उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 : आंकड़े क्या संकेत दे रहे हैं?

विधानसभा के चुनावों के संदर्भ में, चाहे पक्ष में हो या विपक्ष में, अब तक चर्चा सिर्फ भाजपा की हो रही है। विपक्ष की रणनीति अभी तक अस्पष्ट है और अभियान की शुरुआत कायदे से हो भी नहीं पाई है।
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022

Uttar Pradesh Assembly Election 2022: What are the figures indicating?

उत्तर प्रदेश विधानसभा के पिछले तीन चुनावों के कुल वोटों की संख्या और हुए मतदान प्रतिशत का अध्ययन, आकलन और विश्लेषण करें तो – 2007 में कुल वोट थे 11.30 करोड़-वोट पड़े 45.96%, 2012में कुल वोट थे 12.74करोड़- कुल वोट पड़े 59.40%, 2017में कुल वोट थे 14.05करोड़- कुल वोट पड़े-61.04%।

इन आंकड़ों के आधार पर एक अनुमान किया जा सकता है कि 2022 के चुनाव में कुल वोट होंगे 15.50 करोड़ और डाले जाने वाले वोटों का प्रतिशत हो सकता है- 65% यानि कि तकरीबन 10करोड़ से ज्यादा वोट पड़ेंगे।

अब आइए, इन वोटों में भाजपा के वोटों के हिस्सा का अनुमान करें। भाजपा को 2007 में 16.97%, 2012 में 15%, 2017 में भाजपा के वोटोंमें जबरदस्त उछाल आया और वह 39.67% पर पहुंच गया।

जाहिर सी बात है, भाजपा के कोर वोटर 15-17% ही हैं। भाजपा के वोटों में यह जबरदस्त उछाल की वजह राष्ट्रीय राजनीति में मोदीजीका प्रवेश था।

आरएसएस ने सात दशक से ज्यादा समय से सहयात्री रहे लालकृष्ण आडवाणी से पिंड छुड़ाकर राजनीति की ड्राइविंग सीट पर मोदी को बैठाया था। आडवाणी वह चेहरा थे, जिन्होंने भाजपा के पहले आमचुनाव, जो 1984में हुए थे, में महज दो सीटों पर सिमट चुकी भाजपा को अपने राजनैतिक संगठन कौशल और संघर्षपूर्ण जिजीविषा से 1998 में सत्ताके मुकाम तक पहुंचाया था। जब उनके मित्र प्रधानमंत्री पद पर उन्हें पदासीन देखना चाह रहे थे, तो प्रधानमंत्री के आसन तक अटलजी को ले गए।

मोदी ने आरएसएसके सामने खुद को हिंदू हृदय सम्राट के रूप में प्रस्तुत किया तो पूरे देश के सामने खुद को विकास पुरूष घोषित किया। गुजरातके लोगों में वैसे भी उद्यमशीलता कूट-कूट कर भरी है, प्रति व्यक्ति आय में वह वैसे भी अन्य प्रदेशों से आगे है, लेकिन मोदी ने अपने मार्केटिंग स्किल से यह स्थापित किया कि गुजरात के विकास की पटकथा सिर्फ उन्होंने लिखी है, वह एक बेहतरीन 'सपनों के सौदागर' साबित हुए।

मोदी के पास तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निरूत्तर कर देने वाले सवालों की झड़ी तो थी ही, गुजराती थैलीशाहों की बैकिंग भी थी। भीड़ में जोश भर देने का संवाद कौशल था, तो दूसरी तरफ फेसबुक/ट्विटर पर काम करने वाले आईटी विशेषज्ञों की फौज थी।

2017 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन सत्ताधारी दल-समाजवादी पार्टी-पारिवारिक कलह की शिकार थी। 2017में मोदी लोकप्रियता के शिखर पर थे, वोट भी उन्होंने अपने नाम पर मांगा था, डबल इंजनकी सरकार का वादा किया, सो भाजपा के वोट प्रतिशत में जबरदस्त उछाल आया, लेकिन आज वह बात कहां? इंडिया टुडे के अप्रकाशित सर्वेक्षण, जिसमें मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ 42% की गिरावट दर्ज करते हुए 66%से घटकर 24%बताई गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता का ग्राफ 49%से घटकर 29%तक पहुंच गया है। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने कोर वोट-15-17% बचा ले, तो बड़ी बात होगी।

एक उदार दृष्टिकोण-लिबरल एप्रोच- के तहत अगर इसे कोर वोटर 15-17%का डेढ़ गुना 25% भी मान लिया जाए, तो 10 करोड़ संभावित वोटों में से 2.5करोड़ वोट भाजपा को मिलेंगे। शेष 7.5-8 करोड़ वोट विपक्ष को मिलेंगे।

इन विरोधी मतों की पहली दावेदार समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव हैं। समाजवादी पार्टी को 2007 में 25.43%, 2012में जब वह सत्ता में आई थी, तो 29.15% वोट मिले। 2007 और 2012 में उसे भाजपा से ज्यादा वोट मिले थे। 2017 में जब वह  सत्ता गंवाकर 47सीटों पर सिमट गई, तो भी उसे 21.82% वोट मिले थे।

समाजवादी पार्टी का सबसे सकारात्मक पक्ष अखिलेश यादव का उच्च शिक्षा प्राप्त टेक्नोक्रेट होना और अत्यन्त सभ्य, सुसंस्कृत, शालीन होना है। वह कभी भी शब्दों की मर्यादा का परित्याग नहीं करते, ऐक्ट करते हैं- रिऐक्ट नहीं करते। लेकिन नकारात्मक यह है कि पिछड़ावाद के लिए उत्तरप्रदेश में राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह ने जो कुछ जोता बोया, उसे 1990के दशक से मंडलवाद के नाम पर यह पार्टी फसल काटती रही है। मुलायम सिंह यादव पिछड़ों के मसीहा भले बनते हों, सेक्यूलरवाद के नाम मुसलमानों का उनको समर्थन भी मिलता हो, लेकिन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव रहे हों या अखिलेश यादव-सत्ता का लाभ यादव जाति को ही मिलता रहा है, गैर-यादव पिछड़ा सत्ता के लाभ से वंचित ही रहा है।

सबसे मजेदार पक्ष यह है कि श्रीराम मंदिर निर्माण ट्रस्ट द्वारा किए गए घोटालों के उजागर होने के बाद भाजपा साम्प्रदायिकता का जहर घोलने के लिए किसी अन्य प्रतीकों का सहारा भले ले, श्रीराममंदिर निर्माणको चुनावी विमर्श में लाने की स्थिति में नहीं है। भाजपा खुद ही पिछड़ावाद का राग अलाप रही है, जबकि 2017 में केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री बनाने का वादा करके भी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया। पिछड़ावाद अगर चुनावी मुद्दा बनता है, तो भाजपा समाजवादी पार्टी से आगे जाने का सोच भी नहीं सकती।

सत्ताकी दूसरी दावेदार मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी थी। बसपा ने 2007 में 30.43%के साथ 15872561 वोट प्राप्त किए और वह अकेले 206 सीट जीत कर सत्तासीन हुई। 2012में बेशक इसने सत्ता गंवायी, लेकिन 25.91% वोट के साथ 19647303 वोट प्राप्त किए अर्थात् इसके अपने वोटों में लगभग 24% इजाफा हुआ। 2017 में बसपा को बेशक महज 19 सीटें मिलीं, लेकिन तब भी इसे 19281352 वोट मिले अर्थात् इसके वोटों में 2%से भी कम की गिरावट दर्ज की गई।

लेकिन नागरिकता संशोधन कानून और धारा 370 पर जिस प्रकार बसपा ने भाजपाका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग किया है, उससे मायावती की राजनीतिक साख धराशायी हुई है।

दूसरी तरफ, मोदीराजमें सीबीआई और आईबी के संभावित कार्यवाहियों से मायावती आतंकित और आशंकित रहीं। लालू प्रसाद वाली जीवटता उनमें है नहीं। 2012-17 के दौरान बेशक वह सत्ता में नहीं थी, लेकिन अखिलेश ने उनके विरुद्ध कोई प्रतिशोधात्मक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की थी। भाजपा से बदला लेने का उनके पास सुनहरा अवसर है कि वह गैर-भाजपा वोटों को समाजवादी पार्टीके  पक्षमें ध्रुवीकृत होने दें और भाजपा की हार सुनिश्चित करें। मायावती की राजनीतिक अ-सक्रियता उनकी इसी रणनीति का हिस्सा दीख रहा है।

कांग्रेस को 2007 में 8.61%, 2012 में 11.63%, 2017 में 6.25%वोट मिले थे। पूरे उत्तरप्रदेश में ढीला- ढाला ही सही उसका सांगठनिक ढांचा है। अभी भी लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से 206 सीटें ऐसी हैं, जहां वह अकेले ही भाजपा को टक्कर देती है। राष्ट्रीय स्तर पर बिना कांग्रेस के किसी भी प्रभावशाली गैर-भाजपा मोर्चे की सफलता की कोई संभावना नहीं है। लेकिन, भाजपा को शिकस्त देने के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव, 2020 में आम आदमी पार्टी और प.बंगाल विधानसभा चुनाव, 2021में  तृणमूल कांग्रेस को रणनीतिक तौर पर अघोषित वाक-ओवर दिया। संभव है, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, 2022 में भी वह यही अघोषित रणनीति अपनाए।

समाजवादी पार्टी ने इस बार राष्ट्रीय लोकदल से रणनीतिक समझौता कर रखा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के कारण भी रालोद के सहयोग से समाजवादी पार्टी के वोट प्रतिशत में इजाफा होने की संभावना है। बसपा और कांग्रेस के घोषित-अघोषित सहयोग-समर्थन से समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत 30%से कम होने की कोई संभावना नहीं है।

विधानसभा के चुनावों के संदर्भ में, चाहे पक्ष में हो या विपक्ष में, अब तक चर्चा सिर्फ भाजपा की हो रही है। विपक्ष की रणनीति अभी तक अस्पष्ट है और अभियान की शुरुआत कायदे से हो भी नहीं पाई है।

भाजपा को 25% और समाजवादी पार्टी गठबंधन को 30%वोट के अतिरिक्त शेष 45% वोट अभी तक अनकमिटेड वोटर दिखते हैं, जिस पर वैकल्पिक राजनीति की मशाल थामे एक्टिविस्टों की निगाह है, जो कई खेमों में बंटे हैं। बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि देश को इस या उस नेता का नहीं, इस या उस पार्टी का नहीं पूरी सड़ी-गली राजनैतिक संस्कृति के विकल्प की तलाश है। यह वर्ग वैकल्पिक राजनीति के संवाहकोंके प्रति बड़ी आशा भरी निगाहों से देख रहा है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के एक बड़े हिस्से पर सरकार और भाजपा का वर्चस्व दिखता है। डिजिटल मीडिया का बहुत थोड़ा सा स्पेस उपलब्ध है,जिसे वैकल्पिक मीडिया कहा जा रहा है, यह वैकल्पिक मीडिया वैकल्पिक राजनीति का प्रवक्ता है। यह वैकल्पिक मीडिया और वैकल्पिक राजनीति उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगा, यह देखना खासा दिलचस्प होगा।

पंकज श्रीवास्तव

Pankaj ShriVastava

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