अफ़ग़ानों के साथ जो बाइडेन प्रशासन जो कर रहा है वह क्रूरता है!

अमेरिका के लिए प्रायश्चित का काम (atonement for America) यही हो सकता है कि राष्ट्रपति बाइडेन अफ़ग़ानों की तत्काल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 9 बिलियन डॉलर लौटा दें, और विश्व बैंक और आईएमएफ़ (World Bank and IMF) को देश की सहायता करने की इजाज़त दे दें
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Taliban Afghanistan तालिबान अफगानिस्तान

What is being meted out to the Afghans by the Biden Administration is cruelty.

Reflections on Events in Afghanistan -16

निश्चित रूप से अमेरिका के लिए प्रायश्चित का काम (atonement for America) यही हो सकता है कि राष्ट्रपति बाइडेन अफ़ग़ानों की तत्काल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 9 बिलियन डॉलर लौटा दें, और विश्व बैंक और आईएमएफ़ (World Bank and IMF) को देश की सहायता करने की इजाज़त दे दें, तभी अफ़ग़ान नागरिक अपने देश के गौरवपूर्ण इतिहास के सबसे निचले स्तर से ऊपर उठ सकते हैं।

एम. के. भद्रकुमार

अनुवाद - महेश कुमार

रूसी फ़ैडरेशन की सुरक्षा परिषद के सचिव, निकोले पेत्रुशेव द्वारा 7-8 सितंबर को की गई नई दिल्ली की यात्रा का सबसे अच्छा हिस्सा यह हो सकता है कि दोनों देश अपनी दोस्ती के चरण  की खोज कर सकते हैं, तब, जब अमेरिका के नेतृत्व वाला क्वाड (चार देशों का गठबंधन) अपरिवर्तनीय रूप से उन्हें जुदा करता है और दिल्ली समुद्र तटों, पहाड़ों और हवा में चीनियों के खिलाफ मोर्चा लड़ने के लिए अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति पर सवार है।

अमेरिकी, निश्चित रूप से, शीत युद्ध की दुनिया में वापस लौट आए हैं, जो खुद की 'परमाणु श्रेष्ठता' के मायावी सपने को साकार करने के लिए रूस को कमज़ोर और संभवत: खंडित करने  के जुनून में सवार हैं।

समकालीन विश्व हालात में विरोधाभास काफी मात्रा में मौजूद हैं और भारत-रूस संबंध इसका कोई अपवाद नहीं हैं। शनिवार को दिल्ली में काफी जोशीला मिज़ाज देखने को मिला जब ऑस्ट्रेलियाई मंत्रियों को दिल्ली बुलाया गया और काबुल में तालिबान सरकार को धमकाने के तरीकों और साधनों के बारे में उनसे बातचीत की गई। 

हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर को इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऑस्ट्रेलियाई सैनिक रातों-रात अफ़ग़ानिस्तान से भाग गए थे, जब यह पता चला कि उन्होंने लक्ष्य साधने के अभ्यास के लिए अफ़ग़ान नागरिकों का इस्तेमाल किया था और अपने मेजबान देश में कई जघन्य  अपराध थे! फिर भी, भारत और ऑस्ट्रेलिया आज तालिबान के अधीन अफ़ग़ान महिलाओं की दुर्दशा से चिंतित नज़र आता हैं!

संक्षेप में कहें तो, भारत और रूस के सुरक्षा ज़ारों के बीच महान संमिलन यह है कि वे बड़ी अशांत मुस्लिम आबादी वाले राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दमन से व्यथित महसूस करते हैं। दिल्ली और मॉस्को को इस बात की चिंता है कि उनके बाहरी वातावरण में राजनीतिक इस्लाम के प्रभुत्व से उनकी अपनी मुस्लिम आबादी कट्टरपंथी बन सकती है।

फिर भी, छोटी सी बात यह है कि पेत्रुशेव वास्तव में सप्ताह के भीतर आने वाले तीसरे ज़ार हैं  - जो यूके सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस या एमआई 6 के प्रमुख रिचर्ड मूर और यूएस सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के प्रमुख विलियम बर्न्स के बाद आए हैं। पश्चिमी शक्तियाँ इस असाधारण समय में दिल्ली को इस क्षेत्र में सबसे तार्किक गंतव्य स्थान के रूप में मानती हैं – उपरोक्त देशों के बीच इस किस्म की आपसी वार्ताएं राजनीतिक इस्लाम के उदय और अफ़ग़ानिस्तान के ललाट पर  उभरते लाल सितारे के प्रतिरोध में है।

अफ़ग़ानिस्तान पर बीबीसी के प्रसारण कुछ महीने पहले म्यांमार और बेलारूस के बारे में किए गए उसके भयानक प्रसारण के समान हैं – यह सब सोशल मीडिया के कुशल इस्तेमाल के माध्यम से एक 'रंग क्रांति' के जरिए चीन और रूस में मौजूदा शासन को उखाड़ फेंकने और इन शत्रुतापूर्ण शक्ति केंद्रों को घेरने का प्रयास है। पश्चिम देशों के लिए मानवाधिकार के मुद्दों को हथियार बनाना आसान हो गया है।

क्या ठाठ-बाट से अंग्रेजी बोलने वाली अफ़ग़ान महिलाएं वास्तव में अपने देश का प्रतिनिधित्व करती हैं? "द अदर अफ़ग़ान वीमेन" जो न्यू यॉर्कर पत्रिका में एक शानदार निबंध का शीर्षक है जिसे आनंद गोपाल ने लिखा है जोकि पश्चिमी दुनिया में अफ़ग़ान युद्ध के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकारों में से एक है और जो प्रशंसित 2014 की पुस्तक के लेखक हैं, जिसका शीर्षक ‘नो गुड मेन अमंग द लिविंग: अमेरिका, तालिबान एंड द वॉर थ्रू अफ़ग़ान आइज़' है?

गोपाल ने खुलासा किया कि सोशल मीडिया के कारण उत्साहित शहरी लोगों की तुलना में अफ़ग़ान ग्रामीण इलाकों में बताने वाली कहानियां पूरी तरह से अलग है। 70 प्रतिशत से अधिक अफ़ग़ान शहरों में नहीं रहते हैं। गोपाल लिखते हैं कि ग्रामीण इलाकों में, बीबीसी की रज़िया इकबाल और लिस डौसेट द्वारा दिखाई जाने वाली वास्तविकता पूरी तरह से अलग है।

अमेरिकी सेना और अमरुल्ला सालेह के नाटो-प्रशिक्षित अफ़ग़ान विशेष बलों के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन पूरी तरह से "खतरे” से खाली नहीं था; यहाँ तक कि धूप में चाय पीना या अपनी बहन की शादी में गाड़ी चलाना भी एक संभावित खतरा होता था।” यहाँ गोपाल के निबंध का एक अंश दिया जा रहा है:

"जमीन पर कुछ ब्रिटिश अधिकारी चिंतित दिखे कि अमरीका बहुत से नागरिकों को बेवजह मार रहा था, और उन्होने इस क्षेत्र से अमेरिकी विशेष बलों को हटाने के नाकाम प्रयास किए थे। इसके बजाय, दुनिया भर से सैनिकों ने हेलमंड में प्रवेश किया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई, कनाडाई और डेन सैनिक शामिल थे। लेकिन ग्रामीणों को इनके बीच का अंतर नहीं पता था - उनके लिए कब्जा करने वाले केवल "अमेरिकी" थे। पास के एक गाँव की महिला पज़ारो याद करती है, “दो तरह के लोग थे- एक काले चेहरे वाले और दूसरे गुलाबी चेहरे वाले। जब हम उन्हें देखते हैं, तो हम घबरा जाते हैं।" गठबंधन सेना ने स्थानीय लोगों में तालिबान से मुक्ति पाने की भूख को चित्रित किया था, लेकिन 2011 की एक क्लासिफाइड खुफिया रिपोर्ट में पाया गया कि गठबंधन बलों की सामुदायिक धारणाएं जनता की समझ के "प्रतिकूल" थीग्रामीणों ने चेतावनी दी थी कि, यदि गठबंधन सेनाएं "क्षेत्र नहीं छोड़ती है, तो स्थानीय नागरिकों को इलाका खाली करने पर मजबूर होना पड़ेगा।”

यह स्थिति 10 साल पहले ही पहुँच चुकी थी - और अभी भी पश्चिमी कब्जे के 10 साल बाकी थे। मानव सुरक्षा, एक देश के विपरीत, पूर्ण है - केवल इसलिए नहीं कि आप केवल एक बार जीते हैं या आपकी बेटी केवल एक बार ही अपनी मासूमियत खो सकती है। यदि आपके युवाओं का इस्तेमाल नशे में धुत ऑस्ट्रेलियाई सैनिक लक्षित अभ्यास के लिए करते हैं या अपने ही देश के सुरक्षा बल युवाओं के साथ अभद्रता या उनका यौन शोषण करते हैं तो आपके जीवन का फिर क्या मूल्य रह जाता है?

मिसाल के तौर पर, 31 अगस्त को कब्जा खाली करने से ठीक पहले, अमेरिकी सैनिकों ने अंतिम अपराध को अंजाम दिया – जघन्य अपराध की अंतिम छाप – यानि अमरीकियों ने ड्रोन के जरिए सहायता का काम करने वाले एक कार्यकर्ता और सात छोटे बच्चों के परिवार को मार दिया था, और फिर बड़ी ही क्रूरता से झूठ बोला गया कि वह आदमी आईएसआईएस आतंकवादी था। .

क्या इन अंग्रेजों के हाथ आधुनिक इतिहास में मानव रक्त से सने हुए नहीं हैं? लेकिन अमेरिकी इतने प्रतिशोधी हैं कि वे अफ़गानों को अपना पैसा भी खर्च नहीं करने देंगे। क्या अमेरिका को अन्य लोगों को डराने-धमकाने के बजाय अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं नहीं करना चाहिए? एक छोटे से वायरस ने पिछले डेढ़ साल में 6,77,737 अमेरिकियों की जान ले ली है... दुखों से भरे ऐसे देश की आत्मा में इतना लोहा कैसे हो सकता है?

बाइडेन प्रशासन ने अफ़ग़ानों के साथ जो किया वह क्रूरता है। कोई गलती न हो, प्रोमेथियस, सिसिफस, कोरिंथ, एक्टन - उन्हें प्राचीन ओलंपियन देवताओं ने बहुत कम अपराधों के लिए भयानक उदाहरण के रूप में माना था।

यह एक ईसाई गुण हो सकता है और निश्चित रूप से प्रायश्चित का काम भी हो सकता है यदि राष्ट्रपति बाइडेन अफ़ग़ानों की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए 9 बिलियन डॉलर लौटा देते हैं, और विश्व बैंक और आईएमएफ को उस देश की सहायता करने की इजाज़त दे देते हैं तो वे अपने देश के गौरवपूर्ण इतिहास के सबसे निचले बिंदु से ऊपर उठ सकते हैं। अच्छा या बुरा, आगे का रास्ता निकालने की जिम्मेदारी तालिबान और साथी अफ़ग़ानों पर छोड़ दें तो बेहतर होगा।

(एमके भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

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साभार - न्यूजक्लिक

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