रंग बदलता है रहजन हर मोड़ पे रहबर बन कर

रंग बदलता है रहजन हर मोड़ पे रहबर बन कर

वाकिफ हूँ मिजाज से उसके तो ऐतबार कैसे हो

रंग बदलता है रहजन हर मोड़ पे रहबर बन कर।

हो गये अपराध के लिये क्षमा पश्चाताप देता है, लेकिन राजनीति में किये गये अपराध के लिये भविष्य भी क्षमा नहीं करता। दायित्व से छुटकारा इतिहास नहीं देता।

लेकिन एक चालाकी से भ्रम के प्रचार को हथियार बना कर जो इबारत गढ़ी गयी उसके परिणामों की उपलब्धियां समाधानों से विमुख वर्चस्ववादी सता की राह पर चलने लगे तो सामूहिक सामाजिक सजग चेतना को वर्गीकृत घृणा के अंधकार में ढकेलना राजनीतिक अपराध क्यों नहीं माना जाना चाहिये।

आवाम के दुख और देश की पीड़ा की को मनोरंजन के उत्सव में परिभाषित करना राजनीतिक अपराध की श्रेणी से किस तर्क के आधार पर बाहर रखा जा सकता है।

नेतृत्व की दूरदर्शिता व प्रतिबद्धता की विफलताओं को तंत्र की विफलताओं में प्रस्तुत करना क्या राजनीतिक अपराध की परिधि से बाहर हैँ।

विपत्ति के समय में की गयी लापरवाहियां और संवेदनहीनता को अतीत की तुलनाओं से विकृत साक्ष्यों के आधार पर ढ़ंकने के प्रयास राजनीतिक अपराध के दायरे से छूट नहीं पा सकते।

खोगोलीय घटनाओं से उत्पन्न ग्रहण के प्रभाव ने समाज का वो नुक्सान नहीं किया जितना राजनीतिक घटनाओं से सृजत ग्रहण के द्वारा हुआ है।

देश में व्याप्त विभिन्न समस्याओं के समाधानों की खोज के गंभीर प्रयासों के विपरीत वर्ग विशेष के हितों की रक्षा व संवर्धन के लिये निर्णयों ने जिस तरह एक पक्षीय लाभ की स्थिति बनायी गयी उसे नेतृत्व के किस अवयव में माना जाना चाहिये।

अपने अज्ञान की अवस्था की स्वीकार्यता से ही अहंकार से मुक्त हुआ जा सकता है, तभी स्वयं को क्षमा करने की शक्ति की उपलब्धि हो पाती है।

राजनीति में जो स्वयं को क्षमा कर सके, वही द्वेश घृणा लालसा से मुक्त हो कर लोकतांत्रिक उद्देश्यों को सार्थक कर पाता है।

लेकिन महत्वाकांक्षा का विकार ऐसा होने नहीं देता, तब पश्चाताप की गुंजाइश भी नहीं बचती।

राजनीति मे अज्ञान और महत्वाकांक्षा आत्मघाती कटारें ही सबसे निर्मम घात करती हैँ।

क्योंकि राजनीति में अंतर्दृष्टि ही सबसे बड़ा गुण होती है, अंतर्दृष्टि का अर्थ होता है अपने को दूसरे के स्थान पर रख कर समझने की क्षमता।

लेकिन अधिकतर राजनीतिज्ञ खुद को अन्याय से पीड़ित मानते हैँ इसलिये अंतर्दृष्टि से वंचित होते हैँ। इसी लिये सेवा की बजाय सता उन पर हावी हो जाती है और सरोकारों से नाता टूट जाता है।

लोकतंत्र की श्रेष्ठ व्यवस्था व कार्यप्रणाली बौद्धिक विकलांगता के रोग में समाज को अराजकता की स्थितियों में ही धकेलती है। यही राजनीतिक अपराध इतिहास में बार-बार दर्ज होता रहा है।

धृतराष्ट्र व दुर्योधन महत्वाकांक्षा के इस अपराध से सदियों बाद भी मुक्त नहीं हो पाये।

सरोकार की मांग को विरोध व निन्दा में परिभाषित करना राजनीतिक शुचिता के दोगलेपन की सत्यता ही है।

जगदीप सिंह सिन्धु

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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