Home » Latest » हिन्दी भाषा एवं साहित्य अध्ययन की समस्याएं
literature and culture

हिन्दी भाषा एवं साहित्य अध्ययन की समस्याएं

शिथिल हुए हैं हिंदी भाषा में शुद्ध-अशुद्ध के मानदंड

बीसवीं सदी की दहलीज लांघ कर आज हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। यह मात्र कैलेंडर के पन्ने पलटने की क्रिया नहीं, अपितु हमारी समूची मानसिकता, हमारे भाव विश्व, बुद्धि-जगत एवं हमारे नजरिये में चल रही मंथन प्रक्रिया का आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में बहुआयामी अवलोकन करने का समय है।

विज्ञान, तंत्र-विज्ञान तथा वैश्वीकरण के युग में धर्म, समाज, जीवन-मूल्य, भाषा, साहित्य एवं कला को परखने के दृष्टिकोण में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उसकी गति, प्रभाव एवं परिणामों को झेलकर भी इनका अस्तित्व बनाए रखना अपने आप में चुनौती है।

प्रश्नों की कतार में हमारी भाषा और साहित्य के शाश्वत मूल्यों का प्रश्न एक महत्वपूर्ण चुनौती बनकर खड़ा है। विडम्बना यह है कि इनसे जुड़ी समस्त समस्याओं के बीज हमारी दोहरी मानसिकता में ही दबे हैं।

हर महीने हो रही है दो भाषाओं की मृत्यु

सर्वप्रथम भाषा की चर्चा करती हूँ।

लंदन में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन (World Hindi Conference held in London) में एक जर्मन प्रोफेसर ने घोषणा की थी कि वर्तमान में प्रतिमाह दो भाषाओं की मृत्यु हो रही है तथा आज बोली जाने वाली पांच, छ: हजार भाषाओं में 90 प्रतिशत भाषाएं शीघ्र समाप्त हो जाएंगी।

भाषाओं का सिमटता संसार : टेक्नोलॉजी बनी बोलियों की मृत्यु का कारण

यह तथ्य गंभीर, चिन्तनीय एवं विचारणीय है। औद्योगिक क्रान्ति के साथ-साथ प्रिंटिंग टेक्नालॉजी का आविष्कार हुआ। तकनीक के युग में जो केवल बोलचाल की भाषाएं थीं अर्थात् जिनकी अपनी लिपियां न थीं, वे सारी भाषाएं आज मृतप्राय: बनी हैं। जिन भाषाओं ने प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के साथ अपनी लिपियों का भी विकास किया वे ही अब प्रगति-पथ पर हैं।

हिन्दी भाषा की स्थिति दो रूपों में सामने आ रही हैं। व्यापार, विज्ञापन, पत्रकारिता एवं मनोरंजन के क्षेत्र में हिन्दी एक ओर अपना परचम लहरा रही है, दूसरी ओर विज्ञान, तकनीक, वैद्यकीय एवं सरकारी कामकाज में वह कदम-कदम पर किसी अयाचित की तरह अपना स्थान ढूंढ रही है।

हाशिए पर क्यों जा रही है हिंदी?

पिछले 65 वर्षों में हिन्दी के प्रति लगाव, आस्था, विश्वास और उसे अपनाने पर गौरवान्वित होने की अनुभूति न जग पाना आज हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है। हिन्दी का रोजी-रोटी से प्रत्यक्ष न जुड़ा होना इसका कारण है और समस्या भी। नौकरी, व्यापार और समाज के महत्वपूर्ण मुख्य प्रवेश द्वारों पर अंग्रेजी की टिकिट लेने वालों को ही प्रवेश मिल पाता है। परिणामस्वरूप हिन्दी दिन-प्रतिदिन हाशिए पर चली जा रही है।

हिन्दी के मानक स्वरूप की समस्या

हिन्दी के संबंध में एक महत्वपूर्ण समस्या है उसके मानक स्वरूप को लेकर। वैश्विक स्तर पर स्थापित होने के बावजूद उसके स्वरूप में भ्रम की स्थिति आज भी पूर्ववत बनी है। कैसे भी कुछ भी कह दिया जाए केवल अर्थ सम्प्रेषित हो जाना चाहिए। एक पक्ष भाषा के बहता नीरगुण को मानकर वर्तमान कोड मिश्रित भाषा का समर्थन करता है तथा दूसरा पक्ष व्याकरण सम्मत भाषा की अनिवार्यता पर बल देता है। आज सभी क्षेत्रों में स्वच्छंदता या ‘मेरी मर्जी’ का नारा चल पड़ा है। भाषा इससे अछूती कैसे रह सकती है? अत: शुद्ध-अशुद्ध के मानदंड भी शिथिल हुए हैं यह प्रवृत्ति वांछनीय नहीं कही जा सकती। व्याकरण का तो नाम ही ‘शब्दानुशासन’ है।

किन्तु अनुशासन की अति से बचने की सावधानी भी अपेक्षित है। ‘बहते नीर’ को भी तटबंधों का अतिक्रमण करने पर नियंत्रित करना पड़ता है।

मानक हिन्दी का स्वरूप

यद्यपि वैश्विक स्तर पर व्यवहृत भाषा का विविध रूपों में विकसित होना अच्छी बात है और बोलचाल की भाषा में इसका स्वागत होना चाहिए। किन्तु लिखित रूप में ऐसी मानक हिन्दी की आवश्यकता है जो सर्वत्र ग्राह्य हो।

एक महत्वपूर्ण समस्या है अनुवाद की। हमारे यहां जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं में समय-समय पर लिखे जाने वाले नवीनतम शोधों पर आधारित वैज्ञानिक और तकनीकी ग्रंथों को हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद की कोई व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप अभियांत्रिकी, आयुर्विज्ञान तकनीक आदि विषयों का अध्ययन करने के लिए पहले अंग्रेजी सीखना मजबूरी बन जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान, कला व साहित्य में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए यह एक गंभीर चुनौती है।

सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी की चुनौती | हिंदी में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग

कम्प्यूटर क्रांति के साथ ही हिन्दी को लेकर आज एक और चुनौती हमारे सामने है – वह है इन्फरमेशन टेक्नालाजी की। यह बात तब सामने आई जब इस सदी के महान भाषा वैज्ञानिक एवं चिंतक ‘यूंआन चॉम्सकी’ की रचना ‘सन्थेटिक स्टक्चर्स’ (1957) सामने आई। उन्होंने व्याकरण-चिंतन को रिवोल्यूशन मानते हुए भाषा कम्प्यूटर के अनुरूप कैसे हों, इसका स्पष्टीकरण किया। चॉम्सकी के अनुसार कम्प्यूटर में कॉमनसेंस नहीं होता। वह तो गणितीय ढंग से जितना बताया जाएगा उतना ही कर दिखायेगा। हिन्दी भाषा को कम्प्यूटर के अनुकूल गणितीय ढंग में ढालना एक महत्वपूर्ण समस्या है।

अब बात करते हैं साहित्य की।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि साहित्य या तो परिस्थितियों से विद्रोह करता है या परिस्थितियों की शरण में चला जाता है। भूमंडलीकरण के दौर में आज ज्ञान एवं कलात्मक मनोरंजन के अधिकारिक नये साधनों के विकसित हो जाने से अब साहित्य की आवश्यकता ही खतरे में है। प्रश्न यह उठता है कि आज जिन मूल्यों विचारों का बाजार गर्म है, क्या साहित्य उन्हीं का प्रचार-प्रसार करेगा अथवा वह युग को जो देना चाहता है उसी को पढ़ने-समझने एवं उस पर चिंतन करने हेतु बाध्य करेगा।

साहित्य के क्षेत्र में एक समस्या है उच्चस्तरीय पाठक की। प्राय: यह सुनने को मिलता है कि नये साहित्य का रसबोध औसत पाठक के लिए सुलभ नहीं है। इसका मुख्य कारण है नये लेखक की अग्रणी संवेदना।

वस्तुत: द्वितीय महायुद्ध एवं स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारतीय समाज में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। वर्तमान साहित्य इन परिवर्तनों को और इनसे आगे की स्थितियों को प्रतिफलित करता है। सामान्य पाठक इन नए परिवर्तनों को स्वीकार करके भी उसे आत्मसात नहीं कर पाते। इस तरह समसामयिक और आधुनिकता के बीच का अंतर गहरा होता जा रहा है।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के अध्ययन में एक समस्या यह भी है कि उसकी दिन-प्रतिदिन क्षीण होती रसमयता। एक ओर आज साहित्य अपनी प्रवृत्तियों, संवेदनाओं का अस्तित्व, भावनाओं के ताने-बाने, मानवीय संबंधों के नित्य नूतन तकाजे, कल्पना शक्ति की स्वाभाविक उड़ान, स्वप्न जगत की सच्चाइयां, उसके अंतर्मन तथा दूसरी ओर बाह्य जगत को भौतिक अस्तित्व की गति, प्रगति, सभ्यता के नए-नए आयामों से परिचित कराने वाले विज्ञान के ‘खुल जा सिम-सिम’ से मोहक मायाजाल के अंतर्विरोधों में पिस रहा है। भावनाओं का स्थान अब बौध्दि उन्मेष ने ले लिया है। साहित्य के अंतरंग में ‘रस’ बौद्धिक चिंतन में तप कर अब ‘रसायन’ बन रहे हैं। संभव है भविष्य में कोई प्रेमचंद कम्प्यूटर के शोषण के किसी होरी को मुक्ति दिलाना चाहेगा, कोई मुक्तिबोध मेडिकल साइंस से निर्मित कृत्रिम शिष्यों में से ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ निर्माण करेगा, कोई हजारीप्रसाद द्विवेदी ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ की तर्ज पर टी.वी. चैनलों की आवारा भीड़ क्यों बढ़ती है? की रचना करेगा। एक कठिनाई और हिन्दी साहित्य में किसी भी नये परिवर्तन या आंदोलन को समीक्षकों द्वारा विदेशी प्रभाव घोषित कर दिया जाता है। हम यह मान ही नहीं पाते कि हमारे देश में भी मौलिक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति हैं। वस्तुत: नये साहित्य का अध्ययन विदेशी प्रभाव के रूप में न होकर एक अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के रूप में होना चाहिए। क्योंकि विभिन्न देशों की साहित्यिक और राजनीतिक परिस्थितियों में लगभग एक से प्रभाव कार्य कर रहे हैं। अत: मिथ्या अनुकरण की कल्पना भी असंगत होगी।

वर्तमान साहित्य की उचित समीक्षा एवं मूल्यांकन का अभाव भी साहित्य अध्ययन में व्यवधान उत्पन्न करता है।

समर्थ समीक्षक यदि नये साहित्य को गंभीरतापूर्वक लें तो हिन्दी साहित्य का बहुत भला हो सकता है। इधर साहित्य की उपयोगिता संस्कृति के निष्कर्षों पर कसते हुए मांग और पूर्ति के नियमों के अंतर्गत इसके मूल्यांकन की घातक प्रवृत्ति बढ़ी है।

निष्कर्षत: भाषा और साहित्य अध्ययन से जुड़े ये वे प्रश्न हैं, जिनसे हमारा रोज सामना होता है और हम जिनसे कतराकर निकल जाना चाहते हैं। किन्तु कहीं ऐसा करते हुए हम अपनी जिम्मेदारी से विमुख तो नहीं हो रहे हैं? इनकी प्रतिध्वनि जहां आपके लिए उत्तर जुटाएगी वहीं इन उत्तरों से नए प्रश्न जन्म लेंगे। तो क्या प्रश्नों से टकराना ही हमारी नियति है? देखें यह अनगिनत सवालों की शृंखला हमें किस किनारे पहुंचाती हैं।

डॉ. मीनाक्षी जोशी

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में देशबन्धु

Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

Check Also

headlines breaking news

एक क्लिक में आज की बड़ी खबरें । 03 जुलाई 2022 की खास खबर

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस | दिन भर की खबर | आज की …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.