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Purnendu Mukhopadhyay's tribute meeting

बंग्ला व हिंदी के प्रति सेतु की तरह थे पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय – अरुण कमल

प्रगतिशील लेखक संघ ने आयोजित की पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय की श्रद्धाजंलि सभा

पटना, 8 फरवरी। चर्चित बंग्ला कवि, लेखक व आलोचक पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन (Purnendu Mukhopadhyay’s tribute meeting organized) मैत्री शांति भवन, बी.एम.दास रॉड में आयोजित किया गया। प्रगतिशील लेखक संघ, पटना द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकार, रँगकर्मी, बुद्धिजीवी व सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

बंग्ला के प्रख्यात कवि थे पूर्णेन्दु मुखर्जी

अरुण कमल ने अपने संबोधन में कहा

“पूर्णेन्दु मुखर्जी बंग्ला के प्रख्यात कवि थे। प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वाधान में कार्य करते रहे। उन्होंने हिंदी में कई लेख लिखे। जनशक्ति, उत्तरशती आदि पत्रिकाओं में। कई आयोजन भी किये। उनकी बंगला संग्रह का इसी मैत्री शांति में लोकार्पण हुआ। उस वक्त लेखकों के बीच बहुत भाईचारा था। अब थोड़ा कम हो गया है। उर्दू, बंगला के कई लेखक कवि भी आये थे। पूर्णन्दू बाबू का दूसरी लोकभाषाओं आए सम्पर्क हुआ। वे भागलपुर कैंप जेल में एक महीना वे रहे। शिक्षक आंदोलन में। वार्ड नं 16 में वे थे। एक बार पगली घण्टी भी बजी थी। उन्हें जॉन्डिस हो गया था। उन्हें कैंप जेल में उन्हें रखा गया था। वहीं उन्हें पानी चढ़ाया गया। जेल में ही एक कैदी ने उन्हें पानी चढ़ाया। एक महीने बाद वो घर आये। वे हमेशा सीपीआई, सीपीएम, एस. यू.सी.आई जैसी पार्टियों यानी कम्युनिस्टों के सम्पर्क में रहे। बंगला समिति में काम करते हुए चाहते तो थोड़ा सा समझौता करने पर सारी सुविधाएं मिल सकती थी। अपने काम को लेकर खुश रहा करते थे। इधर कुछ वर्षों से बेटे के पास कोलकाता रहा करते थे। प्रगतिशील लेखक संघ, पटना के निर्माण में उनका बहुत बड़ा योगदान था। सबमें कुछ न कुछ प्रतिभा होती है इसका उन्हें ख्याल था।”

अरुण कमल ने आगे बताया

प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से सुभाष मुखोपाध्याय, अमिताभ दास, नागार्जुन जैसे कवियों का टिकट लगाकर आई.एम.ए के ऊपर वाले हॉल में काव्य पाठ आयोजित किया करते थे। और उसमें काफी भीड़ भी हुआ करती थी।”

एस.यू.सी.आई ( कम्युनिस्ट) की साधना मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा

“मैं प्रेमचंद-शरतचंद कमिटी की ओर से उन्हें श्रद्धाजंलि प्रकट करती हूं। कोलकाता जाने के बाद भी उनसे अक्सर वहां मुलाकात हो जाती थी। 3 फरवरी को उनका हार्ट अटैक हुआ था। उससे कुछ ही दिनों पूर्व उनसे बात हुई थी। उस दौरान भी चर्चा किया करते कि मैं लिख रहा हूँ और साझा करूंगा। उनकी तबीयत खराब थी। अंतिम समय में भी कोशिश किये कि साहित्य को आगे ले जाने में जिन लोगों की भूमिका रही है उसके प्रति सरोकार रखा करते थे। वे थोड़ा झुककर चला करते थे। कोरोना से बचने के लिए आसनसोल गए। वर्तमान परिस्थितियों का लगातार अध्ययन करते रहे थे। प्रेमचंद-शरतचंद समिति के वो अंतिम अध्यक्ष थे। प्रेमचंद को लोग जानते हैं लेकिन शरतचंद को लोग थोड़ा कम जानते थे। उसके बारे में गहराई से उन्होंने बताया। प्रलेस की ओर से कई जिलों में गए थे। हमारी स्मारिका में उनके कुछ लेख हैं उसको प्रकाशित करेंगे। वर्तमान व्यवस्था के आधार पर साहित्य कितना मूल्यवान है इसके आधार पर मूल्यांकन किया करते थे।”

निकोलाई शर्मा ने पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय को याद करते हुए कहा

“उनसे हमेशा मुलाकात होती थी। वे हमेशा समयानुकूल विषयों का चुनाव किया करते थे।”

इंजीनियर सुनील ने अपने संबोधन में कहा

“पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय के बारे में पढ़ते हुए ये जाना कि 50-60 के दशक के दौर का उनके ऊपर असर था। दुनिया में लड़ाई चल रही थी उसके बारे में उनका जिक्र है। भाषा के रूप में इनकी चिंता बंगला साहित्य का था। इस शहर में बंगाली समुदाय के एक से एक प्रगतिशील लोग उभर कर आये। बंगाल के रेनेसां काल का जो असर था। रवींद्र नाथ टैगोर का साइंस से लेकर साहित्य तक काम किया। पूर्णेन्दु जी आलेख से ही हम उनके बारे में जान पाए। कैसे शांति निकेतन में नृत्य की शुरुआत की।”

प्रगतिशील लेखक संघ के उपमहासचिव अनीश अंकुर ने श्रद्धाजंलि सभा को संबोधित करते हुए कहा

“1999 में हम लोगों ने प्रख्यात अमेरिकी जनगायक पॉल रॉबसन की जन्मशताब्दी के वर्ष पर आयोजित किया गया था। पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय ने उसमें बताया था कि पॉल रॉबसन का प्रसिद्ध गीत ‘ओल्ड मैन रिवर’ के आधार पर उन्होंने ‘ गंगा तुम बहती हो क्यों !’ का धुन तैयार किया था। वे कहा करते थे ‘संहति ओ समन्वय’ यानी अपनी अपने भाषाभाषी के साथ एकता तथा दूसरी भाषाओं के प्रति समन्वय। हिंदी व बंगला के बीच सेतु थे। वामपन्थियों के साथ उनके रिश्ते हमेशा अच्छे थे। साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष जैसे वियतनाम, क्यूबा से प्रेरणा लेने की बात किया करते थे।”

सीपीआई के पटना जिला सचिव रामलला सिंह ने बताया

“1972 में पटना कॉलेज में आया। वे उस वक्त बी एन कॉलेज में बंगला के टीचर रहे थे। अभी जो समय है व्यवस्था विरोधी संघर्ष तेज हो रहा है। ऐसे में साहित्यकार क्या करेंगे ये सोचना है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ही प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी। आज जो संकट का दौर है उसमें इस संगठन को बड़ी से बड़ी पहलक़दमी लेनी है।”

श्रद्धाजंलि सभा को इसकफ के राज्य महासचिव रवीन्द्र नाथ राय ने भी संबोधित किया।

श्रद्धाजंलि सभा में शहर के बुद्धिजीवी मौजूद थे। प्रमुख लोगों में थे  देवरत्न प्रसाद, अनिल शर्मा, सुनील जी, मनोज कुमार, अशोक कुमार सिन्हा,  कपिलदेव वर्मा आदि।

Progressive Writers Association organized Purnendu Mukhopadhyay’s tribute meeting

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