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ट्विटर की बांहें क्यों मरोड़ रही है मोदी सरकार!

Why is the Modi government twisting the arms of Twitter!

किसी को अगर अब भी इसमें संदेह रहा होगा कि कोरोना की दूसरी लहर की भयावहता के बीच भी प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को सबसे ज्यादा अपनी छवि को बचाने की ही चिंता है, तो ऐसा हरेक संदेह ट्विटर इंडिया के दफ्तरों पर छापे के ताजातरीन प्रकरण से दूर हो जाना चाहिए। कथित रूप से मोदी और उनकी सरकार की छवि बिगाड़ने के तथाकथित कांग्रेसी ‘‘टूल किट’’ प्रकरण को लेकर, सीधे अमित शाह के मंत्रालय के आधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने, सोमवार 24 मई को छापा मारने की कोशिश की। मोदी सरकार और अमित शाह के नेतृत्व में उसके गृहमंत्रालय की लोकख्यात अकुशलता का ही जैसे खुले आम प्रदर्शन करते हुए, भीमकाय बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनी के दफ्तरों पर यह छापामारी, सरकार की हंसी उड़वाने में ही कामयाब रही क्योंकि मीडिया चैनलों को आमंत्रित कर जब दिल्ली पुलिस की टीमें छापामारी के लिए पहुंचीं, तो गुडगांव में उन्हें ट्विटर इंडिया का दफ्तर ही नहीं मिला, जबकि दिल्ली का दफ्तर बंद मिला क्योंकि ट्विटर इंडिया के सभी कर्मचारी कोविड-19 के चलते पिछले एक साल से ‘‘वर्क फ्रॉम होम’’ ही कर रहे हैं!

इस छापे के पीछे काफी साफ दिखाई देती मोदी सरकार की धमकी अपनी जगह, वर्ना पूरे ताम-झाम से की गयी सरकार की ताकत दिखाने की यह कार्रवाई तो, ट्विटर इंडिया के दिल्ली कार्यालय के चौकीदार को नोटिस पकड़ाए जाने का प्रहसन ही बनकर रह गयी है!

अचरज नहीं कि मीडिया में व्यापक रूप से यह सवाल पूछा जा रहा है कि अगर यही करना था तो क्या यह काम, एक ई-मेल भेजकर ही बेहतर तरीके से नहीं हो सकता था!

ट्विटर इंडिया पर छापे की यह कार्रवाई जितनी डराने वाली है, उतनी ही बेतुकी भी।

याद रहे कि हाल के दौर में सरकार के सारे मीडिया मैनेजमेंट के बावजूद, कोविड-19 की दूसरी लहर के सरकार के कुप्रबंधन और अस्पताल के बैड/आइसीयू से लेकर, ऑक्सीजन, रेमडेसिविर जैसी दवाओं, एंबुलेंस आदि की कमी के चलते, बेहिसाब मौतों और श्मशानों-कब्रिस्तानों में मुर्दों की लंबी कतारों तथा गंगा समेत देश की प्रमुख नदियों में बहायी गयी सैकड़ों कोरोना से मरने वालों की लाशों की खबरें छायी रही हैं। इसके ऊपर से दुनिया के सबसे ज्यादा टीके बनाने वाले देश में, कोविड-19 के टीके का उत्पादन होने के बावजूद, अपनी जनता के लिए टीके की भारी तंगी तथा कुंभ से लेकर कई राज्यों के विधानसभाई चुनाव से लेकर उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव तक, सुपर स्पे्रडर आयोजन कराने/ होने देने के मुद्दे छाये रहे हैं।

इस सब के सिलसिले में अप्रैल के आखिरी तथा मई के पहले हफ्तों में, देश-विदेश में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की तीखी आलोचनाओं का ज्वार जैसा आया हुआ था।

इसी पृष्ठभूमि में अचानक, भाजपा के प्रमुख प्रवक्ता संवित पात्रा ने ट्विटर पर प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस, के एक ‘‘टूल किट’’ का भंडाफोड़ करने का दावा किया, जो महामारी के संदर्भ में मोदी की छवि खराब करने और उनके सेंट्रल विस्टा प्रोजैक्ट को बदनाम करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था!

और जैसे पहले से तय स्क्रिप्ट के अनुसार, भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने और सोशल मीडिया पर संघ-भाजपा की ट्रोल सेना ने, विपक्ष के खिलाफ भीषण हमला बोल दिया। मोदी और उनकी सरकार की करनियों और अकरनियों की आलोचनाओं के खिलाफ, कथाकथित ‘‘टूल किट’’ के नाम पर यह हमला, इसी साल के शुरू में किसान आंदोलन के खिलाफ ‘‘टूल किट’’ के ऐसे ही बहाने से छेड़े गए प्रचार हमले की ही याद दिलाता था। उसी हमले के हिस्से के तौर पर दिशा रवि समेत किसान आंदोलन के कई समर्थकों को शासन के दमनचक्र का निशाना भी बनाया गया था।

जो संघ-भाजपा जोड़ी अब तक, ऑक्सीजन से लेकर अस्पतालों में बैड तथा टीकों तक की भारी कमी को नकारने में ही लगी रही थी, इस हमले के जरिए अब, इन मुद्दों को लेकर मोदी और उनकी सरकार की आलोचनाओं को ही राजनीति प्रेरित या प्रायोजित करार देकर, खारिज करने की हमलावर जंग छेड़ रही थी। जाहिर है कि वह यह मानकर चल रही थी कि मीडिया पर उसके जबर्दस्त नियंत्रण के चलते, कोई भी उससे पलटकर यह नहीं पूछेगा कि कोई विपक्षी पार्टी उसकी सरकार और उसके नेता की विफलता की आलोचनाओं को संयोजित करने का टूल किट बना/ प्रयोग कर भी रही है, तो इसमें क्या गलत है? क्या विपक्ष का कर्तव्य सरकार की कमियों की आलोचना कर के उसे अपनी गलतियां दुरुस्त करने के लिए मजबूर करना ही नहीं है?

 क्या विपक्ष का काम साहेब का विरुद गान करना है!

बहरहाल, इस पूरे मामले ने तब और ही रूप ले लिया, जब कांग्रेस पार्टी ने भाजपा प्रवक्ता तथा अन्य नेताओं पर, ‘‘फर्जी टूल किट’’ बनाकर अपने मत्थे मंढने का आरोप लगाया।

कांग्रेस यह आरोप लगाने पर ही नहीं रुक गयी, उसने आगे बढक़र संबंधित नेताओं में से कुछ के खिलाफ फर्जीवाड़ा करने की शिकायत भी दर्ज करायी, जिसने छत्तीसगढ़ समेत कुछ कांग्रेस-शासित राज्यों में एफआइआर दर्ज किए जाने का भी रूप ले लिया। बाद में, कांग्रेस पार्टी द्वारा इस सिलसिले में सार्वजनिक रूप से रखे गए साक्ष्यों की जांच-पड़ताल करने के बाद, पहले सोशल मीडिया में आल्ट न्यूज जैसे प्रतिष्ठित स्वतंत्र फैक्ट-चैक प्रतिष्ठानों ने कथित ‘‘टूल किट’’ में हेरा-फेरी की पुष्टि की और अंतत: ट्विटर ने अपनी ही फैक्ट-चैक व्यवस्थाओं से निकली जानकारी के आधार पर, भाजपा प्रवक्ता के तथा कुछ अन्य भाजपा नेताओं के भी, उक्त टूल किट संबंधी दावों पर ‘‘मैनिपुलेटेड मीडिया’’ यानी फर्जीवाड़ा का ठप्पा लगा दिया।

किसी भी अन्य राजनीतिक पार्टी ने इसके बाद, चुपचाप अपने पांव पीछे खींच लिए होते। लेकिन, हमारे देश में सत्ता में बैठी भाजपा को ऐसा करना कहां मंजूर होता! उसने वही किया जो कोई तानाशाही की आकांक्षा रखने वाली पार्टी ही कर सकती है। उसने ट्विटर को ही धमकाने का रास्ता अपनाया। इलैक्ट्रोनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने, फौरन ट्विटर को चिट्ठी लिखकर निर्देश दिया कि सत्ता पार्टी के लोगों से जुड़े उक्त ट्वीटों से ‘‘मैनिपुलेटेड मीडिया’’ का ठप्पा हटाया जाए। दलील यह दी गयी कि ट्विटर ने बिना जांच के ही सत्तापक्ष से जुड़े लोगों के ट्वीटों पर उक्त ठप्पा लगा दिया था और जब तक संबंधित सामग्री पर आरोपों के विवाद का निपटारा नहीं हो जाता है, ट्विटर को अपनी ओर से ऐसा कोई निर्णय सुनाने का अधिकार नहीं है!

और जब इसके बाद भी ट्विटर ने उनकी इच्छा पूरी करने की तत्परता नहीं दिखाई, तो सीधे अमित शाह के अंतर्गत आने वाली दिल्ली पुलिस, छापे की कार्रवाई के लिए मैदान में कूद पड़ी।

शाह की पुलिस की इस कार्रवाई के बेतुकेपन का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस मामले में शिकायतकर्ता कांग्रेस थी और उसकी फर्जीवाड़े की शिकायत भाजपा प्रवक्ता व कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ थी। यह शिकायत, पुलिस से भी की गयी थी और ट्विटर से भी।

ट्विटर ने अपनी ही प्रक्रियाओं के जरिए, उक्त शिकायत में कुछ तथ्य पाकर, उक्त ट्वीटों पर ‘‘मैनिपुलेटेड मीडिया’’ का ठप्पा लगाया था। बहरहाल, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के दबाव डालकर उक्त ठप्पा हटवाने में नाकाम होने के बाद, शाह की पुलिस ने उसी शिकायत के सिलसिले में छानबीन की शुरूआत की, तो सीधे ट्विटर इंडिया के कार्यालय पर छापे से और वह भी यह पता लगाने के लिए कि उसके पास ऐसे कौन से साक्ष्य हैं, जिनके आधार पर उसने उक्त ठप्पा लगया था। न आरोप लगाने वाले से पूछा, न आरोपित से, सीधे उस सोशल मीडिया मंच से पूछताछ करने पहुंच गए, जिसे आरोप में कोई तत्व नजर आया था!

कहने की जरूरत नहीं है कि यह, इस अत्यंत प्रभावशाली विश्व सोशल मीडिया मंच को धोंस में लेने की मोदी सरकार की कोशिशों का ही हिस्सा है।

इस सिलसिले में यह याद दिलाना अप्रासांगिक नहीं होगा कि अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान और खासतौर पर राष्ट्रपति चुनाव के बाद व जनवरी संकट के दौरान, ट्विटर ने एकाधिक बार, तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति के ट्वीटों पर अप्रामाणिक जैसे लेबल लगाए थे और अंतत: निवर्तमान राष्ट्रपति का एकाउंट बंद ही कर दिया था। लेकिन, ट्रम्प का प्रशासन ट्विटर के खिलाफ, मोदी सरकार की जैसी किसी कार्रवाई की बात तो सोच भी नहीं सकता था।

फिर भी यह एक कार्रवाई का ही मामला नहीं है।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में और खासतौर पर किसान आंदोलन को सोशल मीडिया पर व्यापक सहानुभूति हासिल होने के बाद से मोदी सरकार, जोकि सोशल मीडिया समेत समूचे मीडिया में आम तौर पर इकतरफा तथा प्रश्नहीन समर्थन मिलने की आदी रही है, सोशल मीडिया पर अपना प्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ाने में लगी हुई है।

फरवरी-मार्च के महीनों में किसान आंदोलन के ही समर्थन के ट्वीटों को लेकर, सरकार और ट्विटर के बीच काफी खींचतान भी चली थी, हालांकि सरकार आखिरकार दर्जनों एकाउंट बंद कराने में और सैकड़ों ट्वीट भारतीय पाठकों/ दर्शकों के लिए अदृश्य कराने में कामयाब भी हो गयी थी। इस सब ने, सोशल मीडिया को और मुकम्मल तौर पर सरकार के अंगूठे के नीचे लाने की मोदी सरकार की उन कोशिशों को और तेज कर दिया, जिनकी शुरूआत पिछले साल के मध्य में फेसबुक के संघ-भाजपा से जुड़े खातों के साथ खुल्लमखुल्ला पक्षपात किए जाने के रहस्योद्घाटनों पर, जवाबी कार्रवाई के तौर पर हुई थी।

इसी के हिस्से के तौर पर सरकार ने फरवरी में सोशल मीडिया इंटरमीडियरी नियम अधिसूचित किए थे, जिनके पालन के लिए 26 मई तक का समय दिया गया था। यह एक और मुद्दा है जिस पर सरकार और सोशल मीडिया मंचों के बीच खींच-तान रहने जा रही है।

एक को छोड़कर सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्मों ने नये नियमों के पालन के लिए और समय मांगा है, जिससे सरकार खुश नहीं है। असली मुद्दा यह है कि जैसे-जैसे मोदी की छवि का सम्मोहन टूट रहा है और उस छवि से छुपायी जाती रहीं जनता की बढ़ती बदहाली तथा देश व समाज में तेजी से बढ़ती आर्थिक व सामाजिक-राजनीतिक असमानता की क्रूर सचाइयां सामने आ रही हैं, वैसे-वैसे संघ-भाजपा और उनकी सरकार, परंपरागत मीडिया के बाद अब सोशल मीडिया को भी पूरी तरह से नाथने की कोशिश में लग गए हैं। उन्हें बखूबी पता है कि उनके नेता की छवि गढऩे में सोशल मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका रही थी और वे अपने सुप्रीमो की छवि को अब उसी सोशल मीडिया पर उधेड़े जाने बचाने के लिए, शब्दश: कुछ भी करने के लिए तैयार नजर आते हैं। इसके लिए प्रमुख सोशल मीडिया मंचों की स्वतंत्रता तथा तटस्थता की साख की बलि चढ़ानी पड़े तो, वे रत्तीभर नहीं हिचकेंगे। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के नये नियमों पर खींचतान के बीच से हम, इसी खेल का आगे बढ़ाया जाना देख रहे होंगे।  

0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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