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Rahul Gandhi at Bharat Bachao Rally

संवेदनहीनता से जूझता मेरा भारत : राहुल गांधी तो 31 जनवरी से सचेत करते आ रहे हैं, न जनता ने सुनी न सरकार ने अब थाली पीट रहे

किसी भी कार्य में अनुशासन व दूरदर्शिता होनी चाहिये। धर्मभीरुता व अंधविश्वास हमारी सोच को संकुचित करता है। धर्म गलत करने से रोकता है पर पाखंड गलत करने को ही प्रेरित करता है।

करीब 31 जनवरी से ही राहुल गांधी बोलते आ रहे हैं ट्वीट पर ट्वीट किए जा रहे हैं, कोरोना वायरस की भयानकता पर भारतीय जनता को सचेत करने की कोशिश रहे थे..

पर,

ना जनता ने, ना ही सरकार ने उनकी सुनी.

क्योंकि उनको तो जनता ने वाकई में पप्पू ही समझा है.

इधर देखो, हमारे महान मोदी जी इस खेल में मात्र 10 दिन पहले कूदे और फिर कोरोना वायरस को एक इवेंट बनाया…

और फिर 48 घण्टे पहले आह्वान किया…

और जनता भेड़ की तरह निकल पड़ी अपने अपने झांझ मजीरे, थाली, गिलास, कटोरी, चम्मच, शंख , घण्टी, घण्टा, डंका लेकर …

सच में आप तो नीरे मूर्ख ही निकले राहुल..

कुछ सीखो जरा हमारे मोदी जी से..

मोदी जी देश की हर आपदा / विपदा के बाद हीरो बन उभरते हैं.

और तुम निरे बुद्धू

वही कुर्ता पायजामा..

कभी दाड़ी बढ़ा ली

कभी कटवा ली..

आप पिछले 2.5 महीने से मूर्खों की तरह चिल्ला रहे हो कि कोरोना वायरस एक गम्भीर बीमारी है

ये लोगों की जान तो लेगी ही

अर्थव्यवस्था को भी तबाह करेगी..

मंदबुद्धि हो आप ..

इवेंट से चलता है ये भारत देश..

क्या आप जानते हैं ?

हमारे देश के डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ़ के पास Covid 19 लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में PPE ( Personal protection equipment ) यानी Gloves, Medical masks, Gowns, Respirators, N95 masks नहीं है।

मेडिकल स्टाफ का हौसला थाली, लोटे से बढ़ेगा या सेफ्टी किट, टेस्टिंग किट, मेडिकल फैसिलिटी सप्लाई से ?

आप मेडिकल सुविधाओं पर सवाल करेंगे तो कोई ना कोई आकर भारत के बड़े देश होने और विशाल आबादी का रोना रो देता है। ऐसे लोगों को भारत के अतीत की ओर पलट कर देखना चाहिए।

क्या हुआ इन 70 साल में ? What happened in these 70 years?

जब भारत आजाद हुआ तब इसके हिस्से में भयानक गरीबी, अशिक्षा और आर्थिक दरिद्रता आई थी। 82 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर थी। अकाल, महामारी भारत में आम बात थी। इतिहासकार बिपन चंद्र के मुताबिक, आजादी के कुछ ही समय पहले यानी 1943 में बंगाल में अकाल पड़ा था जिसमें करीब 30 लाख मारे गए थे।

भारत आजाद हुआ ​तब एक आम भारतीय औसतन 32 साल का जीवन जीता था, आज यह 65 से 70 साल है।

बिपन चंद्र के मुताबिक, 1943 में ​देश में सिर्फ 10 मेडिकल कॉलेज थे जो मात्र 700 डॉक्टर तैयार करते थे। 1951 की गणना के मुताबिक, देश में कुल 18000 डॉक्टर थे। अस्पतालों की संख्या 1915 थी जिनमें 1,16,731 बिस्तरों की संख्या थी। ज्यादातर शहरी इलाके बिना बिजली पानी के थे।

आज क्या भारत का आर्थिक रूप से वही हाल है जो नेहरू के समय था? क्या आज भारत एम्स जैसे अस्पताल बनाने लायक नहीं है, जैसा नेहरू ने किया? तब देश भर में मेडिकल कॉलेज, मेडिकल विश्वविद्यालय, स्कूल खोले जा रहे थे? आज क्या हालत है?

आज भारत में कुल 26,000 सरकारी अस्पताल हैं जिनमें से 21,000 ग्रामीण क्षेत्रों में और 5,000 शहरी क्षेत्रों में हैं। देश के सभी सरकारी अस्पतालों में कुल 7.1 लाख बिस्तर हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भारत के सरकारी अस्पतालों में औसतन 1700 लोगों के लिए एक बिस्तर उपलब्ध है। भारत में डॉक्टरों की उपलब्धता का औसत 10,000 लोगों पर एक डॉक्टर का है। यह हाल तब है जब भारत सरकार कुल जीडीपी का मात्र 1.03 % स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती है।

हर बात का निष्पक्ष आकलन करना चाहिए जो भी चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग कह रहे हैं उनकी बात पर ध्यान संबंधित लोग दें तो हितकारी होगा बाकी को बीच में बोलने का कोई हक नहीं, जिनको काम करना है उनकी बात तो सुनी जाय कम से कम।

कितने संवेदनशील हैं हमारे प्रशासनिक अधिकारी ये आप और हम ने कल देखा ताली और थाली के चक्कर में उत्तर प्रदेश के एक जिले में DM और एसएसपी भी भीड़ बनाकर ताली और शंख बजाते हुए दिखे। क्या ये ही कोरोना से बचाव का तरीका है शायद नहीं। सरकार को ताली और थाली के बजाय इस गंभीर महामारी के बचाव के लिए दिशा निर्देश और बजट का ऐलान करना चाहिए।

कल एक डॉ मनीषा बांगर ने कोरोना प्रकोप का मुक़ाबला करने के लिये देश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिये सरकार की अन्यमनस्कता पर आलोचना की थी और आज रेजिडेंट डॉक्टर एसोशिएशन ने भी आपात चिकित्सा काल में भी यही बात कही है कि चिकित्सा सेवाओं की ओर सरकार ध्यान दे और अपनी प्राथमिकता बदले।

Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स - इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं
Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स – इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं

इंसान की फ़ितरत का, बस एक ही रोना है..

अपनी है तो खाँसी है, औरों का कोरोना है!😊

आपदा का यह समय बीत जाने के बाद यदि हम बचे रह जाएँ, और हम एक बदले हुए मनुष्य न हों तो हमारा मरना बेहतर है।

जब तक हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा तब तक कोरोना को हराना संभव नहीं है जान तो अपनी ही है किसी पराये कि नहीं कृपया समझ जाइए।

और यदि यही देश 22 मार्च की तरह ही एकजुटता को कोरोना की भाँति अगर भ्रष्ट और बेईमान राजनेताओं के विरुद्ध दोहरा दे, तो समझो हमें विश्व में विश्वगुरु और नंबर एक होने से कोई नहीं रोक सकता……

देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को कोरोना के खिलाफ मेडिकल बुलेटिन ओर मेडिकल टीम गठित करना चाहिए था

पर वो आज भी ताली और थाली पिटवा रहे हैं।

दुनिया बनावटी नारों से नहीं बल्कि मानवतावाद और आपसी सहयोग से ही बच सकती है।

अमित सिंह शिवभक्त नंदी

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पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

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पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की …