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Subhas Chandra Bose

कुछ तो शर्म करो मोदी, सुभाष पर चले मुकदमे के बाद देश में बन गया था आजादी का माहौल, नेहरू ने लड़ा था मुकदमा

Pandit Jawaharlal Nehru criticized by Narendra Modi

जिन पंडित जवाहर लाल नेहरू की आलोचना (Criticism of Pandit Jawaharlal Nehru) करते-करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र नहीं थकते हैं। जिन पंडित नेहरू पर भाजपा और आरएसएस क्रांतिकारियों के बलिदान को आगे न आने का आरोप लगाते हैं। वही पंडित नेहरू  सुभाष चंद्र बोस और उनकी टीम पर चले मुकदमे के पहले दिन ही वकालत की पढ़ाई के करीब तीस साल बाद फिर से वकील की वर्दी पहनकर सुभाष चंद्र बोस के पक्ष में ट्रायल में खड़े हो गये थे।

उस समय नेहरू को सुभाष और उनके सैनिकों की पैरवी करते देख देश के लोग खुशी से झूम उठे थे और नारा लगा था -हिन्दुस्तान की एक ही आवाज, सुभाष, ढिल्लो और शाहनवाज।

उसी समय नेताजी से जुड़े विमान हादसे की खबर आ गई और इन सैनिकों पर चल रहे मुकदमे के प्रति जनता की सहानुभूति भी जुड़ गई। यहां तक कि ब्रिटिश सेना में काम कर रहे भारतीय सैनिक भी इस मामले में आजाद हिन्द फ़ौज के साथ खड़े हो गए।

कानपुर, कोहाट, इलाहाबाद, बमरौली की एयरफोर्स इकाइयों ने इन सैनिकों को आर्थिक सहयोग भेजा। पंजाब और संयुक्त प्रांत में आजाद हिन्द फ़ौज के पक्ष में हो रही जनसभाओं में ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के लिए काम रहे भारतीय सैनिक भी वर्दी में जाते दिखे।

यह मुकदमा आजादी की लड़ाई को कितना मजबूत कर गया था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (North West Frontier Province) के गवर्नर कनिंघम ने तत्कालीन वायसरॉय को लिखा कि राज के लिए अब तक वफादार रहे लोग इस मुदकमे की वजह से ब्रिटिश राज के खिलाफ होते जा रहे हैं।

ब्रिटिश इंपीरियल आर्मी के कमांडर इन चीफ (Commander in Chief of the British Imperial Army) ने अपने दस्तावेजों में दर्ज किया कि सौ फीसदी भारतीय अधिकारी और ज्यादातर भारतीय सैनिकों की सहानुभूति आजाद हिन्द फ़ौज की तरफ है।

नवम्बर 1945 को लाल किले में शुरू हुआ यह मुकदमा मई 1946 में खत्म हुआ। फैसले में कथित आरोपी तीन अफसरों कर्नल शाहनवाज, प्रेम सहगल और गुरुबक्श सिंह ढिल्लो को देश निकाले की सजा दी गई, हालांकि इस पर कभी अमल नहीं हुआ। बाकी के सैनिकों पर जुर्माना लगा और तीन महीने के भीतर उन्हें छोड़ दिया गया।

दरअसल नेताजी ने आजाद हिन्द फौज भले ही विदेश में जाकर बनाई हो लेकिन उसका पूरा उद्देश्य अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराना था।

5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने आजाद हिन्द सेना के ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए उन्होंने ‘दिल्ली चलो!’ का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी, जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।

1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया

मार्च 1944 में आजाद हिन्द फ़ौज के दो डिवीजन मोर्चे पर थे। पहली डिवीजन में चार गुरिल्ला बटालियन थी। यह अराकान के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से मोर्चा ले रही थी। इसमें से एक बटालियन ने वेस्ट अफ्रीकन ब्रिटिश डिवीजन की घेराबंदी को तोड़ते हुए मोवडोक पर कब्ज़ा कर लिया। वहीं बहादुर ग्रुप की एक यूनिट जिसका नेतृत्व कर्नल शौकत अली कर रहे थे, मणिपुर के मोइरंग पहुंच गई। 19 अप्रैल की सुबह कर्नल शौकत अली ने मोइरंग में झंडा फहरा दिया।  इधर, जापान की 31 वीं डिविजन के साथ कर्नल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फ़ौज की दो बटालियनों ने चिंदविक नदी पार की। यहां से ये लोग इम्फाल और कोहिमा की ओर बढ़े। इस ऑपरेशन के दौरान जापानी सेना के कमांडर और भारतीय अधिकारियों के बीच कहासुनी ने स्थिति को बिगाड़ दिया। ऐसे विपरीत हालात में मौसम ने भी आजाद हिन्द फ़ौज का साथ छोड़ दिया।

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दरअसल मानसून हर साल के मुकाबले इस साल जल्द शुरू हो गया था। भारी बारिश ने पहाड़ी सड़कों को कीचड़ के दरिया में तब्दील कर दिया। जापानी सेना इस अभियान से पीछे हटने लगी। ऐसे में आजाद हिन्द फ़ौज का आत्मविश्वास डिगने लगा।

मई के अंत तक आजाद हिन्द फ़ौज की सभी बटालियनें वापस बेस कैंप की ओर लौटने लगीं। मार्च में जो आजाद हिन्द फ़ौज आक्रामक तरीके से भारतीय क्षेत्रों में आक्रमण कर रही थी, अगस्त आते-आते बर्मा में अपने आधार क्षेत्र को बचाने में लग गई।

इम्पीरियल सेना के तोपखानों और लड़ाकू विमानों ने जंग का रुख मोड़ दिया था। कोहिमा से वापसी के बाद भारत को आजाद कराने का सपना लगभग दफ़न हो चुका था। जापान की स्थिति और भी ख़राब थी। इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार था।

CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT, CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

इस हताशा भरे दौर में भी सुभाष चंद्र बोस ने रेडियो रंगून के जरिए गांधी जी और देश को संबोधित किया।

महात्मा गांधी को नेताजी ने कहा था राष्ट्रपिता’ Netaji called Mahatma Gandhi the ‘Father of the Nation’

जिस गांधी की लंगोटी पर कटाक्ष करते हुए पीएम मोदी सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं, उनको राष्ट्रपिता का संबोधन सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस ने ही दिया था।

अगले एक साल तक आजाद हिन्द फ़ौज ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के किसी भी मोर्चे पर सीधी लड़ाई से बचने की कोशिश करती रही। मांडला और माउन्ट पोपा में बुरी तरह मात खाने के बाद आजाद हिन्द फ़ौज को रंगून की तरफ पीछे हटना पड़ा। सैनिकों के बीच हताशा की भावना थी। अप्रैल 1945 तक आजाद हिन्द फ़ौज के कई सैनिक बढ़ती हुई ब्रिटिश आर्मी के सामने हथियार डालने लगे। अप्रैल के अंत में पहली डिवीजन के 6000 सैनिकों को छोड़ कर बाकी सभी सैनिकों ने बर्मा छोड़ दिया और आजाद हिन्द फौज अपने पुराने केंद्र सिंगापुर लौट गई। इन छह हजार सैनिकों को बिर्टिश आर्मी के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा।

इस तरह देश से अपेक्षित सहयोग न मिलने की वजह से जुलाई तक ‘दिल्ली चलो’ का नारा एक असफल प्रयोग और सैनिक एडवेंचर के तौर पर इतिहास में दर्ज होकर रह गया।

चरण सिंह राजपूत

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