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पीएम मोदी भाजपा के गोर्बाचोव हैं! लोकतंत्र स्थगित हो गया है

PM Modi is BJP’s Gorbachov! Democracy has been suspended

भाजपा आरएसएस ने संसद पर कब्जा जमा लिया है। यह टिपिकल इलाका दखल की बांग्ला शैली है। इलाका दखल का एक ही उत्तर है जनता के सक्रिय आक्रोशमय एक्शन। बंगाल में जन एक्शन से माकपा साफ हो गई सभी इलाकों से। इंतजार करो बाकी देश में भाजपा के खिलाफ जन कार्रवाई होगी। किसान आंदोलन और नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलन आदि शुरुआत हैं। भाजपा खोजने से भी नहीं मिलेगी, ठीक वैसे ही जैसे सोवियत संघ से कम्युनिस्ट पार्टी गायब हो गई। सिंगूर- नंदीग्राम जैसी गलती करके बंगाल से माकपा गायब हो गई।

There is no communication with farmers. There is no communication in Parliament. Why?

किसानों से संवाद नहीं हो रहा। संसद में संवाद नहीं हो रहा। क्यों ? कभी सोचकर देखो, संसद क्या पहले भी ऐसी थी जैसी आज है ?

एक फर्क है पहले सरकारी प्रस्ताव पर बहस होती थी विचार एकत्र करने और फिर संसदीय प्रवर समिति हर पंक्ति पर संवैधानिक दृष्टि से विचार करके संसद में प्रस्ताव रखती थी उसमें बहुत कुछ सरकारी राय बदल जाती थी। लेकिन मोदी सरकार संसद में अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए संसद का इस्तेमाल कर रही है। वह नए विचार न तो सुनना चाहती और न किसी प्रस्ताव को प्रवर समिति के पास भेजकर ठंडे दिमाग से विचार कर रही है। उसे अपना एजेंडा थोपने की जल्दी है।

Parliamentary Select Committee is the deathblow of Parliament, Modi government has crippled it.

याद करो नोटबंदी, जीएसटी, 370, किसान कानून आदि किसी भी बिल को प्रवर समिति के पास नहीं भेजा गया। संसदीय प्रवर समिति संसद की प्राणवायु है, मोदी सरकार उसे अपंग बना चुकी है। पीएम -गृहमंत्री गलत भाषा बोल रहे हैं। यह भाषा संविधान का अपमान है। भाषा जब असभ्य हो जाय तो समझो लोकतंत्र स्थगित हो गया है।

फ़ासिज़्म को कभी राजनीतिक कार्यक्रम बनाकर परास्त नहीं कर सकते। उसे सिर्फ जनता की धुलाई ही साफ कर सकती है।

अब तक आप आधार कार्ड और केवाइसी के प्रपंच में फंसे थे, अब नागरिक कार्ड बनवाने की संभावित मैराथन दौड़ में लगो। किसान अपनी जमीन और फसल बचाने के लिए दौड़ता रहे। भूल जाओ देश, सरकार, रोजगार, न्यायालय और महंगाई आदि को भूल जाओ। मोदी कानूनों के खिलाफ जंग परंपरागत ढंग से संभव नहीं है। अब भाजपा के नेताओं के खिलाफ मास एक्शन हों तब ही स्थिति बदलेगी।

जनता के लिए दिए गए भाषणों और मीडिया के लिए उछाले भाषणों में अंतर नहीं जानते मोदी-शाह! लेकिन अब यह अंतर जनता जान गयी है!

आर्थिक तौर पर हरेक परिवार, हरेक दुकानदार, व्यापारी,लघु उद्योगपति और किसान-मजदूरों को मोदी सरकार की नीतियों ने तबाह किया है, इस तबाही की अनुभूति जितनी बढ़ेगी, मोदी-अमित शाह-आरएसएस के खिलाफ जनता का गुस्सा उतना ही बढ़ेगा।

इसी तरह शिक्षा को देखें। कॉलेज-विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में वैचारिक और दलीय हस्तक्षेप पुरानी बीमारी है। कांग्रेस ने इसे सर्दी ज़ुकाम की तरह इस्तेमाल किया, वहीं वाम ने कैंसर की तरह और आरएसएस ने एड्स की तरह! इन लोगों ने शिक्षा संस्थानों को इस कदर प्रदूषित किया है कि शिक्षा का समूचा ढांचा चरमरा गया है। अब हमारे विश्वविद्यालयों के छात्र, प्रशासक के तौर पर संघ के बंदरों से मन बहलाएंगे। बंदरों के अंदर गुण खोजना वैसे भी बेवकूफी है। बंदर तो बंदर होता है, संघी तो संघी होता। मोदीयुगीन बंदर का ज्ञान-विज्ञान-योग्यता-क्षमता-विवेक से कोई संबंध नहीं होता। उसे बस गजेन्द्र चौहान होना चाहिए!

मोदीजी अकेले पीएम हैं जो खुल्लमखुल्ला अमीरों के साथ अपने फोटो खिंचवाने में मजे लेते हैं! लोकतंत्र में रसातल के महत्व को स्थापित करने में आरएसएस-मोदीजी ने आदर्श मानक बनाए हैं। मोदीजी के लिए “माफी”, और “विनम्रता”, आदि पदबंध गैर जरूरी हैं।

नरेन्द्र मोदीजी सुंदर विज्ञापन मॉडल हैं ! सवाल यह है यदि विज्ञापन ही करने थे तो पीएम बनने के लिए इतना कष्ट क्यों किया ! अपने कर्म से विज्ञापन मॉडल और पीएम का अंतर आपने खत्म करके प्रधानमंत्री पद की महत्ता का अंत कर दिया है!

The end of the post of Prime Minister is the biggest tragedy of the 21st century!

प्रधानमंत्री के पद का अंत २१वीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है ! प्रधानमंत्री पद की गरिमा और लोकतांत्रिक भूमिका को नष्ट करके एक पुराने किस्म के धार्मिक प्रचारक को विज्ञापन की आड़ में जन्म दिया है। उनकी भाषणकला की भाषा में धार्मिक प्रचारक और विज्ञापन की “सेल सेल” शैली का विलक्षण मिश्रण है। इसी तरह राजनीति को घर -घर जाकर की जाने वाली मार्केटिंग बना दिया। मोदी को देश हमेशा प्रधानमंत्री के पद की गरिमा का अंत करने के लिए याद करेगा।

मोदी सरकार ने विदेशनीति के साथ गंगा को जोड़कर विदेशनीति और धर्म का रिश्ता बनाकर सबसे खतरनाक काम किया है, विश्व में कितने देश हैं जो धर्म से विदेशनीति जोड़ते हैं?

यदि कोई मुस्लिम देश का शासक हमारे यहां आए और जामा मसजिद में जाकर नमाज पढे और साथ में हमारे पीएम से नमाज पढ़ने को कहे तो कैसा रहेगा ? कूटनीति में धर्म को जोड़कर सबसे घटिया काम किया है मोदी सरकार ने। यह भारत की कूटनीतिक परंपरा को मध्यकाल से जोड़ने की कोशिश है।

विकास अपने आपमें कोई उद्देश्य और प्रेरक तत्व नहीं है, सवाल यह है विकास को किस नजरिए से देखते हैं, उसके लिए किस तरह के दार्शनिक मॉडल का अनुकरण करते हैं और विकास के केन्द्र में कौन लोग हैं ?

मोदी एंड कंपनी की मुश्किल (Modi & Company’s difficulty) यह है कि उसे इन सब धारणाओं से कोई मतलब नहीं है, उसने तो विकास शब्द को रामनाम सत्य की तरह जनप्रिय बना दिया है। हमारे लाखों युवा विकास के नारे से प्रभावित हैं, रात-दिन विकासधुन गा रहे हैं, लेकिन विकास की उनके पास कोई सारवान स्थिति या अवस्था अभी तक नहीं पहुँची है, ऐसे में उनका दुखी होना, अवसादग्रस्त होना स्वाभाविक है।

किसी भी नारे को उसके विचारधारात्मक परिप्रेक्ष्य में ही समझें, सिर्फ मीडिया उन्माद में न बहें, मोदी ने विकास के नाम पर जो मीडिया उन्माद पैदा किया है वह आम जनता के दवाबों से धीरे-धीरे गायब हो रहा है। आने वाले समय में और भी गंभीर चुनौतियां आने वाली हैं हम सबको मिलकर इनका सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। खासकर युवाओं को बहुत बड़ी भूमिका निभानी है, उनको मौजूदा दौर में अपना लोकतांत्रिक हस्तक्षेप बढ़ाना चाहिए। वही हम सबको मोदी के तुगलकी शासन से निजात दिलाने में मदद करेगा।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

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