नाम पर बाजार। यह सारी प्रवृतियां पूंजीवादी समाज की प्रवृत्तियां हैं। इसका क्या असर हुआ है? इसके बारे में बहुत कुछ लिखा सोचा समझा चुका है।

इसका एक साफ दिखने वाला असर तो यह है कि कुछ खिलाड़ी खूब कमाते हैं और खिलाड़ियों की एक बहुत बड़ी जमात गुरबत में जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर रहती है। उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता। भारत में क्रिकेट के अलावा दूसरे सारे खेल क्यों बर्बाद हो गए? इसका जवाब भी यही पर हैं।

मैं खुद एक खिलाड़ी रह चुका हूं। खेलना भी एक तरह की कला है। इस दुनिया को खुशी देने में कलाकार छा जाए, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। लेकिन दिक्कत यह है कि इनसे बनने वाला सिस्टम कईयों के लिए नाइंसाफी लेकर आता है। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर कमर्शियलाईजेशन होता है।

यह ठीक है कि कोई बहुत शानदार खेलता है। लेकिन एक बेहतर सिस्टम तो वही होगा जहां पर कमाई पर लगाम हो। यह लोग अकूत पैसा कमाते हैं, लेकिन इन्हीं लोगों के इर्द-गिर्द घूम रहे इस खेल के दूसरे सहयोगियों को अपनी जिंदगी चलाने के लिए दो-दो नौकरियां तक करनी पड़ती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए नहीं है कि रोनाल्डो ने मेज से कोका कोला की बोतल हटाई या नहीं हटाई। बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि हम ऐसे लम्हों को देखकर अपना दिमाग लगाना भूल जाते हैं। मीडिया, मैनजेमेंट, पूंजीवादी तंत्र हमारे सामने एक व्यक्ति के सहारे सूचनाओं की जो बंब बार्डिंग करता है, उस से बनने वाली दिलचस्पी हमारा दिमाग फेर देती हैं। हम एक बार भी पलट कर नहीं देखते कि मीडिया के जरिए पूरी संरचना में जो हमारे सामने में फेंकी जा रही है। उस में कहीं पर दिक्कत है।

संसाधनों का गैर-बराबरी तरीके से बंटवारे की हर कार्यवाही को हम ही प्रश्रय देते हैं। हम थोड़ा सा भी खुरेंच कर नहीं सोचना चाहते। इन्हीं सब सामाजिक प्रवृत्तियों के चलते आर्थिक गैर बराबरी खतरनाक तौर पर मौजूद रहती है। लेकिन पर कोई हमला नहीं होता। दुनिया की एक फ़ीसदी आबादी के पास दुनिया की 70 फ़ीसदी से संपदा रहती है। हर वक्त मजदूरों श्रमिकों और कई मेहनत करने वाले लोगों का हक पूंजीपतियों की झोली में जाता रहता है। हमारा सवाल उनके खिलाफ नहीं होता। मार्क्स ने पूरी दुनिया को बता दिया कि आर्थिक गैर बराबरी की जड़ें कैसे विकसित होती हैं। लेकिन दुखद बात यह है कि खुद को मार्क्सवादी कहने वाले लोग भी इस जाल को नहीं तोड़ पाते।

चलते-चलते डॉक्टर अंबेडकर की बात याद कीजिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं चल सकता जब तक कि वह सामाजिक लोकतंत्र के आधार पर टिका हुआ नहीं है। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? यह जीवन का एक तरीका है, जो जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को पहचान देता है। जब तक आर्थिक गैर बराबरी को खत्म नहीं की जाएगी तब तक समानता नहीं आएगी। तब तक लोकतंत्र नहीं विकसित हो पाएगा। संविधान केवल पन्नों में कैद होकर रह जाएगा। जब हम रोनाल्डो जैसे लोगों के कृत्यों पर एक हद से ज्यादा बढ़कर नशे में डूब जाते हैं तो अंबेडकर की इसी बात को नजरअंदाज कर रहे होते हैं

(न्यूजक्लिक में प्रकाशित अजय कुमार के लेख का संपादित रूप साभार)

टॉपिक्स - Sports, coca cola, capitalism, Cristiano Ronaldo, Coca-Cola endorsers

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