पैंथर्स पार्टी ने मोदी को याद दिलाया धर्मनिरपेक्ष भारत ही एकमात्र रास्ता, राजनीति में प्रतिशोध बेहद खतरनाक

Panthers Party reminded Modi that secular India is the only way

नई दिल्ली, 06 जनवरी 2020. नेशनल पैंथर्स पार्टी के मुख्य संरक्षक एवं सर्वोच्च न्यायालय में एक वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. भीम सिंह ने छात्रों व अन्य लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शनों की कथित घटनाओं पर गहरा खेद व्यक्त किया, जो शांति के वातावरण को खतरे में डालकर शांतिप्रिय लोगों को भड़का रहे हैं। उन्होंने कई विश्वविद्यालयों के छात्रों के हिंसक विरोध प्रदर्शनों पर भी गहरा दुख प्रकट किया।

प्रो. भीम सिंह ने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को याद दिलाया कि वह (भीम सिंह) स्वयं कई मौकों से गुजरे हैं, जब उन्हें पुलिस की गोलियों का सामना किया और 1966 में जम्मू शहर की सड़कों पर उनके बगल में खड़े सरदार गुरचरण सिंह की तरह अपने अन्य छात्र सहयोगियों को खोना पड़ा। उन्होंने पुलिस बल से अपील की कि वह विश्वविद्यालय के अंदर व बाहर युवाओं की भावनाओं को समझे। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से यह भी अपील की कि वे एक युवा और छात्र के रूप में अपने पुराने दिनों को याद करें, जब वे जोशीले विरोध प्रदर्शन करते थे। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सड़कों पर शांतिपूर्ण, भावुक युवाओं व छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बरकरार रखना चाहिए।

उन्होंने शासक वर्ग को याद दिलाया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसने पूरी दुनिया को शांति, सहिष्णुता और सद्भावना का संदेश दिया है। शांति-प्रेमी प्रदर्शनकारियों को उनकी संपत्ति से वंचित करना और उन्हें पुलिस थानों व जेलों में ले जाना और उनकी बर्बरता से पिटाई करना लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है।

प्रो. भीम सिंह ने प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि उन्होंने स्वयं जम्मू-कश्मीर में एक छात्र के रूप में वर्षों तक जेल व पुलिस अत्याचार का अनुभव किया है। यहां तक कि एक विधायक के रूप में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लॉ में स्नातक किया।

उन्होंने प्रधानमंत्री से सभी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाली राष्ट्रीय एकता परिषद का जल्द से जल्द पुनर्गठन करने का आग्रह किया, क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन व पुनर्गठन नहीं किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि राष्ट्रीय एकता परिषद की स्थापना 1963 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने की थी, जिसमें सभी मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों सहित समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीविओ, विचारकों व वैज्ञानिकों को राष्ट्रीय एकता परिषद में एकसाथ बैठने का मौका दिया गया, जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से समाज के जनमत का आकलन करने के लिए प्रधानमंत्री व सरकार की मदद करते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के सभी वर्गों में संस्कृति, राष्ट्रीय एकीकरण और एकजुटता को बढ़ावा देने के लिए धर्मनिरपेक्षता ही एकमात्र रास्ता है कि स्पष्ट संदेश के साथ राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलाने की प्रधानमंत्री से अपील की। उन्होंने 5 जनवरी, 2020 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाखिल होने वाले बाहर के  लोगों की पहचान के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की भी मांग।

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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