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En. Durga Prasad

सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध

Privatization of public sector against national interest

आइए बिजली क्षेत्र पर चर्चा करते हैं। आजादी के बाद देश के विकास हेतु तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा मिश्रित अर्थव्यवस्था को चुना गया जिसके अन्तर्गत सार्वजनिक व निजी उद्योगों के विकास के लिए समान अवसर प्रदान किये गये। सार्वजनिक क्षेत्र के विकास हेतु राज्य कल्याणकारी नीति के अंतर्गत लाभ के बजाय आधारभूत ढांचा विकसित करने पर जोर दिया गया।

आजादी के बाद हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने खाद्यान्न संकट की विकराल समस्या मुँह बाये खड़ी थी। सीमित संसाधनों के कारण विदेशों से आयातित खाद्यान्न की मात्रा व गुणवत्ता अपर्याप्त थी। इस अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए पचास के दशक के उत्तरार्ध व साठ के दशक के पूर्वार्द्ध में कृषि सिंचाई नहरों के तंत्र के साथ-साथ देश में राज्य विद्युत परिषदों की स्थापना की गई व विद्युत चालित सरकारी नलकूपों का वृहद तंत्र विकसित किया गया। परिणामस्वरूप एक दशक बाद ही देश में हरित क्रांति हुई और सिंचाई के साधनों की उपलब्धता के साथ-साथ किसानों की कड़ी मेहनत के कारण हमारा देश खाद्यान्न मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भर हुआ बल्कि खाद्यान्न निर्यात की स्थिति में पहुँच गया।

1991 में अपनाई गई नई आर्थिक नीतियों के अन्तर्गत अब सरकार बिजली क्षेत्र के निजीकरण पर आमादा है जबकि कृषि सिंचाई के साथ-साथ सरकारी व निजी उद्योगों को विद्युत आपूर्ति करने हेतु आधारभूत ढांचे के रूप में विद्युत क्षेत्र का योगदान सर्वविदित है जो कि तभी सम्भव है जब विद्युत क्षेत्र का प्रबंधन सरकार के पास हो। हमारे कृषि प्रधान देश में आधी से अधिक आवादी पूर्णरूपेण खेती पर ही आश्रित होने के बाबजूद 60 प्रतिशत से अधिक खेती योग्य भूमि अभी भी असिंचित है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक विकास में भी देश में बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय विषमताएं हैं जिसके कारण रोजगार की तलाश में मजदूर सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की यात्राएं करने को मजबूर होते हैं।

पिछले साल मार्च में किये गये लॉकडाउन के दौरान मजदूरों के, न केवल असहनीय व लम्बी पैदल यात्राओं बल्कि सैकडों मजदूरों की जान भी गंवाने के, भयावह दृश्य स्मृतियों में तैरने लगते हैं। ऐसी स्थिति में जहां केन्द्र व राज्य सरकारों को मिलकर क्षेत्रीय औद्योगिक विषमता दूर करने व बड़े पैमाने पर असिंचित कृषि भूमि की सिंचाई हेतु वृहद स्तर पर विद्युत क्षेत्र को आधारभूत ढांचे के रूप में विकसित करने की आवश्यकता थी वहां सरकारों द्वारा बिजली क्षेत्र को निजी हाथों में चुनिंदा पूंजीपतियों के हवाले करने की राष्ट्रविरोधी नीति को अंजाम दिया जा रहा है। अन्य कारणों सहित विद्युत संशोधन विधेयक-2021, जिसके तहत बिजली क्षेत्र के निजीकरण का प्रावधान है, का विरोध करते हुए 5 महीने से किसानों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के साथ-साथ सरकारी व निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों व मजदूरों द्वारा भी राष्ट्रीय स्तर पर आन्दोलन किये जा रहे हैं। ऐसे में बिजली क्षेत्र के निजीकरण के अब तक किये प्रयोगों की स्थिति के बारे में कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं-

1. महाराष्ट्र राज्य विद्युत परिषद के साथ विद्युत खरीद अनुबन्ध के अन्तर्गत 1993 में काम शुरू कर एनरॉन व उसकी सहायक कम्पनी ने 1996 में दाभोल परियोजना स्थापित की जिसकी उत्पादित बिजली की कीमत अत्यधिक होने के साथ अन्य अनियमितताओं के कारण एनरॉन बीच में ही अनुबन्ध तोड़कर भाग गई जिसके कारण सरकार को भारी वित्तीय हानि के साथ जनता को अत्यंत महंगी बिजली की कीमत चुकानी पड़ी। उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के विरुद्ध किये गए मुकद्दमे की फाइल भी कुछ समय पूर्व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बन्द कर दी गयी है।

2. उड़ीसा में विद्युत वितरण क्षेत्र का काम अमेरिका की ही निजी कम्पनी ए.ई.एस. को 1 सितम्बर 1999 को 4200 लाख रुपये में दिया गया था। 29-30 अक्टूबर 1999 को आये साइक्लोन में क्षतिग्रस्त वितरण तंत्र को ठीक करने को लेकर हुए विवाद के कारण ए.ई.एस. कम्पनी भी अनुबन्ध की शर्तों के विपरीत 5 वर्ष का लॉक इन कार्यकाल बिना पूर्ण किये कार्य बीच में ही छोड़कर भाग गई जिससे जनता को परेशानी का सामना करना पड़ा व सरकार को वित्तीय हानि उठानी पड़ी।

3. मध्यप्रदेश में निजी विद्युत उत्पादक कम्पनियों के साथ किये गए गलत विद्युत खरीद अनुबन्धों के अन्तर्गत बिना एक यूनिट बिजली उपभोग किये ही सरकार को 3598 करोड़ रुपये की धनराशि का भुगतान निजी विद्युत उत्पादक कम्पनियों को किया गया जिसकी कीमत अन्ततः जनता को ही चुकानी पड़ी।

4. गुजरात सरकार द्वारा अनुबन्ध कर 38 निजी सौर ऊर्जा उत्पादकों से 15 रुपये प्रति यूनिट व अन्य 23 से ₹ 9.13 से ₹13.59 प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदी गई है जबकि ₹ 1.99 प्रति यूनिट की दर से अन्य निजी सौर ऊर्जा उत्पादक खुले बाजार में बिजली बेचने को तैयार हैं।

5. देश में सरकार द्वारा कई ताप विद्युत उत्पादक कम्पनियों को लगभग ₹ 10 लाख करोड़ के ऋण सरकारी बैंकों से उपलब्ध कराए गये जिसमें से लगभग 6 लाख करोड़ सरकार द्वारा बट्टे खाते में डाल गये हैं। शेष 4 लाख भी वसूली न करने योग्य की श्रेणी  में रखे गये हैं जिन्हें भी कालान्तर में बट्टे खाते में डाल दिया जाएगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि इन निजी कंपनियों से ब्याज की बात तो छोड़िए सरकार मूलधन भी नहीं वसूल रही है तो फिर उनसे बिजली ख़रीदकर जनता को 10 रुपये की उच्च व अव्यबहारिक दर पर बिजली उपलब्ध कराने पर क्यों आमादा है? इसके विपरीत सरकारी क्षेत्र पर कथित भ्रष्टाचार को शामिल करते हुये भी की सरकारी परियोजनाएं ₹ 2 प्रति यूनिट दर से भी कम लागत मूल्य पर बिजली उपलब्ध करा रही हैं।

उक्त उदाहरणों से सहज ही समझ जा सकता है कि उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार व देशी-विदेशी कॉरपोरेट जगत द्वाराखडे किये गए वित्तीय पूंजी के आडम्बर के सामने सरकार ने आत्म-समर्पण कर दिया है जिसके कारण किसानों, कर्मचारियों व मजदूरों द्वारा किये जा रहे राष्ट्रव्यापी आंदोलनों की अनदेखी की जा रही है।

यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि विद्युत संशोधन विधेयक-2021 पारित होने पर बिजली की कीमत 10 रुपये प्रति यूनिट हो जायेगी। ऐसी स्थिति में 10 एचपी निजी नलकूप का वर्तमान 1700/- (सत्तरह सौ) रुपये प्रति माह का बिल मात्र 10 घंटे दैनिक उपयोग पर लगभग 24000/- (चौबीस हजार) रुपये प्रति माह हो जायेगा। इसके साथ ही आम उपभोक्ताओं पर भी विद्युत संशोधन विधेयक का दुष्प्रभाव पड़ेगा। बीपीएल कनेक्शन धारक 1 किलोवाट के उपभोक्ता का 100 यूनिट बिजली खर्च पर वर्तमान 367 रुपये का मासिक बिल लगभग 1100 रुपये हो जायेगा वहीं आम शहरी उपभोक्ता के 2 किलोवाट कनेक्शन पर 250 यूनिट बिजली खर्च पर मासिक बिल 1726 रुपये के स्थान पर 2856 रुपये हो जायेगा।

उक्त प्रस्तुति आम जनता के समक्ष इस उद्देश्य से प्रेषित है ताकि सरकार की इन राष्ट्रविरोधी निजीकरण की नीतियों का मुकाबला करने हेतु विचार आमंत्रित किये जा सकें व राष्ट्रीय स्तर पर जनमत तैयार किया जा सके।

इं. दुर्गा प्रसाद

उपाध्यक्ष, वर्कर्स फ्रंट

अधिशासी अभियंता (सेवानिवृत्त)

दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम

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