लालू प्रसाद यादव की राजनीति और भ्रष्टाचार का प्रश्न

लालू प्रसाद यादव की राजनीति और भ्रष्टाचार का प्रश्न

Question of Lalu Prasad Yadav’s politics and corruption

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (Former Bihar Chief Minister Lalu Prasad Yadav) को फिर से जेल की सजा हुई है। रांची की एक अदालत ने उन्हें ‘चारा घोटाले’ का दोषी पाया है।

सत्ताधारी कैसे न्याय की हत्या करते हैं?

वैसे लालू यादव एक ही प्रकार के ‘अपराध’ के लिए इतनी सजाएं भुगत रहे हैं, वो केवल उदाहरण है कि सत्ताधारी कैसे आपको फँसाते हैं और न्याय की हत्या करते हैं।

अपनी विशिष्ट भाषा शैली और जनता से जुड़ कर काम करने वाले लालू यादव भारत की राजनीति में सबसे प्रभावित करने वाली शख्सियत मानी जा सकती है। लालू यादव पर चारा घोटाले के संदर्भ में पाँच अलग-अलग अदालतों में मामले लंबित थे और सभी में फैसला आ चुका है।

डोरंडा ट्रेजरी से 139.5 करोड़ के अवैध निकासी के संबंध में उन्हें पाँच वर्ष के कारावास की सजा हुई और साठ लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया। पांचों मामलों में उनकी कुल सजा साढ़े बत्तीस वर्ष की है। हालांकि चार मामलों में उन्हें जमानत मिल चुकी है और शायद स्वास्थ्य के हवाले से इसमें भी जमानत मिल जाएगी लेकिन लालू प्रसाद यादव अब राजनीति में अपनी पार्टी के जरिए ही प्रभावित कर पाएंगे। उनकी राजनीति में पकड़ बनी रहेगी लेकिन सत्ता पर सीधे पकड़ नहीं रह पाएगी।

लालू प्रसाद यादव का सियासी सफरनामा

लालू यादव ने 2 दिसंबर 1989 को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उसके बाद अपनी कार्यशैली के लिए बिहार के सवर्णवादी वर्चस्ववादी मीडिया की नज़रों में खटकने लगे। उनका चरवाहा विद्यालय एक बिल्कुल नया कन्सेप्ट था जो अति दलित-अति पिछड़ी जाति के बच्चों के जीवन में बदलाव ला सकता था। गाँव के गरीब दलित पिछड़े वर्ग के लोगों से उनके सीधे संपर्क के चलते लोगों में एक नई आशा का संचार हुआ।

जनता दल की अंदरूनी राजनीति में लालू यादव ने अपने आप को पूरी तरह से तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ रखा। 7 अगस्त 1990 को संसद में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मण्डल आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की घोषणा की तो पार्टी दो फाड़ हो गई। चंद्रशेखर, देवीलाल, मुलायम सिंह यादव, यशवंत सिन्हा आदि लोग दूसरी ओर खड़े थे, लेकिन लालू यादव ने न केवल उस दौर में सामाजिक न्याय की शक्तियों को ताकत दी अपितु 23 सितंबर 1990 को भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा को समस्तीपुर में रोक दिया और उन्हें गिरफ्तार कर दिया। इसके नतीजे में विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार अल्पमत में आ गई और फिर चंद्रशेखर के नेतृत्व में दूसरे धडे ने समाजवादी जनता पार्टी बनाकर काँग्रेस की मदद से नई सरकार बनाई।

मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में काँग्रेस के सहयोग से चली जबकि लालू यादव जनता दल पार्टी के साथ जुड़े रहे।

मुलायम के ‘हिन्दी प्रेम’ के ठीक उलट लालू यादव ने सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने को अनिवार्य किया ताकि गरीब बच्चे भी अंग्रेजी सीख सकें और आगे बढ़ सकें।

लालू प्रसाद यादव जनता दल में विश्वनाथ प्रताप के नजदीकी बने रहे, लेकिन धीरे धीरे जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने स्वास्थ्य के कारण दलगत राजनीतिक मसलों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया तो जनता दल में बहुत से धड़े उसकी कमान संभालना चाहते थे।

चारा घोटाले का इतिहास

1990-1995 के बीच में बिहार में चारा घोटाले की खबर आई और पशुपालन विभाग के खातों से अलग-अलग ट्रेजरी से करीब 950 करोड़ रुपये निकालने की खबरें आईं और ऐसी कंपनियों के नाम थे, जो केवल कागजों पर थीं।

घटना पर राजनीतिक दवाब के चलते लालू यादव ने इसकी जांच के आदेश दिए। ये वह समय था जब वह दोबारा मुख्यमंत्री बन कर आए थे, लेकिन इस सवाल पर उनके विरोधियों ने पटना हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर दी थी, जिसके मार्च 1996 के एक निर्णय के फलस्वरूप केस सीबीआई को चला गया।

जून 1997 में जब सीबीआई ने चार्जशीट दायर की तो लालू यादव को एक आरोपी बनाया गया। उसके चलते व्यापक राजनीतिक दवाब में उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया।

उस समय लालू बहुत ताकतवर थे लेकिन उनकी पार्टी जनता दल में उनके नेतृत्व को लेकर बहुत विरोध था। 30 जुलाई 1997 को उन्हें न्यायालय में आत्म समर्पण किया, लेकिन सीबीआई उस समय सेना तक की मदद लेने की कोशिश की क्योंकि बिहार पुलिस कुछ नहीं कर पा रही थी और लालू एक शक्तिशाली राजनेता थे जिन्हें इतनी आसानी से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।

यदि उत्तर भारत की राजनीति में लालू सफल हो जाते तो !

उत्तर भारत की राजनीति में यदि लालू सफल हो जाते तो बहुत बड़े बदलाव को जन्म दे सकते थे लेकिन जनता दल के अति महत्वाकांक्षी लोगों की राजनीति के चलते उन्हें फँसाया गया। अभी हम ये कह सकते हैं कि भाजपा और सवर्ण लॉबी ने उनके एक ही केस के कई मामले बना अलग-अलग अदालतों में उन्हें फँसाया, जो बेहद छोटे दर्जे की राजनीति है।

एक ही मामले के लिए उन्हें अलग-अलग जिलों में आरोपित कर उनको राजनैतिक तौर पर मारने का षड्यन्त्र किया गया लेकिन इसमें सभी दोषी थे।

हकीकत ये है, घोटाला लालू यादव के शासन में आने से पहले से चल रहा था और इसीलिए जगन्नाथ मिश्र भी इसमें एक आरोपी थे लेकिन वह छूट गए।

लालू यादव के विरुद्ध केस को ‘मजबूती’ से करने के लिए यू सी विश्वास नामक अधिकारी का इस्तेमाल किया गया। पूरे मामले को बिना केन्द्रीय नेतृत्व की अनुमति के संभव नहीं था। तत्कालीन प्रधानमंत्री देवेगौड़ा जानते थे कि लालू यादव बहुत सशक्त हैं और वह प्रधानमंत्री पद की चाहत भी रखते हैं, इसलिए लालू को नियंत्रण करने के लिए कोर्ट के नाम पर सारे काम किए गए।

लालू यादव चाहते थे कि देवेगोड़ा उनके विरुद्ध जांच को कम करें और यू सी विश्वास को सीबीआई के क्षेत्रीय ब्यूरो से स्थानांतरित कर दें।

लालू की मुश्किल इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि विश्वास दलित वर्ग से आते थे और बहुत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते थे इसलिए उन्हें इस संदर्भ में राजनीति करने का अवसर नहीं मिला। यूं कह सकते हैं कि देवेगोड़ा ने उनसे बड़ी राजनीति की।

दैनिक भास्कर में छपे पत्रकार संकर्षण ठाकुर की पुस्तक ‘द मैकिंग ऑफ लालू यादव’ के हवाले से लिखा है : ‘तत्कालीन जनता दल के अध्यक्ष लालू और PM देवगौड़ा के बीच तीखी बहस हुई। लालू ने कहा था- का जी देवगौड़ा, इसीलिए तुमको PM बनाया था कि तुम हमारे खिलाफ केस तैयार करो? बहुत गलती किया तुमको PM बना के।’

लालू यादव ने देवगौड़ा के आधिकारिक 7 रेस कोर्स निवास पर घुसते हुए ये टिप्पणी की। देवगौड़ा ने भी वैसा ही जवाब दिया था, ‘भारत सरकार और CBI कोई जनता दल नहीं है कि भैंस की तरह इधर-उधर हांक दिया। आप पार्टी को भैंस की तरह चलाते हैं, लेकिन मैं भारत सरकार चलाता हूं।’

हालांकि इस बातचीत का कोई पुख्ता सबूत नहीं है लेकिन राजनीति के गलियारों में नेताओं के जरिए ये खबरें पत्रकारों तक पहुँचती थीं।

उस दौर को नजदीकी से जानने के कारण मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जनता दल में कर्नाटक की लॉबी ने

 लालू का पार्टी में दबदबा खत्म करने के लिए ये कोशिश की। लालू प्रसाद की रामकृष्ण हेगड़े के साथ भी नहीं बनी क्योंकि हेगड़े जैसे लोग भी सामाजिक न्याय की राजनीति के विरोधी रहे। देवेगोड़ा कभी भी सामाजिक न्याय आंदोलन के सिपाही नहीं रहे और सभी अपनी अपनी राजनीति कर रहे थे। सीबीआई केस के चलते लालू पर शिकंजा तगड़ा होता चला गया जिसे उन्होंने अपनी ‘जनशक्ति’ के चलते रोकने के प्रयास किए लेकिन बिहार में नीतीश और रामविलास ने उनके विरोध की मुहीम को हवा दी। सभी नेताओं की अपनी- अपनी शिकायतें थीं।

लालू यादव को बिहार में यादव मुस्लिम समीकरण पर जरूरत से ज्यादा भरोसा था और इसके चलते उन्होंने किसी की नहीं सुनी। नीतीश कुमार और राम विलास पासवान ने जब अलग-अलग जातियों का ध्रुवीकरण कर दिया तो राजद की राजनीति को नुकसान पहुंचा हालांकि लालू यादव अकेले दम पर एक ताकतवर नेता बने रहे लेकिन ये अकेली ताकत उन्हें सत्ता में नहीं ला पाई।

लालू यादव की गलती क्या है?

लालू यादव की गलती उतनी है जितनी आमतौर पर राजनेताओं की होती है जब वे सत्ता में होते हैं, तो अत्यंत आत्मविश्वासी हो जाते हैं और फिर वो किसी भी प्रोटोकॉल आदि को नहीं मानते। लालू यादव बहुत मुश्किल और मेहनत के बल पर आगे आए थे लेकिन सत्ता के समय उन्हें भी अहंकार था कि उनके बिना सत्ता चल नहीं सकती। एच. डी. देवेगौड़ा भी कोई कागजी शेर नहीं थे ओर कर्नाटक में उन्होंने अपने दम पर जनता दल को खड़ा किया था इसलिए ये उम्मीद करना कि प्रधानमंत्री उनकी किसी भी बात को नहीं टाल सकेंगे गलत था।

बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र भी इसमें आरोपित थे लेकिन बाद में उन्हें साक्ष्यों के अभाव में छोड़ दिया गया। रिहा होने के बाद, अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्स्प्रेस को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि लालू प्रसाद यादव को बीजेपी ने नहीं अपितु देवेगौड़ा ने फँसाया।

एच. डी. देवेगौड़ा की सरकार गिरने के बाद इन्द्र कुमार गुजराल को भी ऐसे ही हाँकने की कोशिश की गई। हालांकि लालू यादव चाहते थे कि सीबीआई के डायरेक्टर जोगिंदर सिंह, जो कर्नाटक कैडर के थे, इसकी जांच करें लेकिन हकीकत ये है एच. डी. देवेगौड़ा ये समझ गए कि लालू उनको ह्यूमिलीऐट कर रहे हैं और उन्होंने उनकी सरकार बचाने की कोई कोशिश नहीं की। इसलिए जब इन्द्र कुमार गुजराल की सरकार आई तो भी जोगिंदर सिंह ने लालू प्रसाद यादव के विरुद्ध अपनी कार्यवाही जारी रखी और यू के विश्वास को लगातार आगे किए रहे। क्योंकि इंदर गुजराल की सरकार लालू जी के समर्थन पर चल रही थी इसलिए जोगिंदर सिंह को सीबीआई से ट्रांसफर कर दिया गया, हालांकि विश्वास के ट्रांसफर पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

गुजराल के प्रति लालू यादव का विशेष सहयोग रहा और उन्होंने गुजराल को पहले पटना से चुनाव लड़वाया लेकिन उसके स्थगित होने के कारण फिर बिहार से ही इंदर कुमार गुजराल को राज्य सभा में भिजवाया।

गुजराल हालांकि लालू प्रसाद यादव के नजदीकी थे लेकिन हकीकत यह है कि वह कोई मंडलवादी नहीं थे और उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य के लिए लालू प्रसाद यादव पर निर्भर रहना था।

हालांकि लालू प्रसाद यादव का शासन गरीब लोगों के लिए अच्छा था लेकिन विपक्षियों ने उन पर ये आरोप लगाए कि वह ‘जातिवादी’ हैं और ‘यादववाद’ फैला रहे हैं। भूमिहार, कायस्थ, ब्राह्मणों की लॉबी ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

केंद्र में सीबीआई के निदेशक जोगिंदर सिंह थे। जब लालू यादव को पहली बार 30 जुलाई 1997 को जेल जाना पड़ा तो उन्हें पार्टी के अंदर अलग-थलग कर दिया गया था। बिहार में पार्टी उनकी अपनी जेब की पार्टी थी और इसलिए जेल जाने से पहले ही उन्होंने 5 जुलाई 1997 को जनता दल पार्टी से अलग हटकर राष्ट्रीय जनता दल की स्थापना कर दी।

अटल विहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के समय भी उनके विरोधी सक्रिय हो चुके थे। राम विलास पासवान और नीतीश कुमार उनसे राजनीतिक तौर पर नहीं लड़ पा रहे थे इसलिए दोनों ने भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया और अपने जीवन पर्यंत ‘धरनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ के सिद्धांतों को गर्त में फेंक दिया।

नीतीश जानते थे कि उनका बिहार के मुख्यमंत्री बनने का सपना लालू यादव के मजबूत रहते कभी पूरा नहीं हो पाएगा और इसलिए उनका सवर्णों के साथ गठबंधन जरूरी था और इसमें उन्हें बिहार के भूमिहार, ब्राह्मणों और कायस्थों ने पूरा सहयोग किया। लेकिन तब भी वे सब मिलकर लालू यादव को बिहार से नहीं मिटा पाए। लेकिन अतिआत्मविश्वास और यह धारणा कि किसी भी प्रकार से किसी को भी गद्दी पर बैठा देंगे तो लाभ होगा, बार-बार सफल नहीं होता।

जब लालू प्रसाद यादव ने अपने जेल जाने की स्थिति में श्रीमती राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया, जिनका राजनीतिक अनुभव बिल्कुल शून्य था, तो ऐसे में सत्ता के दलाल हावी हो जाते हैं।

2004 में यूपीए की सरकार आई तो लालू यादव केन्द्रीय रेलमंत्री बने 2009 तक वह इस पद पर बने रहे। उनके रेल बजट की बहुत तारीफ हुई, क्योंकि उन्होंने यात्री किराया बढ़ाने से मना कर दिया था और रेलवे को लाभ की स्थिति में ले आए थे।

2009 में लालू यादव ने यूपीए से नाता तोड़ बिहार में राम विलास पासवान और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया लेकिन उनकी पार्टी बुरी तरह से चुनाव हार गई और मात्र 4 सांसदों के साथ लोक सभा में आई।

2014 में आरजेडी ने पुनः यूपीए के साथ गठबंधन किया लेकिन उसका परिणाम भी बहुत अच्छा नहीं रहा।

इस बीच बिहार में नीतीश कुमार के एनडीए के साथ आने के कारण उनकी स्थिति बहुत मजबूत हो गई। 2015 में बिहार में लालू यादव ने नीतीश कुमार के साथ गठबंधन किया और 80 सीटों पर विजय प्राप्त की। नीतीश कुमार की जनता दल यू को 71 सीटें और काँग्रेस को 27 स्थानों पर विजय मिली। गठबंधन की सरकार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। लालू प्रसाद यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री पद पर मनोनीत करवा दिया। उन्हें बड़े बेटे तेज प्रताप को भी मंत्रिमंडल में रखा गया। लालू के परिवार को महत्वपूर्ण पद देने के चक्कर में नीतीश सरकार का भविष्य अधर में था और इसलिए जुलाई 2017 में नीतीश कुमार ने आरजेडी से गठबंधन तोड़ कर भाजपा के साथ समझौता किया और फिर सरकार बनाई।

2021 में राजद ने काँग्रेस और वामपंथी दलों के साथ चुनाव लड़ा लेकिन बहुमत नहीं प्राप्त कर सके और नीतीश कुमार पुनः बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।

लालू यादव को जेल

लालू प्रसाद यादव पहली बार जेल तो आपातकाल के दौरान गए थे लेकिन जेल से रिहा होने पर 1977 में संसद के लिए चुन लिए गए। चारा घोटाले के चलते वह पहली बार जेल जुलाई 1997 में गए और 137 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद 12 दिसंबर, 1997 को रिहा हुए। फिर उन्हें 28 अक्टूबर 1998 को बेउर जेल में भेजा गया। एक बार फिर 28 नवंबर 2000 को उन्हें फिर जेल भेजा गया लेकिन उनकी तुरंत ही जमानत हो गयी। लेकिन मुकदमें चलते रहे। केंद्र और बिहार में एनडीए की सरकार के बाद उनकी मुसीबतें बढ़ गईं।

लालू यादव पर अभी तक चार मुकदमों में सजा हुई है। उन्हें पहली सजा चाईबासा ट्रेजरी से अवैध तरीके से पैसा निकालने पर लगे आरोप पर 2013 में पाँच वर्षों की कैद की सजा हुई और उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी दलील खत्म कर दी, हालांकि उन्हें जमानत मिल गई।

दूसरे केस में उन्हें 23 दिसंबर 2017 को देवघर ट्रेजरी से करीब 90 लाख रूपये की अवैध निकासी के लिए साढ़े तीन वर्ष की सजा हुई। उनको तीसरी सजा, 24 जनवरी 2018 को चाईबासा ट्रेजरी से 33.67 करोड़ की अवैध निकासी पर पाँच साल की सजा हुई।

4 मार्च 2018 को दुमका ट्रेजरी से 3.13 करोड़ रुपाइए की निकासी पर 14 वर्षों की सजा सुनाई गई और 60 लाख रुपए का जुर्माना भी ठोका गया। अब पाँचवी सजा डरोंदा ट्रेजरी के 139 करोड़ रुपये के घोटाले के सिलसिले में है।

क्या लालू प्रसाद यादव को जानबूझकर फँसाया गया?

इसमें कोई शक नहीं कि 950 करोड़ रूपये से अधिक के घोटाले में पशुओं की फर्जी खरीद और फिर उनके लिए चारे के फर्जीवाड़ा हुआ और ये बिहार के कई जिलों में किया गया था। इसके लिए एक जांच कमिटी बैठाकर उसके आधार पर कार्यवाही की जा सकती थी, लेकिन जो सबसे बड़ी चालाकी या जानबूझकर परेशान करने वाली चाल थी वह थी अलग-अलग जगहों पर एफआईआर कर अलग-अलग मुकदमों में लालू यादव को फँसाया गया।

जब मामला एक ही तरह का है तो अलग-अलग मुकदमें क्यों ? ये बात हम सभी आज के दौर में समझ सकते हैं जब किसी भी व्यक्ति को परेशान करने के लिए देश के किसी भी हिस्से में मुकदमा दर्ज हो जाता है और कई मुकदमे दर्ज जो जाते हैं। क्योंकि लालू परिवार राजनैतिक तौर पर मजबूत है इसलिए वह लड़ाई लड़ सके नहीं तो अधिकांश लोग ऐसी लड़ाई लड़ नहीं सकते।

14 नवंबर 2014 को झारखंड उच्चन्यायालय के जज श्री राकेश रंजन प्रसाद ने कहा कि पूरा चारा घोटाला एक साजिश है और एक अपराध के लिए अलग-अलग सजाएं नहीं दी जा सकतीं। हालांकि जस्टिस प्रसाद ने पहले इसी मामले में कहा था कि अलग-अलग ट्रायल होने चाहिए क्योंकि उनके लाभार्थी अलग-अलग हैं।

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आ चुकी थी और उन्होंने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और जस्टिस अरुण मिश्र ने झारखंड हाई कोर्ट के निर्णय को न केवल उलट दिया, अपितु जस्टिस प्रसाद के विरुद्ध सख्त भाषा का इस्तेमाल भी किया।

बिहार भाजपा नेताओं ने जस्टिस प्रसाद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से उनके विरुद्ध कार्यवाही की मांग की।

ये बात किसी से छिपी नहीं है कि लालू भाजपा की राह के सबसे बड़ा रोड़ा थे। उन्होंने विपक्षी एकता के बहुत से प्रयास किए और यह उनकी राजनीति का ही नतीजा है कि भाजपा आज भी बिहार में स्वतंत्र रूप से मजबूत नहीं हो पाई है। भाजपा नेताओं को लालू से इतना भी था कि उन्होंने उनके अधिकांश मामलों की सुनवाई झारखंड करवा दी और रांची जेल में भी उनके साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की गई।

ये सभी जानते हैं कि लालू एक प्रमुख राजनैतिक व्यक्ति हैं और उनसे मिलने लोग आएंगे लेकिन उन्होंने हर बात को इस तरह से प्रस्तुत किया जैसे लालू यादव कोई अपराधी हों।

इतने बड़ा चारा घोटाला क्या कोई मुख्यमंत्री व्यक्तिगत तौर पर कर सकता है ? जब ये घटनाक्रम लालू यादव के पहले से से था तो क्यों दूसरे लोग इसकी चपेट में आए। अलग-अलग मुकदमों में लालू यादव को फंसा कर उनके राजनीतिक जीवन को लगभग समाप्त कर दिया।

लालू यादव अब शारीरिक तौर पर स्वस्थ नहीं हैं और ये साफ है कि वर्तमान सरकार ने उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर भी जमानत दिलवाने का विरोध किया। उनकी बेहद खराब सेहत के चलते उन्हें दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लाया गया था। उनके परिवार के बहुत अनुरोध पर बहुत मुश्किलों के बाद लालू यादव को जमानत मिली थी लेकिन अभी वह पुनः रांची जेल में हैं, क्योंकि अंतिम केस में भी उन्हें सजा हुई है।

राजनैतिक मतभेदों के चलते विरोधियों को खत्म करने की साजिश हमारी राजनीति का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन वर्तमान दौर में भाजपा ने इसका रंजिशन इस्तेमाल किया। देश में बड़े-बड़े घोटालों के बादशाह आराम से फ्रॉड करके चले जा रहे हैं।

काँग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कुछ दिनों पूर्व कहा था कि मोदी सरकार के समय 5 लाख 35000 करोड़ से ऊपर के बैंक घोटाले हो चुके हैं लेकिन अभी तक एक को सजा नहीं हुई।

गुजरात स्थित एबीजी शिपयार्ड और उसके निदेशक ऋषि कमलेश अग्रवाल पर 22,842 करोड़ का बैंक फ्रॉड का केस सीबीआई ने अभी दर्ज किया है इसमें 22 बाँकों का पैसा शामिल है।

गुजरात के ही बड़े व्यापारी मेहुल चौकसी पंजाब नैशनल बैंक को 14,000 करोड़ रुपए का चुना लगाकर अब विदेश में आराम की जिंदगी जी रहा है।

गुजरात के ही व्यापारी नीरव मोदी और उनकी फार्म गीतांजलि ज्वेलर्स पर तीस बैंकों के साथ 11,400 करोड़ रुपए का फ्रॉड करने का आरोप है। वह भी अपने परिवार सहित यूरोप में आलीशान जिंदगी जी रहा है।

शहंशाही जिंदगी जीने वाले विजय माल्या 10 हजार करोड़ के फ्रॉड के साथ लंदन में आनंद के साथ में है। राफेल से लेकर पीएम केयर फंड हो या भाजपा के पास अरबों का चन्दा और दिल्ली के दिल में स्थित फाइव स्टार बिल्डिंग कोई प्रश्न नहीं खड़े होते।

मोदी के आने के बाद, नोटबंदी के तुरंत आगे पीछे भाजपा ने उत्तर प्रदेश, बिहार और देश के अन्य हिस्सों के विभिन्न जिला मुख्यालयों में पार्टी के विशालकाय कार्यालय बनाए। अयोध्या में राम मंदिर के नाम पर उठे चंदे और उसके बाद जमीन के बड़े घोटालों की कोई चर्चा भी नहीं होती। हालांकि कोई भी भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं करता लेकिन दुर्भाग्यवश जातिवादी मीडिया को दलित पिछड़े आदिवासी नेताओं के छोटे भ्रष्टाचार बड़े नजर आते हैं।

राजनीति में भी लालू यादव हमेशा साधारण तरीके से ही रहे। नरेंद्र मोदी की तरह तड़क भड़क उनमें कभी नहीं थी। जयललिथा से लेकर जगन मोहन रेड्डी, प्रमोद महाजन, अमर सिंह, अरुण जैटली, आदि सभी के हाथ इतने बड़े थे कि कोई हाथ नहीं लगा पाया और सभी ‘ईमानदार’ भी बने रहे।

आज भी संसद में मौजूद बहुत से सांसदों के पास खरबों की संपति है लेकिन कोई सवाल नहीं। सवाल उठेंगे कैसे जब उन्हें उठाने वाले ही खुद भ्रष्टाचार के दलदल में हों।

आज के दौर के बहुत से चैनल मामूली पत्रकारों ने बनाए और आज वे खरबों के पैसे पर बैठे हैं। क्या ये बिना भ्रष्टाचार के संभव है ? इलैक्टोरल बॉन्ड में पैसे कौन दे रहा है इसके विषय में कुछ खबर नहीं है। लेकिन देश के ब्राह्मणवादी तंत्र के लिए लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती भ्रष्टाचार के प्रतीक हैं।

हर्षद मेहता खरबों रुपए डकार गया और अभी नैशनल स्टॉक एक्सचेंज की एक पूर्व निदेशक के विषय में खुलासा हुआ कि वह कोई भी निर्णय हिमालय में स्थित एक बाबा के कहने पर करती थी और सारी गुप्त जानकारी उनसे शेयर करती थी। क्या इस पर चर्चा हो रही है कि इतने खतरनाक खिलाड़ी कौन है।

सत्ताधारी पर्सेप्शन पर काम करते हैं। किसको ईमानदार बनाना है और किसे बेईमान दिखाना है, ये उनके हाथ में है।

लालू यादव उत्तर भारत में बहुजन समाज के सबसे बड़े स्तम्भ हैं और वह देश के प्रधानमंत्री बन सकते थे इसलिए उनको किसी भी तौर पर बदनाम करना और उनकी राजनीति को पूरी तरह से खत्म करने का अजेंडा था। ईमानदारी का ‘अन्ना’ आंदोलन किसके द्वारा प्रायोजित था, ये जग जाहिर है और उसके उपज के ‘ईमानदार’ लोग अरविन्द केजरीवाल, वी के सिंह, किरण बेदी और बहुत से महत्वाकांक्षी किधर बैठे हैं ये बताने की आवश्यकता नहीं है। हां, इनमें से कोई भी ईमानदारी के लिए वी पी सिंह, मधु दंडवते, सुरेन्द्र मोहन, इंद्रजीत गुप्ता, राम धन, राम नरेश यादव, राम स्वरूप वर्मा आदि का नाम लेने को तैययर नहीं है।

लालू प्रसाद यादव की कमी यही रही कि परिवार मोह और अति आत्मविश्वास में उन्होंने अपने नजदीकी लोगों की परवाह भी नहीं की। चाहे अब्दुल बारी सिद्दीकी हों या रघुवंश प्रसाद सिंह, सभी अंत तक उनसे जुड़े रहे लेकिन अपने परिवार के बाहर भी नेतृत्व विकसित करने का जजबा हमारे ‘लोकतान्त्रिक’ नेताओं में नहीं हो पाया। लालू से लेकर मुलायम तक उसका शिकार रहे और इसके चलते ही इन पार्टियों में फूट पड़ी। राजनीति में परिवार से अलग हटकर नेतृत्व विकसित करने का सबसे बढ़िया उदाहरण काँसीराम हैं जिन्होंने सुश्री मायावती को स्थापित कर यह जताया कि यदि आप वाकई में समाज के प्रति जिम्मेवार हैं तो आपको परिवारवाद से दूर रहना होगा। यह कोई नहीं कह रहा है कि परिवार के सदस्यों को राजनीति में आने का हक नहीं है लेकिन अगर परिवार के सभी सदस्य पार्टी को अपनी जागीर समझेंगे तो उसमें नए लोग नहीं आएंगे और जनता समय आने पर जवाब दे देती है। अच्छा होता कि परिवार के कुछ सदस्य अपने आप को सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्र में स्थापित करते और एक बड़ा मीडिया खड़ा करते तो आज वो स्थिति नहीं होती। बाबा साहब अंबेडकर, जोति बा फुले, पेरियार आदि के आंदोलनों से सीख लेकर यदि हम समाज बदलाव को अपना हिस्सा बनाते तो ऐसी स्थिति न होती। वर्षों बीत जाने के बाद भी सामाजिक आन्दोलनों के नायकों को लोग नहीं भूल पाते लेकिन राजनेताओं को भूलने में कुछ समय नहीं लगता।

बिहार में लालू यादव को उनके विरोधी खत्म नहीं कर पाए क्योंकि आज तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी मजबूत है लेकिन जरूरी है के पार्टी अब लॉंग टर्म सोचें। दक्षिण भारत के मॉडल के आधार पर यदि अपना मीडिया और प्रचार तंत्र होता जिसमें अंबेडकर, फुले पेरियार की विचारधारा के आधार पर सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन की मजबूती होती तो आज हमारे नेताओं की ऐसी स्थिति नहीं होती। केवल नेताओं के मुख्यमंत्री बनने से समाज नहीं बदलता उसके लिए जब तक सामाजिक नये की विचारधारा का मंत्र आगे नहीं होगा तब तक हमेशा वही लोग आपको सलाह देते रहेंगे जिन्होंने शोषण किया है इसलिए आवश्यक है कि ये दल बौद्धिक लोगों और सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों को भी मजबूत करें। संघ परिवार का मुकाबला करने के लिए बहुजन सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक आंदोलन को मजबूत करना होगा तभी वो आने वाली चुनौतियों का मुकाबला कर पाएंगे।

विद्याभूषण रावत

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