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“क्लिक कल्चर” के प्रतिवाद में पंडित नेहरू

“क्लिक कल्चर” के प्रतिवाद में पंडित नेहरू

‘क्लिक कल्चर’ , ‘क्विक’ कल्चर है

नई डिजिटल कल्चर (new digital culture) ‘क्लिक कल्चर’ है। ‘क्विक’ कल्चर है। इसने ‘पुसबटन’ और इमेज को महान और लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारों को खोखला और निरर्थक बनाया है। सम्प्रति टीवी से लेकर फेसबुक तक अनेक संगठन और नेता इसके शैतान खिलाड़ी के रुप में खेल रहे हैं और भारत की मासूम युवा पीढ़ी को इमेजों के जरिए दिग्भ्रमित करने में लगे हैं।

युवाओं के विवेक पर क्लिक कल्चरने सीधे हमला बोला हुआ है..

कहा जा रहा है ‘क्लिक’ इमेज ही सत्य है, विचार तो बकबास होते हैं, बोर करते हैं, कमाना मूल्यवान काम है, सोचना फालतू चीज है, व्यवहारवादी बनो, जनवादी मत बनो, धर्मनिरपेक्षता फालतू चीज़ है, लोकतंत्र में रहो लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के बिना। लोकतांत्रिक मूल्य तो बोझा हैं, वोट दो, लेकिन विवेकवाद के आधार पर सोचो मत, सार्थक है सिर्फ चुनाव जीतना। इस ‘क्लिक कल्चर’ के नायक इन दिनों पंडित नेहरू का भी ‘क्लिक संस्कार’ करने में मशगूल हैं।

सामान्य प्रधानमंत्री नहीं थे पंडित जवाहरलाल नेहरू

उल्लेखनीय है पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के सामान्य प्रधानमंत्री नहीं थे, वे सामान्य राजनेता भी नहीं थे। आमतौर पर लोकतंत्र में नेता आते हैं और जाते हैं। औसत नेता ही लोकतंत्र की संपदा के रुप में नजर आते हैं, भारत में अनेक औसत नेता प्रधानमंत्री बने, लेकिन आधुनिक विचारवान विरल प्रधानमंत्री तो एकमात्र पंडितजी ही थे। वे ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनके पास आधुनिक भारत का विज़न था, आधुनिक विचार थे, आधुनिक जीवनशैली थी और इन सबसे बढ़कर अपने विचारों के लिए जोखिम उठाने का साहस था।

नेहरू को पूजना आसान है, उनकी विरासत को समझना और उनके विचारों की दिशा में जोखिम उठाकर चलना बहुत मुश्किल काम है। खासकर वे लोग जो आधुनिक विचारों, वैज्ञानिक सचेतनता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मर्म से अनभिज्ञ हैं या जो लोग आए दिन इनकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करते हैं, उनके लिए नेहरू को पाना बेहद मुश्किल है।

भारत की संस्कृति की देन थे नेहरू

नेहरू ‘क्लिक कल्चर‘ की देन नहीं थे, वे तो संस्कृति की देन थे। नेहरू को पाने के लिए भारत की संस्कृति के पास जाना होगा। संस्कृति का मार्ग बेहद जटिल और जोखिम भरा है, वह फेसबुक की वॉल पर लिखी ‘क्विक’ इबारत नहीं है। नेहरू कोई किताब नहीं है, कोई कुर्सी नहीं है या मूर्ति नहीं है जिसके साथ खड़े होकर फोटो क्लिक करो और नेहरू की पंक्ति में शामिल हो जाओ!

भारत के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद नेहरू की पंक्ति में खड़े होना संभव नहीं है। क्योंकि नेहरू कुर्सी नहीं बल्कि देश का आधुनिक विज़न हैं।

नेहरू के आधुनिक विज़न को सचेत रूप से अर्जित करना होगा, तब ही सही मायने में नेहरू की रूह को स्पर्श किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है।

नेहरू को महान जिस चीज ने बनाया, वह था जीवन के प्रति उनका विवेकवादी नजरिया। नेहरू के लिए साधन और साध्य एक थे। उन्होंने लिखा है ”शुरु में जिंदगी के मसलों की तरफ़ मेरा रुख़ कमोबेश वैज्ञानिक था, और उसमें उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के शुरु के विज्ञान के आशावाद की चाशनी भी थी। एक सुरक्षित और आराम के रहन-सहन ने और उस शक्ति और आत्म-विश्वास ने, जो उस समय मुझमें था, आशावाद के इस भाव को और बढ़ा दिया था।”

हमारे नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में एक बड़ा अंश है जो अंधविश्वासी और धर्म का अंधपूजक है। वे धर्म को आलोचनात्मक विवेक की आंखों से देखते ही नहीं हैं। ऐसे अंधपूजक हमारे देश के प्रधानसेवक भी हैं। जबकि नेहरू में ये चीजें एकदम नहीं थीं।

नेहरू ने लिखा है, ”मजहब में – जिस रूप में मैं विचारशील लोगों को भी उसे बरतते और मानते हुए देखता था,चाहे वह हिन्दू-धर्म, चाहे इस्लाम या बौद्ध-मत या ईसाई-मत-मेरे लिए कोई कशिश न थी। अंध-विश्वास और हठवाद से उनका गहरा ताल्लुक था और जिन्दगी के मसलों पर ग़ौर करने का उनका तरीक़ा यक़ीनी तौर पर विज्ञान का तरीक़ा न था। उनमें एक अंश जादू-टोने का था और बिना समझे-बूझे यकीन कर लेने और चमत्कारों पर भरोसा करने की प्रवृत्ति थी।’

”फिर भी यह एक जाहिर-सी बात है कि मज़हब ने आदमी की प्रकृति की कुछ गहराई के साथ महसूस की हुई जरुरतों को पूरा किया है और सारी दुनिया में, बहुत ज्यादा कसरत में, लोग बिना मज़हबी अकीदे के रह नहीं सकते। इसने बहुत-ऊँचे किस्म के मर्दों और औरतों को पैदा किया है, और साथ ही तंग-नज़र और ज़ालिम लोगों को भी। इसने इन्सानी ज़िन्दगी को कुछ निश्चित आंकें दी हैं और अगरचे इन आंकों में से कुछ आज के ज़माने पर लागू नहीं हैं. बल्कि उसके लिए नुकसानदेह भी हैं, दूसरी ऐसी भी हैं, जो अख़लाक़ और अच्छे व्यवहार लिए बुनियादी हैं।”

नेहरू ने लिखा है ‘ असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है, किसी दूसरी दुनिया या आने वाली जिंदगी में नहीं।”

पंडितजी पुनर्जन्म की धारणा में यकीन नहीं करते थे, अंधविश्वासों के विरोधी थे। दिमागी अटकलबाजी में यकीन नहीं करते थे। वे चीजों, घटनाओं, व्यक्तियों, समुदाय और वस्तुओं को वैज्ञानिक नजरिए से देखने में विश्वास करते थे। उन्होंने माना ”मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को एक नई रोशनी में देखने में बड़ी मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।”

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

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