क्यों जातिगत जनगणना की मांग मूलत आरएसएस को मजबूत होने की मांग है?

जाति के नेता भाजपा में ही क्यों जाएंगे ? मायावती और अखिलेश यादव जातिगत जनगणना की मांग को लेकर बहुत उत्साहित क्यों नहीं हैं? मायावती से भी होंगे सवाल. अखिलेश यादव से भी होंगे सवाल.
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debate issue बहस मुद्दा

Why the demand for caste census is basically a demand of the RSS to be strong?

जातिगत जनगणना (caste census) मूलतः संघ को उन जातियों के बीच स्थापित करने का एक गंदा खेल है जिनमें अभी नेता नहीं है.

जैसे ही इन जातियों को इनकी असली संख्या का पता चलेगा वहां भी जातियों मे नेता जरूर पैदा होंगे.

जाति के नेता भाजपा में ही क्यों जाएंगे ?

ये नेता RSS/BJP में खुद के लिए जगह खोजेंगे, क्योंकि जातिगत अस्मिता और जाति के नेता बनने की राजनीति की अंतिम गंगोत्री भाजपा ही है.

यह ठीक उसी तरह से होगा जैसे आज बहुत से नेता भागीदारी और न जाने क्या-क्या लंद फंद की राजनीति करके भाजपा में मलाई काट रहे हैं. नाम लेने की आवश्यकता नहीं है.

अखिलेश यादव से भी होंगे सवाल

एक बात आप और देख सकते हैं कि पिछड़े या दलित राजनीति में जो स्थापित जातियां हैं उनके नेताओं के बीच से जातिगत जनगणना की मांग नहीं हो रही है.

उदाहरण के लिए पिछड़ी जातियों में से जिन जातियों में एकदम ही नेता नहीं है जब उनमें नेता पैदा होंगे तो यह सवाल अखिलेश यादव से भी पूछा जाएगा कि आपने हमारी जाति के लिए सत्ता में रहते हुए क्या किया था?

मायावती से भी होंगे सवाल

यह सवाल अति दलित जातियों द्वारा मायावती से भी पूछा जाएगा. क्योंकि तब उनके पास जाति से सवाल पूछने के लिए एक नेता होगा. और यह सवाल इन सबको असहज करेगा.

क्योंकि जब वे यह मांग करेंगे तो उनसे भी यह सवाल पूछा जाएगा. ये नये जातिगत नेता पिछड़े- दलित सियासी सर्गनाओं से भयानक सौदेबाजी भी करेंगे? क्या इस सौदेबाजी को राजनीति में स्थापित इन जातियों के नेता बर्दाश्त कर पाएंगे?

मायावती और अखिलेश यादव जातिगत जनगणना की मांग को लेकर बहुत उत्साहित क्यों नहीं हैं?

यह सवाल हर बार आयेगा कि जब आप सत्ता का हिस्सा थे तब आपने इन जातियों के लिए क्या किया था? यह सवाल राजनीति में स्थापित हो चुकी जातियों के नेताओं के लिए भी बहुत असहज स्थिति पैदा करेगा. वह क्यों चाहेंगे कि भविष्य में उनके लिए कोई असहज करने वाला सवाल पैदा हो और उनकी नासमझी से ही ऐसे लोग उत्पन्न हो जाएं?

इसीलिए आप देखिए कि समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो और मायावती जैसे लोग जातिगत जनगणना की मांग को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है.

एक बात और साफ करने की जरूरत है कि इस समय 'इंडिया ऑन सेल' पर है. जब संसाधन ही सब कारपोरेट के जेब में चला जाएगा फिर आप जातिगत जनगणना और उस आधार पर संसाधनों में भागीदारी की मांग किस से करेंगे?

यह निर्मम सत्य है कि जातिगत जनगणना हो जाने के बाद जिन जातियों में नेता नहीं है वहां छोटे-छोटे नेता पैदा होंगे और वह सब अपनी जाति को इकट्ठा करके भाजपा की गोद में जा बैठेंगे.

और इस तरह से जातिगत जनगणना के मजबूत होने की मांग मूलत RSS को मजबूत होने की मांग है. जातिगत जनगणना होने से भारत के लोकतंत्र में कोई मजबूती आने वाली नहीं है. नागरिक बोध का विकास होने वाला नहीं है. इसलिए इस मांग को स्वीकार करने का कोई मतलब नहीं बनता है.

हरे राम मिश्र

लेखक आरटीआई एक्टिविस्ट और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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