दिग्विजय सिंह के बयान पर क्यों बरपा है हंगामा ?

सवाल यह है कि क्या तालिबानी राष्ट्रवादी नहीं हैं? क्या हिटलर, स्टालिन, किम इल जोंग जैसे नेता राष्ट्रवादी नहीं रहे? वास्तव में राष्ट्रवाद का नारा ही बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यक विरोध के लिए गढ़ा जाता है।... Read more
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दिग्विजय सिंह की खरी-खरी : ईवीएम से बनी मोदी सरकार से वही लड़ सकता है, जिस पर ईडी, सीबीआई के मामले न हों

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह बोलते हैं तो हंगामा बरप जाता है। इसके दो कारण होते हैं। एक दिग्विजय सिंह राजनीतिक मुद्दे को समझते हैं और जानते हैं कि भाजपा को कौन सा मुद्दा जंचता है और किससे वह बिफरती है। दोनों ही स्थिति में दिग्विजय सिंह भाजपा को ऊपर से नीचे तक बेचैन कर डालते हैं। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह के बहाने भाजपा कांग्रेस को सीधे निशाने पर ले लेती है जो उसका पसंदीदा निशाना है। कहने का अर्थ यह है कि दिग्विजय सिंह के बयान का भाजपा वाले भी इंतज़ार करते हैं और राजनीति इस बात से ऊपर उठकर होती है कि दिग्विजय सिंह सही जो कह रहे हैं वह सही है या गलत।

संघ-तालिबान में समानता का जिक्र गुनाह कैसे ?

दिग्विजय सिंह के ताजा ट्वीट पर गौर करें तो उन्होंने इंडिया टुडे में मोहन भागवत के 2013 में प्रकाशित बयान का जिक्र भर करके तालिबान के विचार से उसकी तुलना कर दी। तुलना का एक मतलब यह था कि तालिबान और मोहन भागवत के विचार महिलाओं को लेकर एक जैसे हैं। तथ्यात्मक रूप से यह तुलना कतई गलत नहीं है। मगर, बात सिर्फ तथ्य की नहीं होती। तालिबान सिर्फ तथ्य नहीं है। तालिबान आचरण है, वैश्विक इस्लामिक शक्ति के रूप में उसका नया अवतरण है, 20 साल बाद शरीअत के नाम पर ही शासन करने की तालिबान के लिए बनी स्थिति है।

सच यह है कि दुनिया भर में तालिबान कट्टरपंथियों के लिए अनुकरणीय बन चुका है। इसलिए जब मोहन भागवत जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख की तुलना तालिबान से होती है तो यह तुलना अन्य चीजों के साथ-साथ कट्टरपंथ से भी हो जाती है।

भाजपा और संघ कभी खुद को तालिबान जैसा बर्बर, सैन्यवादी, कट्टरपंथी, आतंकवादी नहीं मानती। इसलिए संघ की तुलना तालिबान से उन्हें अखर जाती है।

भाजपा के नेता पूछते फिर रहे हैं कि क्या आरएसएस तालिबान की तरह क्रूर है? क्या यह उस जैसा महिला विरोधी है, आतंकी है, सैन्यवादी है, कट्टरपंथी है, मानवता का दुश्मन है?...वगैरह वगैरह। निश्चित रूप से इसका उत्तर है नहीं। मगर, क्या नहीं उत्तर आते ही आरएसएस को क्लीन चिट मिल जाती है? इसका भी उत्तर है- नहीं।

तालिबान के पास प्रत्यक्ष सत्ता, संघ के पास परोक्ष

अपने अधिकार क्षेत्र में तालिबान इस्लाम को भी हांकता है और राजनीतिक सत्ता भी उसके हाथ में है। आरएसएस के पास कोई प्रत्यक्ष विजित प्रदेश नहीं है, मगर आरएसएस के पास राजनीतिक शक्ति भी है और हिन्दू धर्म पर भी उसकी उतनी ही पकड़ है। आरएसएस सत्ता और धर्म के समांतर ऐसी शक्ति है जो परोक्ष रूप से दोनों का नियंत्रण कर रहा है। तालिबान शरीअत के हिसाब से देश चलाना चाहता है। हिन्दू राष्ट्र बनाने की खुली इच्छा आरएसएस भी प्रकट करता है। तालिबान जिस किस्म की क्रूरता करता है वैसी क्रूरता हिन्दुस्तान की धरती पर नहीं पनप सकी क्योंकि हिन्दुस्तान के पास है दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान, जो बड़ी मेहनत से स्वतंत्रता सेनानियों के हाथों तैयार किया गया है।

तालिबान से मोहन भागवत की तुलना से पहले भी जब कभी किसी ने तालिबान या तालिबान सरकार से सहानुभूति दिखलायी या फिर अच्छे प्रशासन की उम्मीद रखी, तो कह दिया गया कि ऐसे लोग अफगानिस्तान को चुन लें। अपने से इतर विचार रखने वालों के लिए देश छोड़ने का विकल्प देने का फरमान ही तो तालिबान का चरित्र है। ऐसे फरमान हमारे देश के संविधान से नहीं निकल सकते। हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान का नारा हो या हिन्दुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम् कहना होगा या फिर हिन्दू होने के लिए इस धरती को पुण्य भूमि मानने की शर्त जो आरएसएस ने रखी है, ये सब स्वभाव और चरित्र में तालिबानी ही कही जाती हैं। यह अलग बात है कि तालिबान का जन्म हाल में हुआ है आरएसएस का अस्तित्व बहुत पहले से है।

तालिबान हो या संघ दोनों का धर्म और सियासत पर है कब्जा

लेकिन, क्या आरएसएस का अस्तित्व हिन्दू धर्म से पहले से है या फिर तालिबान इस्लाम से पुराना है? कतई नहीं। तो क्यों ये दोनों अपने-अपने देश में अपने-अपने धर्मों के ठेकेदार बने हुए हैं? भारत में जब राम मंदिर निर्माण के लिए शिलापूजन होता है तो हिन्दू धर्म के शंकराचार्य को इस समारोह में जगह नहीं मिलती, लेकिन मोहन भागवत जगह पा जाते हैं या फिर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल अपने लिए जगह बना लेते हैं। यह ऐसा उदाहरण है जिसमें ऐसा प्रतीत होता है मानो आरएसएस ने हिन्दू धर्म और हिन्दुस्तान के शासन को मुट्ठी में कर लिया है।

तालिबान अफगानिस्तान में निश्चित रूप से ऐसा कर चुका है। लगता है इसीलिए, तालिबान और आरएसएस के बीच तुलना की जा रही है?

तालिबानी सोच को नियंत्रित करता है भारत का संविधान | Constitution of India controls Talibani thinking

फर्क जरूर है। दोनों संगठनों की क्षमता, विश्वसनीयता, अतीत सब कुछ अलग हैं। एक के पास भारत जैसा संविधान नहीं है और इसलिए वह निरंकुश है। वहीं, दूसरे को भारतीय संविधान ही निरंकुश बनाए रखने से रोके हुए है। फिर भी राष्ट्रवाद की आड़ में निरंकुश शक्तियां लगातार कट्टरपंथ को बढ़ावा देने में जुटी रही हैं।

सवाल यह है कि क्या तालिबानी राष्ट्रवादी नहीं हैं? क्या हिटलर, स्टालिन, किम इल जोंग जैसे नेता राष्ट्रवादी नहीं रहे? वास्तव में राष्ट्रवाद का नारा ही बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यक विरोध के लिए गढ़ा जाता है।

धार्मिक कट्टरपंथियों को भी राष्ट्रवाद बहुत सुहाता है। आरएसएस और उसके सहयोगी राजनीतिक, धार्मिक या सांस्कृतिक संगठन सभी राष्ट्रवाद के झंडाबरदार रहे हैं। क्या यह गुण भी तालिबान से अलग कहे जा सकते हैं? यह तय करना पाठकों का विवेक है

अल्पसंख्यक विरोध तालिबानी खासियत

बहुसंख्यकवाद के  हिमायती चाहे वे तालिबानी हों या आरएसएस-भाजपा जैसे संगठन, वास्तव में इनका सशक्त होना केवल दिखावा है। कमजोर को दबा कर, जुल्म कर, बंदूक के दम पर सशक्त कोई भी हो सकता है। लेकिन, सामूहिक समावेशी विकास की जिम्मेदारी के साथ सशक्त दिखना बिल्कुल अलग बात। यही फर्क किसी भी संगठन को तालिबान से अलग करती है। क्या संघ-भाजपा यह फर्क पैदा करने को तैयार है?

प्रेम कुमार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और टीवी पैनलिस्ट हैं।


 

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