अपनी दादी की तरह निर्भीक और स्पष्टवादी छवि बना चुकी हैं, यूपी की दीदी

Congress General Secretary, Mrs. Priyanka Gandhi,कांग्रेस महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी

प्रियंका गांधी की नैतिक चुनौती और उत्तर प्रदेश की राजनीति की नई परिभाषा

Priyanka Gandhi’s moral challenge and new definition of Uttar Pradesh politics

तात्कालिक स्थितियों में भी अपने विरोधियों को एक नैतिक चुनौती देते हुए इंदिरा की पोती हूं, यह उद्घोष करने में प्रियंका गांधी सक्षम हैं, तो यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि यदि उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ‘महज़ एक तानाशाह थीं’ तो यह कैसे मुमकिन हो सकता है?

अगर आपातकाल की दोषी दिवंगत प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी मूलतः प्रजातांत्रिक नहीं होतीं तो प्रियंका यह साहस कहां से लाती ?

इमरजेंसी को याद करके इंदिरा गांधी को उसका दोषी बनाकर के बरसी के तौर पर याद करना, कसीदे पढ़ना और अपने अघोषित आपातकाल को छिपाना, नागरिकों का ध्यान बीते दिवस की कुछ और निर्मम तारीख 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला हत्याकांड या फिर 6 दिसंबर 1992 की ओर आकर्षित नहीं होने दिया जाता। जिस दिन बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया और उसके बाद से देश में प्रारंभ सांप्रदायिक हिंसा का बड़ा अध्याय गोधरा कांड के बाद लिखा गया, उन पर चर्चा क्यों नहीं ? या अब चर्चा करने के लिए विषय का चयन किसी सेलबस द्वारा तय किया जाएगा और एक करिकुलम के हिसाब से चैप्टर पर चर्चा की जाएगी या जन सामान्य को यह अधिकार नहीं है कि वह यह जान सके कि इमरजेंसी लगाने वाली इंदिरा गांधी का वह आपातकाल स्वयं इंदिरा गांधी ने हटाया था !

यदि आपातकाल लगाना देश में तानाशाही की शुरुआत थी, तो क्या आपातकाल का हटाया जाना प्रजातांत्रिक मूल्यों की वापसी नहीं था?

वह परंपरा और मूल्य जो इंदिरा को नेहरू से विरासत में मिले थे, जिनकी बुनियाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश हित में रखी थी, क्या अब हमें अपने नेताओं से वर्तमान में या भविष्य में किस तरह की उम्मीद रखनी चाहिए ? क्या वे कभी विपरीत परिस्थितियों में अपयश और अपकीर्ति से भयभीत होने का प्रजातांत्रिक साहस दिखा पाएंगे।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में चंद लोग ही ऐसे हुए हैं जिन्होंने देश ही नहीं अपितु पूरी दुनिया पर अमिट छाप छोड़ी और उनके व्यक्तित्व की मिसाल है। इंदिरा प्रियदर्शनी उन्हीं में से एक हैं। उनके निर्भीक और दृढ़निश्चयी फैसलों के चलते आयरन लेडी माना जाता है। इंदिरा गांधी 16 वर्ष देश की प्रधानमंत्री रहीं और अपने शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव देखे। जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी सरकार के विरुद्ध अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया इस अस्थिरता के चलते आपातकाल लागू कर दिया और उनके इस फैसले के तहत भारी विरोध और तीखी आलोचनाएं झेलनी पड़ीं। अदम्य साहस वाली इस महिला ने जनता से माफी मांग कर पूर्ण बहुमत प्राप्त कर देश सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। 1983 में अपनी नई विदेश नीति निर्गुट सम्मेलन और उसी साल नवंबर में राष्ट्रमंडल राष्ट्राध्यक्षों के सम्मेलन का आयोजन कर भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि सशक्त की।

अपने चुंबकीय व्यक्तित्व के कारण इंदिरा गांधी भारत की सफलतम प्रधानमंत्री में से एक बनीं।

इंदिरा गांधी की एक महत्वपूर्ण ताकत उनका एक जन नेता होना और लचीलापन, इंदिरा गांधी की राष्ट्र के ताने-बाने की गहरी समझ, तथा भारत के लोगों के साथ उनके अनूठे संबंध, भारतीय राजनीति में उनके दबंग स्थिति के कुंजी बने। गरीबों से जोड़ना उनकी प्राथमिक ताकत रही।

इंदिरा अपने पूरे राजनीतिक कैरियर में आम जनता की बदलती हुई अपेक्षाओं के प्रति हमेशा चौकस रहीं। सन् 1971में उन्होंने सरल, लेकिन अपने नारे “गरीबी हटाओ” लोगों को बहुमत से पछाड़ दिया। जबकि 1980 के चुनाव में अपना राजनीतिक नामकरण बदल दिया, बदलते समय के अनुसार जनता पार्टी की सरकार द्वारा अप्रभावी शासन की पृष्ठभूमि के खिलाफ उन्होंने 1971 के चुनाव से गरीबी उन्मूलन के अपने महत्वाकांक्षी चुनाव के दावों को खारिज कर दिया और लोगों को “काम करने वाली सरकार” सरल आश्वासन के साथ बदल दिया और दोनों चुनाव में उनके जादू ने जमकर काम किया।

इंदिरा गांधी की अविभाज्य राजनीतिक ऊर्जा, लचीलापन, साहस, राजनीतिक समय की अद्भुत समझ, 1977 की अपनी विनाशकारी हार के बाद इंदिरा गांधी की शानदार वापसी और एक पार्टी के विभाजन के बाद उनके राजनीतिक धैर्य की एक अविश्वसनीय कहानी है।

यह वास्तव में इंदिरा ग्रैंड शो था। अपनी पार्टी के लिए 82635345 वोट पाकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत के इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश हासिल किया। नेता जगजीवन राम ने इसे चमत्कार कहा।

इंदिरा गांधी की विरासत एक चमत्कारी शक्ति जो कांग्रेस के अतीत वर्तमान और भविष्य को आकार देती है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी एक असामान्य दूरदर्शी भी थीं, जिन्होंने 1970 के दशक में जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई पर बात की थी, जब वे फैशन में भी नहीं थे। श्रीमती गांधी एक पारिस्थिकीविद भी थीं, उनके प्रधानमंत्री काल में भारत परमाणु क्लब में शामिल हो गया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़े बड़े कदम उठाए। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इंदिरा एक प्रभावी एवं मजबूत नेता थीं।

1971 के भारत-पाक युद्ध युद्ध में विश्व की शक्तियों के सामने ना झुकने के नीतिगत एवं समयानुकूल निर्णय से पाकिस्तान को परास्त किया और बांग्लादेश को देश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक गौरवपूर्ण पल दिलवाया दृढ़ निश्चयी और किसी भी परिस्थिति से जूझने और जीतने की क्षमता रखने वाली प्रधानमंत्री ने न केवल इतिहास बल्कि दक्षिण एशिया के भूगोल को भी बदल डाला और 1962 के भारत चीन युद्ध की अपमानजनक पराजय की कड़वाहट धूमिल कर भारतीयों में नई ऊर्जा का संचार किया। आधुनिक भारत के निर्माता श्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत में कई महत्वपूर्ण पहल की लेकिन उसे अमली जामा इंदिरा गांधी ने पहनाया, चाहे रजवाड़ों की प्रिवी पर्स समाप्त करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण अथवा कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण या हरित क्रांति की शुरुआत। इनके जरिए उन्होंने अपने आप को गरीबों एवं आम आदमी का समर्थक साबित करने की सफल कोशिश की !

ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए बैंकों का विस्तार पूरे भारत में किया उनकी नीतियां सिर्फ भाषणों एवं पैकेज तक सीमित नहीं रहती थीं, धरातल पर भी सुचारू रूप से लागू होती थी और लोगों को नए भारत के दर्शन होते थे। एक नई उमंग और तरंग का नाम इंदिरा था, जिसकी आंखों से हिंदुस्तान सपने देख रहा था साकार होते हुए भी। बैंकों को एक ऐसे कदम में राष्ट्रीयकृत किया जिसने भारत को वर्तमान वैश्विक मंदी के सबसे बुरे दौर से हटा दिया।

वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा, जिन्होंने 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री की जीवनी प्रकाशित की थी उन्हें लगता है इंदिरा गांधी सत्ता के महत्व को समझती थी और अधिकांश राजनेताओं की तुलना में इसे बेहतर ढंग से चलाने में सक्षम थीं।

चौथे राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार श्री नीलम संजीव रेड्डी की जगह एक स्वतंत्र उम्मीदवार वीवी गिरी को चुनाव जिता कर उन्होंने अपनी एक अलग छवि बनाई !

इंदिरा केवल भारतीय राजनीति में ही नहीं अपितु विश्व राजनीति के क्षितिज पर एक विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। आज इंदिरा गांधी को इसलिए नहीं जाना चाहता कि वह जवाहरलाल नेहरू की पुत्री थीं, बल्कि गांधी अपनी प्रतिभा राजनीतिक दृढ़ता के लिए विश्व राजनीति के इतिहास में हमेशा जानी जाती रहेंगी। उन्हें विश्व भर के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। विश्व विख्यात कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा विशेष योग्यता प्रमाण पत्र दिया गया।

महान नेता इंदिरा गांधी जी ने अपनी हत्या के एक दिन पहले उड़ीसा में अपना आखिरी भाषण देते हुए कहा था मैं आज जीवित हूं कल शायद संसार में नहीं रहूंगी फिर भी मैं अपनी आखिरी सांस तक देश की सेवा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को शक्ति देगा और अखंड भारत को जीवित रखेगा।

आत्मा अजर अमर और अविनाशी है आज इंदिरा गांधी देह के रूप में बीच नहीं है लेकिन वह एक साहसी आयरन लेडी के सूक्ष्म रूप में देश सहित सारे विश्व का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगीं।

आज भारत को इंदिरा गांधी जैसी सशक्त नेता की आवश्यकता है सर्वत्र व्याप्त अनुशासनहीनता और दुर्दशा देखते हुए अधिकतर लोग इसका उत्तर हां में देंगे।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रियंका का यह उद्घोष कि वह इंदिरा की पोती है किसी से डरती नहीं और नैतिकता के साथ अपनी बात को रखती आई है और रखती रहेगी। दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जैसा राजनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता में नई स्फूर्ति के लिए एक सकारात्मक कदम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की जनता या समस्त भारत की जनता इंदिरा गांधी को ही देखना चाहती है।

आज के दौर में श्रीमती गांधी की प्रासंगिकता उनकी राजनीति, उनकी दूरदर्शिता की बड़ी आवश्यकता है ऐसा हर वर्ग के लोगों का सोचना है प्रियंका के रूप में हर वर्ग का व्यक्ति उनसे उम्मीद लगाए हैं।

लेखक रशीद किदवई कहते हैं कि प्रियंका और इंदिरा के पहनावे में बहुत समानता है, उनकी बहुत सारी चीजें एक जैसी है,

“वह कहते हैं कि इंदिरा लोगों को अपनी सी लगती थीं, उनमें विनम्रता भी थी, वे सहायता से लोगों से घुलमिल कर बातें करती थीं। इंदिरा के चेहरे पर लोगों को एक सी उम्मीद नजर आती थी कि वह देश के लिए कुछ कर सकती हैं, उसी उम्मीद को आगे बढ़ाने का नाम है प्रियंका गांधी !

2019 लोकसभा चुनाव के समय अपना चुनाव प्रचार करने के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 14 फरवरी को रोड शो करने के लिए निकली तभी थोड़ी देर में यह सूचना प्राप्त हुई कि पुलवामा में हमला हो गया और देश के जवान शहीद हो गए। उन्होंने नैतिकता को सर्वोपरि रखते हुए अपनी रैली एवं रोड शो स्थगित कर दिया और शहीदों को एक सच्ची श्रद्धांजलि देना उचित समझा ना कि शहीदों के नाम पर वोट मांगने की राजनीति करना।

सोनभद्र में आदिवासियों के नरसंहार का मामला हो या उत्तर प्रदेश की 69000 शिक्षक भर्ती घोटाला, नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन का मामला हो जनहित से जुड़ा कोई भी मुद्दा प्रियंका ने भरपूर ताकत से अपनी आवाज उठाई !

अभी हाल ही में जब लॉकडाउन में मजदूर पैदल चलने को मजबूर थे तब प्रियंका ने 1000 बसों का इंतजाम करवाया। जोगी आदित्यनाथ ने बसों की फिटनेस के मामले को लेकर बसों को ले जाने की अनुमति नहीं दी, तो प्रियंका ने उनसे निवेदन किया कि वह चाहे तो अपने नाम और अपनी पार्टी के नाम के बैनर के साथ इन बसों में उन मजदूरों को जाने की अनुमति प्रदान करें। इस तरह की बात कहकर प्रियंका गांधी ने उन मजदूरों के दर्द को समझा और सहनशीलता के साथ उनकी मदद करने की कोशिश की और इस तरह उन्होंने उत्तर प्रदेश की जनता के मन में अपने लिए अपनी दादी की तरह स्थान बनाया जो कि एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए।

अपने ट्वीट में उन्होंने कहा कि जनता के सेवक के रूप में मेरा कर्तव्य सच्चाई को उनके सामने रखना है। उन्होंने प्रदेश की योगी सरकार को ललकारा है एवं साथ में विपक्ष के नेताओं पर भी तीखा हमला बोला है।

Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

69000 शिक्षक भर्ती को व्यापम घोटाला कहकर प्रियंका गांधी सबसे ज्यादा मुखर रही हैं। उन्होंने कहा कि यह उत्तर प्रदेश का व्यापमं घोटाला है इस मामले में गड़बड़ी के तथ्य सामान्य नहीं हैं।

प्रियंका ने कहा कि युवाओं के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए और उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार इसकी निष्पक्ष जांच नहीं करवा सकती तो वह भी नौजवानों के साथ महा आंदोलन करेगीं।

प्रियंका हर विषय पर हर मुद्दे पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी नजर बनाए हुए हैं और उनका आश्वासन लोगों के साथ है और लोग भी उनके साथ कनेक्ट कर पा रहे हैं। आज उनकी मौजूदा स्थिति लोकप्रिय दीदी की हो चुकी है जो अपनी दादी की तरह निर्भीक और स्पष्टवादी है।

सारा मलिक

 

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