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COVID-19 news & analysis

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पिछले दस वर्षों से एक आसन्न महामारी के बारे में पर्याप्त गंभीर पूर्वानुमान किया जा रहा था। किन्तु, दुनिया भर के ताकतवर लोगों ने  इस ओर बहुत कम ध्यान दिया। लंबे समय से जिसकी आशंका थी, अंतत: उस रहस्यमयी-रोग ने 2019 के अंत में चीन के हूबेई प्रांत में दस्तक दे ही दी। इसके आगमन की पहली सूचना ली वेनलियानग नमक एक व्यक्ति ने दी, जो वुहान नगरपालिका अस्पताल में नेत्र रोग विशेषज्ञ था। इस तरह का शक व्यक्त करने पर उसे बोलने से रोका भी गया। लेकिन उसके अगले ही दिन  वुहान नगरपालिका के  स्वास्थ्य विभाग ने वायरल निमोनिया के 27 मामलों की सूचना दी। विडंबना यह  कि ली वेनलियानग ही उस रहस्यमय बीमारी का पहला शिकार हुआ, जिसे अब कोविड-19 कहा जाता है।


आज इस आलेख के लिखते वक़्त (सितम्बर 2020) दुनिया भर में कोविड-19 से संक्रमित लोगों की संख्या 2.6 करोड़ और अकेले भारत में 40 लाख हो चुकी है। उसी तरह सारी दुनिया में और भारत में मरनेवालों की संख्या क्रमश: 8 लाख और 68 हजार है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है। विकसित देशों के लिए -6% की वृद्धि नरमी के साथ-साथ वैश्विक उत्पादन में -3% की गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था की हालिया तिमाही रपट में-24% की अभूतपूर्व गिरावट देखने को मिली है।

यह सब क्यों और कैसे हुआ?

वैज्ञानिकों को अपने पेशे के प्रति आदर पाने के लिए, लोगों का विश्वास और सम्मान अर्जित करना होगा। इसके लिए उन्हें विनम्रता के साथ कुछ बुनियादी सवालों के उत्तर देने होंगे।

पहला सवाल, क्या उनके पास आनेवाली महामारी के खास संकेत थे? यदि हाँ, तो वे इसके प्रति कितने गंभीर थे? और दूसरा कि विज्ञान, दवा उद्योग तथा स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के बीच कौन सी खाई रह गई कि कोविड-19 ने ऐसा अभूतपूर्व तांडव मचाया जिसका कोई इंतहा नहीं दिखती! यह भी देखने-समझने की ज़रूरत है कि इस खाई के पैदा होने में ‘विचारधारा’ एवं ‘आर्थिकी’ की कितनी भूमिका रही! प्रारम्भ में ही यह पूछे जाने की ज़रूरत है कि कोविड-19 के आने के पहले इसी तरह के वायरल संक्रमणों एवं महामारियों के संबंध में हमारे पास क्या सब जानकारियाँ थीं? 

हाल की दो पुस्तकें, बुबोनिक प्लेग सहित अतीत की महामारियों और उनके गहरे और स्थायी सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव के इतिहास को प्रस्तुत करती हैं। हालांकि चमगादड़ से जानवरों में प्रवेश करने वाले वायरसों का वैज्ञानिक अध्ययन लगभग 50 वर्ष पहले शुरू हुआ था। किन्तु, इस तरह के संक्रमण कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसकी पहचान पहली बार 1976 में अफ्रीका में हुये ईबोला संक्रमण के प्रकोप के बाद हो सकी थी। तब से अनेक अफ्रीकी देशों में बहुत बार ईबोला के प्रकोप होते रहे हैं। दूसरी वायरल बीमारी जो चमगादड़ से फैलती रही है, वह है – निपाह। यह बीमारी पहली बार 1998 में सामने आई थी जब इसने मलेशिया में काफी लोगों को संक्रमित किया था और उनकी जानें गईं थीं। तब से भारत और बांग्लादेश सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में इसके सीमित किन्तु भयावह प्रकोप दिखते रहे हैं। 

वायरस से होने वाली दो अन्य बीमारियां, जिनके प्राकृतिक मेजबान चमगादड़ हैं, कोविड-19  के आगमन के पहले से जाने जाते थे। वे वायरस के जिस समूह से संबंधित हैं, उसे कोरोनावायरस कहा जाता है। पहला ऐसा वायरस, SARS-CoV के बारे में माना जाता है कि यह चमगादड़ से बिलाव और फिर इंसानों तक पहुंचा है। इस संक्रमण से पीड़ित रोगियों में “गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम(severe acute respiratory syndrome) के लक्षण प्रकट होते हैं।  इस बीमारी का नाम ‘सार्स’  है। हालांकि सार्स संक्रमण के अधिकांश मामले चीन, हांगकांग और सुदूर पूर्व के अन्य देशों में दर्ज किए गए थे, लेकिन अमेरिका, कनाडा, यूरोप और आस्ट्रेलिया में भी इस संक्रमण के चिह्न पाए गए, जिनसे 2003 में 6 महीनों की अवधि में 8000 से अधिक लोग संक्रमित हुये और 800 से अधिक काल कालवित। 

MERS-CoV नाम का दूसरा कोरोनावायरस चमगादड़ से ऊंट में आया और फिर इसने इंसानों को संक्रमित किया।

2012 में सऊदी अरब में शुरू होकर यह रोग 24 देशों में फैल गया जिससे  लगभग 2500 लोग संक्रमित हुये और लगभग 850 मारे गए। 2009 में SARS और MERS के बीच एक और ‘फ्लू महामारी’ हुई थी जिसे वायरस H1N1 कहा जाता है। ‘फ्लू के इस प्रकोप का कारण सूअरों, पक्षियों और मनुष्यों के वायरस का एक संयोजन था।  विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे जून 2009 में महामारी घोषित किया था और यह अगस्त 2010 तक चला। इसके 15 लाख से अधिक मामले प्रयोगशालाओं द्वारा संपुष्ट किए गए तथा  कारण 18 हजार से अधिक मौतें हुईं। 

संभवत: इसी पृष्टभूमि में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माइक्रोबायोलॉजिस्ट, प्राणी विज्ञानी तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ को मिलाकर एक सलाहकार समूह की स्थापना की। फरवरी 2018 में इस समूह की बैठक हुई। 

उनका उद्देश्य ऐसे खतरनाक वायरसों की प्राथमिकता सूची तैयार करने का था, जिसके खिलाफ कोई ज्ञात दवा या वैक्सीन विकसित नहीं हुई है। तैयार की गई सूची में SARS, MERS के साथ-साथ “रोग X” भी शामिल था – एक ऐसी बीमारी जो किसी अज्ञात वायरस  या ज्ञात वायरस के किसी प्रारूप के कारण हो सकती है।

दिलचस्प है कि एक ऐसी महामारी जिसका आगमन अपरिहार्य था, उसके लिए कोविड-19 के आगमन तक कोई निवारक कार्रवाई नहीं की गई। पीटर दासज़क, जो नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन में माइक्रोबियल थ्रेट्स फोरम के अध्यक्ष  और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सलाहकार समूह के सदस्य हैं, कहते हैं कि “रोकथाम बहुत संभव थी,  लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। सरकारों ने सोचा कि यह बहुत महंगा है। जबकि फ़ार्मास्यूटिकल कंपनियां लाभ के लिए काम करती हैं”।

यह बयान संक्षेप में बताता है कि स्व-सेवारत राजनीति के तहत एक मुक्त-बाजार विचारधारा कैसे चलती है। किस तरह किसी नवाचार को लाभ कमाने की मशीन की तरह बेचा जा सकता है, भले ही समाज को गहरी और स्थायी क्षति पहुंचे। यह एक विचारधारा है जो विज्ञान का उपयोग प्रसिद्धि और लाभ के लिए करती है। यह नवाचारों को वितरित करने में मदद नहीं करती जिससे कि  जीवन-रक्षा हो सके और जनता की भलाई हो।

हाल में और दूर अतीत में भी बड़ी दवा कंपनियों द्वारा अनैतिक कार्यप्रणाली के अनेक प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध हैं।  

केवल पिछले एक दशक में फाइजर, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, मर्क, एली लिली आदि कंपनियों ने अपने गलत कारनामों के लिए अमेरिकी अदालतों में सामूहिक जुर्माना के रूप से औसतन 10 बिलियन डॉलर का भुगतान किया है। जबकि SARS या MERS या यहां तक ​​कि COVID -19 के खिलाफ एक निवारक टीका अथवा एक नई दवा के आविष्कार और विकास में होनेवाला खर्च, जुर्माना के रूप में उनके किए गए भुगतान का पांचवां हिस्सा या उनसे भी कम होता। सार्स वायरस की पहली प्रोटीन संरचना 2003 तक सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध थी। यानी एक वैक्सीन या एक दवा विकसित करने के लिए कोई रॉयल्टी देने की भी ज़रूरत नहीं थी।

प्रारंभ में विश्व के सबसे अमीर देशों में से पांच COVID-19 से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस और जर्मनी, जहां लगभग दो तिहाई संक्रमण और मौतें हुईं। इन देशों की सरकारें अपने उपलब्ध विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा पर्यावरणीय विज्ञान का उपयोग कर निवारक उपायों को विकसित कर सकती थीं। उचित नियमों तथा प्रोत्साहन के द्वारा वे  इस काम में दवा उद्योगों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकती थीं। जैसा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी कनाडा द्वारा पहले ‘इबोला वैक्सीन कार्यक्रम’ सफलतापूर्वक  विकसित किया गया और फिर बाद में मर्क द्वारा उसका व्यवसायीकरण किया गया था।

राजनीतिज्ञों का ध्यान तो हमेशा की तरह जनता के कल्याण के बजाए सत्ता पाने अथवा सत्ता में बने रहने पर ही केन्द्रित रहा।

एक महामारी के खिलाफ अभी तक कोई निवारक उपाय अथवा आपातकालीन स्थिति के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण आदि पर कम ही ध्यान दिया गया।  ब्रिटेन सरकार के एक पूर्व-मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के शब्दों में: “मुझे याद है कि इन्फ्लूएंजा महामारी के लिए एक अभ्यास चलाया गया था, जिसमें लगभग 200,000 लोग मारे गए … लेकिन हमने उससे जो सबक सीखा, उसे कभी भी आवश्यक रूप से लागू नहीं किया”।

सारे अमेरिका और यूरोप में  सुरक्षात्मक उपकरणों तथा आईसीयू बेड की संख्या बढ़ते रोगियों की जरूरत को पूरा करने में कम पड़ गई। इसने महामारी के प्रसार में महत्वपूर्ण और घातक योगदान किया। OECD के अन्य विकसित देशों की अपेक्षा इटली में यह औसत के आधे से थोड़ा अधिक था। अमेरिका के ढेर सारे नर्सिंग होम और दीर्घकालिक देखभाल सुविधा केन्द्रों में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और परीक्षण सुविधाओं की भारी कमी थी, जिससे नागरिकों और अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य-कर्मियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर संकट आया। मई के प्रारम्भ तक अमेरिका के कुल घातक परिणामों का एक चौथाई इन्हीं संस्थानों में से था।

महामारी से पहले ही मामलों को सही परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, स्वतंत्र नीति निर्माताओं द्वारा 11 देशों, जैसे अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, चीन, ब्रिटेन, जर्मनी आदि की स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर तुलनात्मक अध्ययन किए गए थे। तुलना और रैंकिंग कई मानदंडों पर की गई थी जैसे –  स्वास्थ्य-बीमा कवरेज, अस्पतालों में स्टाफ का स्तर, दवाओं की कीमतें आदि। अमेरिका का स्थान इस सूची में सबसे नीचे था, चीन के ठीक ऊपर। भारत को इस अध्ययन में जगह नहीं मिली। हालाँकि, विश्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग दो दशक –  यूपीए के 10 साल और एनडीए के 7 साल, भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय में मात्र 33% की वृद्धि हुई। जबकि इसके विपरीत अन्य तीन ब्रिक देशों, ब्राजील, रूस और चीन में यह लगभग दो से तीन गुना बढ़ गया। 

कोई बीमारी एक अनियंत्रित महामारी बन जाती है जब संक्रमण तेजी से बढ़ता है और घातीय वृद्धि से थोड़े समय में कई राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर लेता है। घातीय वृद्धि का मतलब है कि बार-बार एक साधारण दोहराव के नियम से एक छोटी संख्या नियत समय में दोहरीकरण के कारण असाधारण रूप से बड़ी संख्या में बदल जाती है। सप्ताह में दोगुने होने की गति के हिसाब से  पांचवें महीने तक संक्रमण की संख्या 40 लाख होती है। यही मूल रूप से COVID-19 के साथ मध्य मई तक हुआ।

वुहान में 31 दिसंबर को वायरल निमोनिया के 27 मामलों की पुष्टि महज एक विशाल हिमशैल की चोटी की तरह थी। 23 जनवरी को वुहान में लॉक डाउन की घोषणा की गई थी। 30 जनवरी तक 22 अन्य देशों से प्रयोगशाला-पुष्टि की रिपोर्ट आ गई। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन  ने 40 दिनों बाद, 11 मार्च को COVID-19 को वैश्विक स्वास्थ्य आपात घोषित किया। वैक्सीन, ड्रग्स और पर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में अधिकांश देशों ने “कठोरता के विभिन्न स्तरों के साथ” सदियों पुराने “लॉकडाउन” का अनुसरण किया। भारत सरकार ने 24 मार्च की मध्यरात्रि से “राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम” को लागू किया। राजनेताओं की इस प्रतिक्रिया के अतिरेक को एक वैकल्पिक परिदृश्य में देखा जाना चाहिए, जहाँ अमीर देशों के बजाय दुनिया के विकासशील देशों में मौतें होती रहती हैं। आखिर दुनिया के सबसे गरीब हिस्सों में मलेरिया, तपेदिक और एचआईवी से सामूहिक रूप में हर साल और 2009 में 25 लाख से अधिक लोगों की मौतें हुई। H1N1 महामारी का आंकड़ा लगभग पचास लाख था।

आणविक स्तर की आनुवंशिकी और सतह प्रोटीन के विवरणों का पता लगाना अथवा नए वायरस SARS-CoV-2 का नामकरण करना तो वैज्ञानिकों की चुनौतियों का सबसे आसान हिस्सा था। त्वरित और उचित रूप से विश्वसनीय परीक्षणों के विकसित होने में समय लगा, क्योंकि यहां तक ​​कि “रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (RT-PCR) “परीक्षण के भी गलत और झूठे पॉज़िटिव रिपोर्ट पाये गए। विलंब इतना हुआ कि मई के अंत तक विश्वसनीय परीक्षण और उनके व्यापक कार्यान्वयन के अभाव में लोगों में भ्रम, आतंक और गलत सूचनाओं का विस्फोट हुआ। आज भी कोविड-19 के जो-जो भी सांख्यिकी डेटा उपलब्ध हैं उनमें प्रारम्भिक भूलें हैं।

महामारी विज्ञान के अध्ययन में सांख्यिकीय डेटा के आधार पर कंप्यूटर आधारित प्रतिरूपण एवं अनुकरण किए जाते हैं।  अत: सभी प्रतिरूपण अभ्यासों की तरह, यदि मूल धारणाएं और डेटा ही दोषपूर्ण हों, तो जाहिर है, परिणाम भी गलत ही आएंगे। जैसा कि H1N1 महामारी के बाद हुआ कि कई आधिकारिक संख्याओं पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए। अध्ययन बताते हैं कि आधिकारिक तौर पर पुष्टि की गई मृत्यु की संख्या से कहीं अधिक लोग, दुनिया के कम विकसित भागों में मौत के शिकार हुए। निश्चित ही COVID-19 के डेटा और उनकी व्याख्याओं को भी काफी संशोधित करना होगा। क्योंकि यह तो स्पष्ट है कि वे गरीब लोग ही होंगे जिन्हें इससे उत्पन्न आर्थिक मंदी, बीमारी और मृत्यु का सामना करना होगा। अनुमान बताते हैं कि 10 या 20 करोड़ से अधिक लोग गरीब हो जाएंगे, जिसका अधिकांश नाइजीरिया, भारत और कांगो गणराज्य जैसे देशों से होगा। संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का अनुमान है कि महामारी के कारण भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के लगभग 40 करोड़ श्रमिक गहरे गरीबी में डूब सकते हैं।

COVID-19 के विरुद्ध हमारी तैयारी की कमी यह बताती है कि कैसे दशकों से एक विचारधारा ने महत्वपूर्ण लोगों और मुनाफाखोरों को संबल दिया है। इसी विचारधारा ने उस विज्ञान को भी अप्रासंगिक बना दिया है, जो नवाचारों द्वारा सामाजिक कल्याण के लिए बने हैं। पिछले ढाई दशकों से उदार आर्थिक सहायता के बावजूद, COVID-19 के प्रकोप आने पर उसके विरुद्ध प्रभावी ढंग से लड़ने के लिए न तो “जैव प्रौद्योगिकी” ने और न ही “नैनो तकनीक” ने कोई वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत किया। हाँ, धन कमाने के लिए वैक्सीन विकसित करने के नाम पर अंतरराष्ट्रीय सौदों की होड़ शुरू हो चुकी है। हम केवल इतनी ही उम्मीद कर सकते हैं कि धन-लाभ-लोभ की इस अथक दौड़ के बीच उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा से समझौता नहीं हो।

सुमित भादुड़ी

अनुवाद : शैलेंद्र राकेश 

Hindi Translation of “The 2020 PPP: Profit, Politics , and Pandemic” By Sumit Bhaduri

[लेखक सुमित भादुड़ी की गिनती भारत के प्रमुख रसायनशास्त्रियों में होती है। रासायनिक विज्ञान में उनके योगदान के लिए उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च भारतीय पुरस्कारों में से एक, शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1992) से सम्मानित किया जा चुका है। जबकि इस लेख के अनुवादक शैलेंद्र राकेश चिकित्सक एवं साहित्यिक पत्रिका किरण वार्ता के संपादक हैं]

नोट्स


[1]
 J. Srinivasan, CURRENT SCIENCE, VOL. 118, NO. 8, 25 APRIL 2020, 1147.

[2] “Epidemics and Society: From the Black Death to the Present” by FRANK M. SNOWDEN Yale University Press, 2019; “Pale Rider: The Spanish Flu of 1918 and How it Changed the World” by LAURA SPINNEY Jonathan Cape , London, 2017.

[3] Jennifer Kahn, New York Times, April 26, 2020

[4] S Bhaduri, CURRENT SCIENCE, VOL. 113, NO. 1, 10 JULY 2017

[5] Goldacre, B., Bad Pharma: How Drug Companies Mislead Doctors and Harm Patients, Faber & Faber Inc, New York, USA, 2012; Posner, G., “Pharma Greed, Lies and the Poisoning of America”, Simon and Schuster, New York, 2020.

[6] Steven M. Paul, Daniel S. Mytelka, Christopher T. Dunwiddie, Charles C. Persinger, Bernard H. Munos, Stacy R. Lindborg and Aaron L. Schacht, NATURE REVIEWS | Drug Discovery VOLUME 9 | MARCH 2010 | 203, doi:10.1038/nrd3078,

[7] S K Burley, Nature | Vol 580 | 9 April 2020 | 167.

[8] https://www.nytimes.com/2014/10/24/health/without-lucrative-market-potential-ebolavaccine-was-shelved-for-years.html

[9] Ian Boyd, Nature | Vol 580 | 9 April 2020

[10] https://www.nature.com/articles/d41586-020-01748-0 ; David Leonhardt and Yaryna Serkez, NY Times, April 19, 2020.

[11] Gayatri Saberwal, CURRENT SCIENCE, VOL. 119, NO. 1, 10 JULY 2020

[12] Smriti Mallapaty, Nature | Vol 580 | 30 April 2020, 571-572.

[13] https://www.nature.com/articles/d41586-020-02275-8

[14] https://www.thelancet.com/journals/laninf/article/PIIS1473-3099(12)70121-4/fulltext

[15] https://www.nature.com/articles/d41586-020-02497-w?

[16] https://www.cenfa.org/international-finance-institutions/the-corona-pandemic-debt-anddefault/

[17] Sumit Bhaduri, CURRENT SCIENCE, VOL. 118, NO. 1, 10 JANUARY 2020.  

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