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राजनीतिक दखलंदाजी और पुलिस सुधार की कवायद

Political intervention and police reform exercise By Vijay Shankar Singh, retd. IPS

2012 – 13 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने भरी अदालत में सीबीआई को एक पिजड़े का तोता कहा तो तब खूब हो हल्ला मचा। तत्कालीन सीबीआई प्रमुख से जब पत्रकारों ने पूछा कि, ” सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी पर कि सीबीआई पिंजड़े का तोता है, आप की क्या राय है,” तो, सीबीआई प्रमुख ने कहा कि अदालत ने यह बात सही कही है। इतना कह कर सीबीआई प्रमुख गाड़ी में बैठ गए।

सीबीआई प्रमुख ने जो उत्तर दिया वही उत्तर कोई भी अधिकारी होता तो, वह भी वही कहता। 2012 से लेकर 2014 तक, यूपीए – 2 का पराभव का काल था, फिर तो 2014 में यूपीए सत्ता से बाहर ही हो गयी। उस दौरान, सीएजी हर हफ्ते कोई न कोई घोटाला ढूंढ लेते थे और अन्ना हज़ारे का आंदोलन चल ही रहा था।

Demand for appointment of Lokpal to curb corruption in public life

उस समय की घटनाओं का स्मरण कीजिए तो लगता है कि देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है और पहले इस राजरोग से निदान पाना ज़रूरी है। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिये लोकपाल की नियुक्ति की मांग उठी, सीबीआई की तफतीशों में राजनीतिक दखलंदाजी रोकने की मांग तेज हुयी, और फिर इन सारी गतिविधियों का परिणाम हुआ कि 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर आ गयी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आने वाली नयी सरकार, अब चाहे जैसी लगती हो, पर तब तो एक अवतार सरीखी लगती थी।

पुलिस पर सरकार का नियंत्रण तो हो, पर पुलिस पर सरकार चलाने वाले दल का नियंत्रण न हो, यह एक बारीक पर बेहद महत्वपूर्ण बात है।

सरकार और सत्तारूढ़ दल में अंतर है। सरकार, कार्यपालिका है, वह शासन का काम देखती है, शासन की प्रमुख है। जबकि, सत्तारूढ़ दल, वह राजनीतिक दल होता है जो सरकार में रहता है। पुलिस का तालमेल, कैसे, सरकार और सत्तारूढ़ दल के बीच रहे, इसे देखना भी सरकार का ही काम है। सरकार के आधीन रहते हुए भी पुलिस सरकार से अधिक उन नियमों और प्राविधानों से निर्देशित रहती है, जिन्हें लागू करने का अधिकार, शक्तियां और दायित्व इसी संस्था को है। सरकार भी संवैधानिक कानून के अंतर्गत ही गठित है और वह भी अपना दायित्व कानून के अनुसार ही, निभाने के लिये शपथबद्ध और बाध्य है।

What should be the coordination between the government and the police

सरकार और पुलिस के बीच का तालमेल क्या हो, इसे समझने के लिये 2016 में केरल हाईकोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करना उचित होगा।

केरल के डीजीपी के रूप में सेनकुमार की नियुक्ति एलडीएफ सरकार के पहले की यूडीएफ सरकार ने की थी। जब एलडीएफ की सरकार 2016 में बनी तब, एलडीएफ की विजयन सरकार ने डीजीपी और मुख्य सचिव दोनों को बदल दिया। यह एक सामान्य प्रक्रिया है कि जब सरकार बदलती है तो शीर्ष नौकरशाही के ये दो अधिकारी ज़रूर बदलते हैं। सेनकुमार ने अपने तबादले को अदालत में चुनौती दी और वे कैट ( न्यायाधिकरण ) और हाईकोर्ट दोनों से जीते। बाद में वे सर्वोच्च न्यायालय से भी जीते।

इस लम्बे कानूनी मसले के विस्तार में न जाकर बस यह उल्लेख करना है कि अदालत ने पुलिस की स्थिति सचिवालय से अलग मानी है। सचिवालय यानी सरकार के मुख्य सचिव या अन्य सचिव सरकार के आधीन भी हैं और सरकार की नीतियों को सरकार के मतानुसार लागू करने के लिये बाध्य भी हैं। पर पुलिस, अपराध नियंत्रण, अन्वेषण और कानून व्यवस्था बनाये रखने के दौरान जिन कानूनों से निर्देशित होती है, वह उन कानूनी प्राविधानों के बाहर जाकर किसी कानून को लागू नहीं कर सकती है।

Police powers are not unlimited

यहां एक बात और स्पष्ट है कि पुलिस के अधिकार और शक्तियां असीमित नहीं हैं, बल्कि वे कानूनों से बंधे हैं। यह कानून हर उस कानून तोड़ने वाले पर भी लागू होंगे, जो सरकार में हो, या सरकार के बाहर। सरकार उन कानूनों के विपरीत काम करने के लिये, किसी पुलिस अफसर को, बाध्य भी नहीं कर सकती और वह ऐसा लिखित रूप में करती भी नहीं है।

भारत में पुलिस तंत्र औऱ आपराधिक न्याय व्यवस्था का सिस्टम औपनिवेशिक राज में बनाया गया था। तब पुलिस का प्रमुख उद्देश्य (Main objective of police), न तो अपराध रोकना था और न ही कानून व्यवस्था पर बहुत ध्यान देना था। पुलिस का प्रथम उद्देश्य था ब्रिटिश राज की जड़ जमी रहे और राज को राजस्व जो अधिकतर भू राजस्व से आता था, प्राप्त होता रहे। इसलिए पुलिस को कलेक्टर के आधीन रखा गया था।

बाद में जब जन जागरूकता बढ़ी और अंग्रेजी राज के खिलाफ लोग मुखर होने लगे तब जाकर आंदोलनों को दबाना और सरकार का इकबाल बनाये रखना प्रमुख कार्य हो गया।

पहला पुलिस सुधार आयोग कब बना ? | When was the first police reform commission formed?

अपराध तब कम भी होते थे और जमींदारों का यह भी एक दायित्व था कि वे उसे नियंत्रित करने में पुलिस की मदद करते रहें। लेकिन ब्रिटिश राज में भी यह महसूस किया गया कि, पुलिस में सुधार की ज़रूरत है और लॉर्ड कर्जन के समय पहला पुलिस सुधार आयोग बना।

कर्जन के समय, अनेक सुधार कार्यक्रम लागू भी हुए। पुलिस सुधार के अन्तर्गत कर्ज़न ने 1902 ई. में ‘सर एण्ड्रयू फ़्रेजर’ की अध्यक्षता में एक ‘पुलिस आयोग’ की स्थापना की। 1903 ई. में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में फ्रेजर आयोग ने पुलिस विभाग की आलोचना करते हुए कहा कि,

“यह विभाग पूर्णतः अक्षम, प्रशिक्षण से रहित, भ्रष्ट एवं दमनकारी है।”

आयोग द्वारा दिये गये सुझावों के आधार पर सभी स्तरों में वेतन की वृद्धि, प्रशिक्षण की व्यवस्था, प्रान्तीय पुलिस की स्थापना व केन्द्रीय गुप्तचर विभाग की स्थापना की व्यवस्था की गई।

1903 में फ्रेजर की टिप्पणी आज भी प्रासंगिक लग रही है। एक सौ सत्रह साल बाद भी, जहां तक छवि का सवाल है, हम वही हैं जहां लॉर्ड कर्जन हमें छोड़ गया था !

1903 के फ्रेजर के निष्कर्ष के बाद, 1957 में यूपी पुलिस को एक और अदालती स्ट्रिक्चर से सामना करना पड़ा, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एएन मुल्ला ने कहा कि, ‘यूपी पुलिस अपराधियों का एक संगठित गिरोह है।’ हालांकि यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील किये जाने पर विलोपित कर दी गई।

पर यह टिप्पणी भले ही कागज़ पर न हो, पर देश भर में पुलिस की आम छवि 1903 के फ्रेजर के निष्कर्ष और 1957 के जस्टिस मुल्ला की टिप्पणी से अलग, आज भी नहीं हो पायी है।

आज जब मुंबई पुलिस पर गृहमंत्री द्वारा 100 करोड़ रुपये की उगाही की बात पर हंगामा मचा हुआ है तो लगता है कि सिस्टम में तमाम सुधार की कोशिशों के बाद भी स्थिति 1903 से बहुत बदली नहीं है।

100 करोड़ की उगाही के मामले में, महाराष्ट्र सरकार ने अब जांच हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज से कराने का निर्णय किया है। अब यह देखना है कि जांच का निष्कर्ष क्या निकलता है।

मुंबई की 100 करोड़ की घटना के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि, जब गृहमंत्री इस तरह की उगाही की ‘ड्यूटी’ लगा रहे थे, और जब यह सब परमवीर सिंह को पता चल गया था, तो उन्होंने क्या इस उगाही को रोकने का कोई प्रशासनिक प्रयास किया ? या कमिश्नर के पद से हटाए जाने के बाद उनकी चिट्ठी, शांतिपर्व का प्रलाप है ?

एक सवाल यह भी, पुलिस के ही वरिष्ठ अफसरों ने उठाया है कि उन्हें ऐसे समय पर क्या करना चाहिए था।

एक डीजीपी रह चुके, आईपीएस अफसर का कहना है कि उन्हें गृहमंत्री के खिलाफ, भ्रष्टाचार के लिये उकसाने का मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही करनी चाहिये थी। पर यह कदम वैधानिक रूप से युक्तियुक्त और आदर्श कदम भले ही हो, पर मेरे अनुसार, ऐसा करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता।

होना यह चाहिए था कि वे सचिन वाज़े को एक चेतावनी देते कि, जो कुछ भी गृहमंत्री ने कहा है उससे वह बाज आएं और यदि कोई शिकायत मिलती तो, वाज़े के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करते और इन सब की सूचना मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से मिल कर दे देते। यदि गृहमंत्री के रहते उन्हें निष्ठापूर्वक कार्य करने में दिक्कत थी तो खुद ही अपने तबादले का विकल्प दे देते। पर परमवीर सिंह की अंतरात्मा जगी भी तो तब जगी जब उन्हें कमिश्नर के पद से हटा दिया गया।

The most important character in the 100 crore extortion and Antilia scandal is Police Inspector Sanchin Vaze.

100 करोड़ की उगाही और एंटीलिया कांड में सबसे महत्वपूर्ण पात्र है पुलिस इंस्पेक्टर संचिन वाज़े। यह सब बात ही खुली, एनआईए द्वारा, सचिन वाज़े की गिरफ्तारी के बाद।

वाज़े की गिरफ्तारी नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) द्वारा की गयीं है। वह अभी तक जेल में है। वाज़े ही एक स्कॉर्पियो में 20 जिलेटिन की छड़ रखने वाला संदिग्ध है, जो बाद में स्कॉर्पियो के मालिक की हत्या में संदिग्ध पाया गया है। यह स्कॉर्पियो, मुकेश अम्बानी के घर से 100 मीटर दूर खड़ी थी।

अब तक यह प्रमाणित नहीं हो पाया है कि इस घटना के निशाने पर मुकेश अम्बानी थे या कोई और दूसरी साज़िश है। फिलहाल तो एनआईए की विवेचना वाज़े के ही इर्दगिर्द घूम रही है।

सचिन वाज़े, मुंबई पुलिस के इनकाउंटर स्पेशलिस्ट की परंपरा में आने वाला एक शातिर पुलिस इंस्पेक्टर है। इनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिसिंग, सिंघम की परंपरा की पुलिसिंग है, जो लोकलुभावन तो होती है, पर पुलिस की नियमपालक छवि की दृष्टि से, खतरनाक भी समझी जाती है। कहते हैं सचिन वाज़े के खाते में 60 से अधिक इनकाउंटर के मामले हैं।

मुंबई के पुलिस कमिश्नर रह चुके और देश के सबसे सम्मानित पुलिस अफसरों में से एक जेएफ रिबेरो ने अभी हाल ही एक लेख लिख कर इनकाउंटर केंद्रित पुलिसिंग की निंदा की है।

इनकाउंटर के औचित्य और अनौचित्य से दूर हट कर बात करें तो मुम्बई पुलिस में सचिन वाज़े के पहले, इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा, और दया नायक नामक दो और ऐसे ही इनकाउंटर स्पेशलिस्ट माने जाते रहे हैं। प्रदीप शर्मा अब शिवसेना में हैं, दया नायक के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। वाज़े इसी प्रदीप शर्मा का ही शिष्य है।

वाज़े, एक अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा में संदिग्ध मृत्यु के एक मामले में निलंबित हुआ था, और उसके बाद वाज़े ने भी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और शिवसेना में शामिल हो गया। जब तक वह नौकरी से बाहर रहा, वह बैंकों और लोन देने वाली एजेंसियों के लोन वसूलने का काम करने लगा। लेकिन उसके राजनीतिक संबंध बने रहे और इसी राजनीतिक निकटता के काऱण वह पुनः नौकरी में ले लिया गया।

राजनीतिक हस्तक्षेप पुलिस में नयी बात नहीं है, बल्कि किसी महत्वपूर्ण मामले में राजनीतिक दखलंदाजी नहीं होती है तब ज़रूर एक असामान्यता नज़र आती है।

वरिष्ठ आईपीएस अफसर और नेशनल पुलिस अकादमी के निदेशक रह चुके, शंकर सेन ने ट्रिब्यून में एक लंबा लेख इस मामले पर लिखा है। वे लिखते हैं,

“राजनीतिक प्रभाव के कारण, वाज़े को बहाल किया गया और अपनी राजनीतिक पहुंच और दबंग छवि के काऱण वह मुंबई पुलिस का एक चहेता पुलिस अफसर बन गया।’

हालांकि, वह बहुत वरिष्ठ इंस्पेक्टर भी नहीं था, पर उसकी राजनीतिक पहुंच ने उसे, सरकार के नज़दीक पहुंचा दिया। इसी अवधि में परमवीर सिंह भी पुलिस कमिश्नर थे। क्या यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि वे वाज़े के अतीत और उसके राजनीतिक संपर्कों को जानते न रहे हों। या तो उन्होंने वाज़े की नजदीकियों और उसके राजनीतिक सम्पर्कों को अनदेखा किया या उन्होंने, खुद भी वाज़े पर अपना हांथ रख दिया। बेहद राजनीतिक कृपापात्र वाले अफसर अपने बॉस के भी करीब हो जाते हैं पर यह निकटता, उनके कामकाज और प्रतिभा के कारण नहीं होती है, बल्कि यह कृपा उनके राजनीतिक सम्पर्कों के कारण होती है। इसी निकटता के काऱण वाज़े को 100 करोड़ की उगाही का ‘दायित्व’ मिलता है और इसी निकटता के कारण परमवीर सिंह चुप रहते हैं, और अपना मुंह तभी खोलते हैं जब वे पद से हटा दिए जाते हैं। यह शांतिपर्व का ज्ञान है न कि अंतरात्मा की जागृति।

भारतीय पुलिस व्यवस्था में मुंबई पुलिस एक प्रोफेशनल और दक्ष पुलिस बल मानी जाती रही है। लेकिन धीरे-धीरे, पुलिस के दैनंदिन कार्यो में राजनीतिक दखलंदाजी और अन्य हस्तक्षेप ने इसके प्रोफेशनलिज़्म को भी पर्याप्त नुकसान पहुंचाया है।

Can political intervention be avoided in a democracy?

यहीं एक सवाल यह भी उठता है कि क्या लोकतंत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप से बचा जा सकता है ? राजनीतिक हस्तक्षेप न रहे तो क्या पुलिस बेलगाम नहीं हो जाएगी ? राजनीतिक हस्तक्षेप हो भी तो कितना हो ? पुलिस में रिश्वत, पक्षपातपूर्ण कार्यवाही और अन्य तमाम शिकायतों पर यदि राजनेता दखल देते हैं तो क्या ऐसी दखलंदाजी को भी गलत समझा जाना चाहिए ? इन सवालों का उत्तर ढूंढने की कोशिश करते हैं।

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस जो सीधे शासन- प्रशासन से जुड़ी ही नहीं बल्कि कार्यपालिका का एक महत्वपूर्ण अंग है, को राजनीतिक दखलंदाजी से इम्यून नहीं रखा जा सकता है और न ही जनता और जनता की तरफ से, उसके प्रतिनिधियों द्वारा पुलिस की शिकायत मिलने पर, उसे सिर्फ इसलिए कूड़ेदान में डाल दिया जाय कि, वह शिकायत राजनीतिक दल से जुड़े किसी नेता ने की है, उचित नहीं है।

यह बात भी सच मानिये कि यदि राजनीतिक हस्तक्षेप न रहे तो पुलिस सच में बेलगाम हो जाएगी। फिर इसका निदान क्या है ?

राजनीतिक हस्तक्षेप यदि पुलिस के दैनंदिन कार्यों जैसे, इसे पकड़ो, इसे छोड़ो, इसे जेल भेजो, या इसे थाने से ही जमानत पर छोड़ दो, जैसे कार्यों में है तब तो यह न केवल पुलिस के कार्यों में सीधा हस्तक्षेप है, बल्कि कानून का भी मखौल बनाना हुआ।

धर्मवीर पुलिस कमीशन, जिसे राष्ट्रीय पुलिस आयोग भी कहा जाता है ने, 1980 में एक विस्तृत रिपोर्ट दी थी और पुलिस में पेशेवराना सुधार लाने के लिये बहुत सी सिफारिशें भी की हैं। कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें इस प्रकार हैं, जैसे,

● हर राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए।

● जाँच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग किया जाए।

● पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिये एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए।

● पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय किया जाए।

● एक नया पुलिस अधिनियम बनाया जाए।

इसके बाद, पुलिस सुधारों के लिये गठित अन्य समितियाँ भी बनीं।

● 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने देश के सभी राज्यों के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को पत्र लिखकर पुलिस व्यवस्था में सुधार किये की कुछ सिफारिशें की थी।

● 1998 में महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारी जे.एफ. रिबैरो की अध्यक्षता में एक अन्य समिति का गठन किया गया।

● 2000 में गठित पद्मनाभैया समिति ने भी केंद्र सरकार को सुधारों से संबंधित सिफारिशें सौंपी थीं।

● आपातकाल के दौरान हुई ज़्यादतियों की जाँच के लिये गठित शाह आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिये पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही थी।

दरअसल, देश में पुलिस-सुधार के प्रयासों की भी एक लंबी श्रृंखला है, जिसमें विधि आयोग, मलिमथ समिति, पद्मनाभैया समिति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सोली सोराबजी समिति तथा सबसे महत्त्वपूर्ण प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ-2006 मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्देश शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश, असम और बीएसएफ के डीजी रहे प्रकाश सिंह लम्बे समय से इन सुधारों को लागू करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अब भी वे अखबारों में इस महत्वपूर्ण विषय पर नियमित लेखन करते रहते हैं। पर, अफसोस कि, पुलिस सुधारो के प्रति हर सरकार का रवैया सुस्ती भरा रहा है।

2014 के बाद यह उम्मीद बनी थी, नरेंद्र मोदी की सरकार पुलिस सुधारों को लागू करने की दिशा में कुछ ठोस काम करेगी, लेकिन, पिंजड़े का तोता, तोता ही बना रहा है। जिसकी भी सरकार आयी उसी की विरुदावली गाने लगा।

एनआईए, जिसे आतंकवाद और अन्य गम्भीर मामलो की तफ्तीश के लिये 2009 ने गठित किया गया है, की विवेचनाओं में सरकारी हस्तक्षेप पर भी सवाल उठने शुरू हो गए। राफेल मामले में जिस प्रकार से रातोंरात सीबीआई प्रमुख को सरकार ने हटाया उससे न केवल सरकार के कदम पर सवाल खड़े हुए बल्कि सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका भी सन्देह के घेरे में आयी।

2020 में हुए दिल्ली दंगों की विवेचनाओं औऱ दिल्ली दंगों में पुलिस की भूमिका (Role of police in delhi riots 2020) साफ साफ सत्तारूढ़ दल की ओर झुकी दिखी और बार बार, दिल्ली पुलिस को अदालत की फटकार सुननी पड़ी। जेएनयू हॉस्टेल और जामिया लाइब्रेरी के अंदर अराजक तत्वों द्वारा की गयी मारपीट और तोड़फोड़ पर दिल्ली पुलिस की शर्मनाक चुप्पी और पक्षपातपूर्ण रवैया बेहद दुःखद और निराशाजनक रहा है। दिल्ली पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर कई वरिष्ठ पुलिस और सिविल सेवा के रिटायर्ड अफसरों ने, दिल्ली के कमिश्नर पुलिस को पत्र भी लिखे और उनकी आलोचना की। यह क्रम आज भी जारी है।

सरकार और सभी राजनीतिक दलों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि पुलिस उनके राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिये नहीं बनी है, बल्कि पुलिस इस लिये बनी है, जिससे समाज में अराजकता, विधिविहीनिता, अशन्ति न फैले, अपराध नियंत्रित हों और समाज मे शांति बनी रहे ताकि सरकार अपने कामकाज सुचारू रूप से कर सकें। वह अपनी योजनाओं को लागू कर सके।

पुलिस किसी भी दल के राजनीतिक प्रतिशोध की पूर्ति के लिये नहीं बनी है और न ही यह सरकार का कोई भाड़े का वर्दीधारी गिरोह है। बल्कि यह कानून को, कानूनी तरह से लागू करने वाली एक विधिक संस्था है जिसका विधिविरुद्ध तऱीके से राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये दुरुपयोग करना एक अराजक और विधिविहीन समाज की ओर कदम बढ़ाना होगा।

पुलिस एक गिरोह नहीं है और मैं जस्टिस मुल्ला की टिप्पणी को पुलिस का असल चेहरा नहीं मानता हूं। पुलिस का अधिकांश अंश अराजनीतिक रहना चाहता है और स्वभाव से है भी। पर एक सिस्टम के रूप में, इस तंत्र में अब भी बहुत सी कमियां हैं और इन कमियों को दूर करने के लिये समय समय पर, सरकार द्वारा गठित आयोगों और कमेटियों ने, उपाय भी, सुझाये हैं, पर उन उपायों को अमल में लाने की जिम्मेदारी भी सरकार पर ही है। क्या सरकार इन सब मुद्दों पर भी अपने राजनीतिक गुणा भाग और दांव पेंच से अलग हट कर विचार करेगी ?

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

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