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एक ध्रुवीय पूंजीवादी वर्चस्व पर जनतांत्रिक जीत है किसान आंदोलन!

Peasant movement is a democratic victory over polar capitalist domination. – Manjul Bhardwaj

1990 के दशक में दो ध्रुवीय विश्व और गुटनिरपेक्ष व्यवस्था को रौंद कर पूंजीवादी व्यवस्था ने पूरे विश्व में अपना एकछत्र वर्चस्व कायम किया. सबसे बड़ी त्रासदी है ‘मार्क्सवाद’ के नाम पर चीन में पूंजीवाद का तानाशाही राज (The dictatorial rule of capitalism in China) जिसने ‘जनता’ होने की संकल्पना को खत्म कर केवल ‘गुलाम’ होने वाली भीड़ को खड़ा किया है. कितना भयावह मंज़र है यह कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में ‘जनता’ नहीं गुलाम रहते हैं जिन्हें सत्ता से किसी भी प्रकार की असहमति का अधिकार नहीं है और सत्ताधीश को मृत्यु तक सत्ता पर बैठने का माओवादी अख्तियार है.

पूंजीवाद ने राज्य को पूंजीपतियों’ की लूट का रखवाला बना दिया

पूंजीवाद ने वर्ल्डबैंक और IMF के जरिये विकास का रायता फैलाकर पूरे विश्व को अपना कर्ज़दार बना दिया. राज्य को प्रजा कल्याण के एजेंडे से बेदख़ल कर ‘पूंजीपतियों’ की लूट का रखवाला (Guardian of the plunder of the ‘capitalists’) बना दिया. पूरे विश्व में ‘लोकतंत्र’ एक जुमला बना गया. ‘लोकतंत्र’ पूंजीवाद के शोषण का नया हथियार बन गया.

औद्योगिक क्रांति ने दुनिया में सामन्तवाद को चुनौती दी और समाजवादी अवधारणा को सत्ता का केंद्र बनाया. दो विश्व युद्धों के बाद चंद लोगों के कब्ज़े में रही पूंजी पर आम जन का अधिकार होने लगा. किन्तु पूंजीवाद ने धीरे-धीरे सेंसेक्स इकॉनमी को तरजीह देते हुए पुन: विश्व की पूंजी पर ‘भूमंडलीकरण’ के जरिये कब्ज़ा कर लिया.

विश्व के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र भारत और अमेरिका पर ‘भूमंडलीकरण’ के दौर में कट्टर दक्षिणपंथियों ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. अमेरिका के वाइट हाउस पर कट्टर दक्षिणपंथियों के हमले को पूरे विश्व को दहला दिया. अमेरिका में सत्ता परिवर्तन हुआ पर पूंजीवादी लूट मुसलसल जारी है. पर भारत में अभी भी दक्षिण पंथियों का सत्ता पर कब्ज़ा है.

‘Globalization’ has forced over 5.5 lakh farmers to commit suicide in India

‘भूमंडलीकरण’ ने भारत में 5.5 लाख से ज्यादा किसानों को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया या यूँ कहें कि भारत सरकार ने ‘भूमंडलीकरण’ के हथियार से 5.5 लाख से ज्यादा किसानों को मौत के घाट उतार दिया. भारत में किसान चुप रहा, सिसकता रहा और मरता रहा. सरकारें बदलती रहीं, किसानों का कर्ज़ा माफ़ करने का स्वांग रचती रहीं पर किसान की हालत नहीं बदली.

2014 में ‘विकास’ का अवतार लिए एक तानाशाह भारत की सत्ता पर काबिज़ हुआ. उसने अपनी तानाशाही से भारत की अर्थव्यस्था को तबाह कर दिया, देश में युवा बेरोज़गारों को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया. देश की सारी सम्पदा को दो पूंजीपतियों के नाम कर अपना तानाशाही वर्चस्ववाद कायम कर भारतीय संसद की वैधानिकता को खत्म कर दिया. महामारी में देश को श्मशान और कब्रिस्तान बना दिया. रातों रात तानाशाह ने तीन काले कृषि कानूनों को लागू कर किसानों से उनकी ज़मीन हड़पने का फ़रमान सुना दिया. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को देश की ज़मीन बेचने के मकसद से लाए गए इन कानूनों ने देश के किसानों को लामबंद कर दिया.

आस्था के नाम पर अंधश्रद्धा पट्टी बाँध छद्म राष्ट्रवाद के चक्रव्यूह में फंसा, धर्म, जात पात में बंटा किसान इन काले कानूनों के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया. तानाशाह के वर्चस्व को चुनौती दी. 378 दिनों तक ठंड, बरसात, गर्मी की मार सहते हुए किसानों ने राजधानी दिल्ली को घेर कर ‘तानाशाह’ को घुटनों पर ला दिया. दिखावे के लिए ही सही तानाशाह ने किसानों से माफ़ी मांगते हुए तीन काले कृषि कानूनों को रद्द कर दिया. इस अहिंसात्मक सत्याग्रह में 700 से ज्यादा किसान शहीद हुए.

किसान आंदोलन की सबसे बड़ी कामयाबी क्या है?

इस सत्याग्रह में भारत की बेटियों ने कंधे से कंधा मिला कर अपने किसान होने का गौरव हासिल किया. पितृसत्तात्मक समाज में अपनी पहचान के लिए संघर्षरत भारितीय बेटियों ने अपने अदृश्य किसान रूप को पूरे भारतीय जनमानस पर उजागर कर दिया. किसान आंदोलन की यह बहुत बड़ी कामयाबी है.

भारतीय किसान आंदोलन ने पूरे विश्व में पूंजी के वर्चस्ववाद को चुनौती देकर जनसरोकारों का बिगुल बजा दिया है. अहिंसात्मक सत्याग्रह आज भी दुनिया में जनतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष का कारगर तरीका है, को साबित करते हुए ‘गाँधी’ के होने का अर्थ पूरी दुनिया को समझा दिया!

–    मंजुल भारद्वाज

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