म.प्र. में अस्थिर सरकारों का दौर : एक सामंत का चारणगान

Period of unstable governments in M.P.

गत दिनों म.प. में एक अंतराल के बाद भाजपा सरकार के पुनरागमन के सौ दिन पूरे होने के उपलक्ष्य में एक सभा आयोजित की गयी। यह सभा सौ दिन से प्रतीक्षित मंत्रिमण्डल विस्तार के दूसरे दिन ही आयोजित की गयी जिसमें ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने प्रमुख वक्ता की तरह भाषण दिया।

उल्लेखनीय है कि पूरे देश की तरह मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस गुटों में विभक्त है और विधानसभा व लोकसभा चुनाव में कमलनाथ, ज्योतिरादित्य व दिग्विजय सिंह के गुटों ने एकजुट होने के दिखावे के साथ चुनावों में भाग लिया था। दिग्विजय सिंह ने अपनी राजनीतिक सूझ बूझ से प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए कमलनाथ के नाम पर सहमति दे दी, व स्वयं अपने अनुभवों व सम्बन्धों का लाभ नेपथ्य में रह कर देने लगे। विरोधियों ने आरोप तो यह भी लगाया कि वे परदे के पीछे रह कर सरकार चला रहे हैं। ज्योतिरादित्य ने समझौते में अपने क्षेत्र के अनेक लोगों को विधानसभा का टिकिट दिलवाया जिनमें से अनेक जीत भी गये और उचित संख्या में मंत्री भी बनाये गये। ऐसे सब लोग सिन्धिया परिवार के बफादार थे। कठिन समय में भी जिस सीट से सिन्धिया परिवार के लोग लगातार जीतते रहे थे उस सीट से गत लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य अपने ही एक समर्थक से हार गये। इसे उन्होंने काँग्रेस के दूसरे गुटों का षड़यंत्र माना और एक आखिरी कोशिश के रूप में राज्यसभा के लिए प्रयास किया, पर काँग्रेस के सदस्यों की जितनी संख्या थी, उतने में केवल एक सदस्य ही जीत सकता था, जिस पर दिग्विजय सिंह की हर तरह से उचित दावेदारी थी।

अतः अपनी राजनीतिक हैसियत को बचाने के लिए ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने आखिरी दाँव खेला। उन्होंने अपने समर्थक विधायकों से त्यागपत्र दिलवा दिया, जिससे कमलनाथ की सीमांत समर्थन वाली सरकार अल्पमत में आ गयी। निर्दलीय व अन्य छोटे दलों के साथ सौदेबाजी करके भाजपा ने सरकार बना ली। सिन्धिया समेत सभी त्यागपत्र दिये विधायकों ने भाजपा की सदस्यता ले ली और ज्योतिरादित्य भाजपा के टिकिट पर राज्यसभा में पहुंच गये। अगली चुनौती त्यागपत्र दिये हुए व खाली सीटों पर होने वाले उपचुनावों की थी, जिसका गणित बैठाने के लिए मंत्रिमण्डल का विस्तार रोके रखा गया। जब उपचुनाव सिर पर ही आ गये तब विस्तार किया गया जिसमें वादे के अनुसार काँग्रेस से त्यागपत्र देकर आये सिन्धिया समर्थकों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया जिनमें से अधिकतर चम्बल क्षेत्र के थे।

वैसे काँग्रेस के पक्ष में कोई स्पष्ट माहौल तो नहीं है किंतु सिन्धिया की बफादारी में इनका पाला बदल कर भाजपा में जाना ना तो क्षेत्र के कांग्रेस के परम्परागत वोटरों को हजम होगा और ना ही अपने ऊपर वरीयता दिये जाने के कारण भाजपा के परम्परागत वोटरों को हजम होगा। सरकार और मंत्री पद की चाशनी ही एक मात्र आकर्षण हो सकता है।

उपरोक्त सौ दिन वाले आयोजन के अवसर पर ज्योतिरादित्य सिन्धिया का भाषण उत्कृष्ट चापलूसी का निकृष्टतम उदाहरण था। स्मरणीय है कि श्री सिन्धिया काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में प्रमुख नेता राहुल गाँधी के हम उम्र और निजी मित्रों में थे। लोकसभा की चुनिन्दा बहसों में श्री गाँधी ने उन्हें महत्वपूर्ण वक्तव्य देने का अवसर दिया था। वे काँग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे।

उल्लेखनीय है कि जब एक दिन अचानक लोकसभा में राहुल गाँधी ने नरेन्द्र मोदी को गले लगा लिया था व उसके बाद ज्योतिरादित्य सिन्धिया की ओर देख कर ही आँख मार कर संकेत दिया था कि यह दोनों की योजना थी। उपरोक्त भाषण उनके अभी तक के भाषणों के ठीक विपरीत था और किसी सामंत के चारण गान जैसा था। सीधा प्रसारण बता रहा था कि वह भाषण भाजपा के कार्य परिषद के सदस्यों को भी बचकाना व अविश्वसनीय लग रहा था और पच नहीं पा रहा था।

गत पन्द्रह वर्षों तक भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकारें रही थीं भले ही शुरू में उन्हें दो मुख्यमंत्री बदलना पड़े हों किंतु स्थिरिता पर फर्क नहीं पड़ा। अब ऐसी स्थिति नहीं है।

मध्य प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवीय है और 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद दोनों दलों को पूर्ण बहुमत नहीं था व निर्दलीय बसपा, सपा, आदि से समर्थन लेने के बाद ही सरकार बन सकती थी। यह समर्थन हथियाने में काँग्रेस ने बाजी मार ली और भाजपा पीछे रह गयी।

इन पन्द्रह सालों में भाजपा ने अपनी एकता के खोल में कई टकराव देखे किंतु वे सतह पर प्रभाव नहीं दिखा सके। 2003 में उमा भारती को इसलिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था क्योंकि भाजपा को जीतने की उम्मीद नहीं थी व उसके पास दिग्विजय सिंह की टक्कर का कोई उम्मीदवार नहीं था। संयोग से काँग्रेस हार गयी और भाजपा ने अप्रत्याशित मुख्यमंत्री उमा भारती पर नियंत्रण लगा कर उन्हें संचालित करना चाहा जिसके खिलाफ कुछ समय बाद उन्होंने विद्रोह कर दिया। संयोग से एक प्रकरण में घोषित सजा के बहाने उन्हें बाहर करने का मौका मिल गया।

उस समय भी अरुण जैटली के साथ शिवराज सिंह चौहान को शपथ लेने के लिए दिल्ली से भेजा गया था किंतु उमा भारती ने उन्हें पदभार ट्रांसफर करने से इंकार करते हुए अपनी पसन्द के सीधे सरल महत्वाकांक्षा न पालने वाले बाबूलाल गौर को पद दिया ताकि मौका आने के बाद वे पद खाली कर दें। जल्दी ही ऐसा मौका भी आ गया किंतु भाजपा ने यह कह कर रोक दिया कि इतनी जल्दी जल्दी मुख्यमंत्री नहीं बदले जाते। बाद में उनकी तिरंगा यात्रा, के बाद पार्टी छोड़ने और दूसरा दल बनाने का दौर चला। शिवराज नामित कर दिये गये थे। 2008 के चुनावों में उन्होंने अलग दल से चुनाव लड़ कर भाजपा को नुकसान पहुंचाया। पर अन्दर से चतुर शिवराज ने उन्हें न केवल पराजित कराया अपितु जब उन्होंने वापिस आना चाहा तो दो तीन साल तक उनकी वापिसी को रोके रहे। वापिस भी इसी शर्त पर होने दिया कि वे मध्य प्रदेश में प्रवेश नहीं करेंगी। उन्हें उत्तर प्रदेश से विधायक का चुनाव लड़वाया गया और उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी घोषित किया गया क्योंकि पार्टी को सरकार बना लेने की उम्मीद नहीं थी।

हुआ भी ऐसा ही, वे शपथ ग्रहण के बाद दुबारा उत्तर प्रदेश विधान सभा में नहीं गयीं। बाद में 2014 में लोकसभा चुनाव भी उन्हें उ.प्र. से लड़वाया गया। इस बीच में उनके पक्षधर नेताओं को राजनीतिक रूप से निर्मूल कर दिया गया जब तक कि वे शिवराज के आगे समर्पित नहीं हो गये। इस मंत्रिमण्डल विस्तार के बाद भी उमा भारती ने अपना असंतोष व्यक्त किया था कि उनके समर्थकों को उचित स्थान नहीं मिला।

शिवराज ने अपने कार्यकाल के दौरान अपने सारे विरोधियों को बहुत कुशलता से बाहर करवा दिया।

कैलाश विजयवर्गीय को संगठन में पदोन्नति के बहाने, प्रभात झा और अरविन्द मेनन आदि को कार्यकाल पूरा होने के बहाने दूर कर दिया। अब तक वे सर्वे सर्वा बने रहे, किंतु अब उन्हें उन सिन्धिया की चुनौती झेलना पड़ेगी जिनमें बाल हठ जैसा राजहठ है। सरकार उन की इच्छा पर ही टिकी है क्योंकि जो विधायक उनके कहने पर त्यागपत्र दे सकते हैं वे उन्हीं के आदेश का पालन करेंगे। भाजपा ने सरकार बनाने और मंत्रिमण्डल विस्तार में तो झुक कर समझौता कर लिया किंतु एक सीमा से अधिक वह समझौता नहीं कर सकेगी। अगर इन विधायकों में एक सुनिश्चित संख्या हार जाती है तो भी सरकार बदलेगी।

संसाधनों की बहुलता के कारण खरीद फरोख्त में कोई दल पीछे नहीं है। इसलिए अस्थिर सरकारों का दौर शुरू हो सकता है। जिस तरह की राजनीतिक जोड़ तोड़ चल रही है उसमें सोशल डिस्टेंस, मास्क आदि के प्रति कोई सावधान नहीं दिख रहा है।

वीरेन्द्र जैन

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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