रायपुर, कोरबा,चांपा वायु : अध्ययन में विषाक्त भारी धातु के अधिक मात्रा में जहरीले छोटे कण मिले

Environment and climate change

प्रदूषण नियंत्रण के लिए तत्काल कार्रवाई का आह्वान

Raipur, Korba, Champa Air: Study found toxic small particles of the high amount of toxic heavy metal;

Call for immediate action for pollution control

कोरबा / जांजगीर – चंपा / रायपुर 02 जून 2020 : कोरबा, चंपा और रायपुर में वायु गुणवत्ता की रेंज जनवरी से फरवरी तक खतरनाक लेवल से अत्यधिक अस्वस्थ के लेवल तक रही और पीएम 2.5 का स्तर सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में राष्ट्रीय मानक जो कि 60 ug / m3 का है, से लगभग नौ गुना ज्यादा रहा।

ये जानकारी राज्य के स्वास्थ्य संसाधन केंद्र (SHRC), छत्तीसगढ़ द्वारा जारी किए गए एक अध्ययन में सामने आई है।

प्रदूषण की ऐसी खतरनाक स्थिति जानने के लिए नमूनों को विभिन्न स्थानों से लिया गया था, जिसमें यह पता चलता है कि वायु प्रदूषण का यह संकट न तो किसी स्थान विशेष का है और न ही ये मौसमी घटना है।

अध्ययन में पीएम 2.5 के लिए 24 घंटे के हवा के नमूनों और भारी धातुओं के एक समूह का विश्लेषण किया गया, जिसमे पीएम 2.5 के बढ़े हुए स्तर के अतिरिक्त, मैंगनीज, निकल, सीसा और क्रिस्टलीय सिलिका जैसी भारी धातुओं के स्तर हवा में काफी अधिक पाए गए।

मैंगनीज और लेड न्यूरोटॉक्सिन (Neurotoxin) हैं, जबकि क्रिस्टलीय सिलिका एक श्वसन प्रक्रिया में तकलीफ़ देने वाली वस्तु है, और सिलिकोसिस का कारण बन सकता है ये एक घातक बीमारी है जिसको ज़्यादातर उस कार्यस्थल पर काम कर रहे कर्मचारियों को अपनी चपेट में लेने के लिए जाना जाता है।

‘’वायु के नमूने के परिणाम स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाले हानिकारक पदार्थों के बहुत चिंताजनक स्तर को दर्शाते हैं। ऐसे उच्च स्तरों पर उनकी उपस्थिति से पता चलता है कि इससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों के होने की उच्च संभावना है। कई अध्ययनों से पता चला है कि पीएम 2.5 के बढ़े हुए स्तर का फेफड़ों और हृदय रोगों के बीच संबंध हैं। इसके अलावा ये भी अच्छी तरह से ज्ञात है कि, मैंगनीज, सीसा और निकल विष हैं और मानव स्वास्थ्य पर उनके प्रभावों को अच्छी तरह से प्रमाणित किया गया है। मैंगनीज और सीसा न्यूरोटॉक्सिन होते हैं जबकि निकल एक कार्सिनोजेन है। मानव घरों और स्वास्थ्य देखभाल सुविधा केंद्रों की छतों से विषाक्त पदार्थों के इतने उच्च स्तर की खोज चिंता का एक वास्तविक कारण है ”, SHRC के पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉक्टर प्रबीर चटर्जी ने कहा।

मिशन अस्पताल में गैर-संचारी रोगों (उच्च रक्तचाप, मधुमेह), pulmonary रोग और अन्य सामान्य रोगियों के रोगियों को देखने वाले डॉ ऑबिन मैथ्यू के अनुसार, pulmonary रोगों के साथ त्वचा संबंधी समस्याओं के रोगियों के मामले बहुत अधिक हैं। डॉ मैथ्यू को लगता है कि त्वचा की समस्याएं भोजन की आदत के कारण नहीं हैं शायद पर्यावरणीय कारकों के कारण हो सकती हैं।

कोरबा में एक अन्य हालिया अध्ययन में पाया गया कि Katghora में जिन लोगों समूह इसके सम्पर्क में नहीं थे की तुलना में कोरबा में जो समूह इसके सम्पर्क में थे उस आबादी के बीच श्वसन रोगों का प्रसार काफी बढ़ गया है। इसी तरह, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस  के लक्षण exposed समूह के बीच 11.79% और 2.96% थे, जबकि  unexposed समूह में यह 5.46% और 0.99% था।

क्रॉस-सेक्शनल तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि थर्मल पावर प्लांटों के आसपास रहने वाले समुदायों में इस रोग के होने का भार अधिक था और इसी के कारण पर्यावरण प्रदूषण भी बड़ा हुआ पाया गया। ये अध्ययन आबादी के श्वसन रोगों से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों की स्थिति पर विशेष जोर देता है।

मार्च से मई 2019 तक पीएम 2.5 के स्तर का विश्लेषण रायपुर में पांच स्थानों पर और कोरबा में तीन स्थानों पर किया गया जिसमे कम लागत वाले मॉनिटर – ATMOS का उपयोग किया गया, इसके परिणाम बताते है कि 2019 और 2020 के बीच के रुझान दोनों वर्षों के लिए लगातार समान हैं, मार्च में उच्चतम और अप्रैल और मई का स्तर दोनों वर्षों के लिए लगभग समान है, 2020 जो अन्तर है वो ग़ैरमामूली रहा है।

साल दर साल के आधार पर PM2.5 के स्तर में लगभग 10 से 15% की गिरावट है। इस ग़ैरमामूली गिरावट के साथ दोनों वर्षों के तीन महीनों के लगातार व्यवहार से ये  संकेत मिलता है कि रायपुर में अधिकांश प्रदूषण का कारण स्थानीय रहा जबकि क्षेत्रीय स्रोतों का न्यूनतम प्रभाव रहा। यहाँ राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन कि वजह से भी हवा की गुणवत्ता में कोई नाटकीय रूप से सुधार नहीं हुआ जबकि अहमदाबाद, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे अन्य शहरों में पीएम 2.5 के स्तर में 35% से 65% की गिरावट देखी गई है।

“हवा में इस तरह के विषाक्त पदार्थों की उपस्थिति को कम करने के लिए न केवल तत्काल कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है, बल्कि व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण में  यह आकलन करने कि भी आवश्यकता है कि इस प्रदूषण से क्या नुकसान पहले ही हो चुका है, और यह भी आकलन करने कि आवश्यकता है कि जो आबादी लंबे समय तक इससे प्रभावित रही है उसकी जाँच करने कि आवश्यकता है कि वो आबादी किस हद तक प्रभावित हुई है। इसके अलावा, स्वास्थ्य निकाय को इन रसायनों को ध्यान में रखते हुए उन लोगों के लिए प्रासंगिक और पर्याप्त देखभाल प्रदान करने के बारे में एक योजना विकसित करनी चाहिए जो इससे अभी तक प्रभावित हुए हैं ” अध्ययन करने वाले शोधकर्ता पुनीता कुमार ने कहा।

वायु नमूने के परिणाम स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि कई कोयला खनन और औद्योगिक बेल्टों में स्थिति बहुत चिंताजनक है। पर्यावरण प्रतिबंधों को और कमज़ोर होने और COVID महामारी के बाद मिलने वाले प्रोत्साहन पैकेजों के साथ, इस तरह के उद्योगों से होने वाले प्रदूषण का प्रभावित क्षेत्रों पर और अधिक हानिकारक स्वास्थ्य प्रभाव होने की संभावना है। समय की आवश्यकता होगी कि इन क्षेत्रों में पर्यावरण और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार किया जाए और समुदायों को और अधिक जोखिम में न डाला जाए।

“जहां एक ओर खनन होने वाले क्षेत्र मानव विकास सूचकांक पर बेहद नीचली पायदान पर हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार का ऐसा मानना है कि कोयले की खोदाई विकास की दिशा में बढ़ता सर्वोत्तम कदम है।

कोरबा रिपोर्ट बताती है कि वहाँ हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर है। जब हम हवा और पानी की गुणवत्ता को ठीक करने में असमर्थ हैं, तब अधिक खनन की अनुमति देना गंभीर चिंता का कारण है। जब तक सरकार यह आश्वासन नहीं देती कि मौजूदा खनन क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता मनुष्यों के लिए सुरक्षित है, तब तक किसी भी नए खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ” एनवायरनमेंट वकील ऋत्विक दत्ता ने कहा

अध्ययन से नमूने साइटों के बारे में :

कोरबा, चंपा और रायपुर में चिन्हित स्थानों से अध्ययन के लिए 9 वायु नमूने लिए गए। इसमें से 7 सैंपलिंग लोकेशन कोरबा में थे जबकि एक चंपा और एक रायपुर में था। ये सैंपलिंग स्थल थे – एमपी नगर, चिमनी भट्टा, दर्री, जिला अस्पताल और कोरबा में रानी धनराज कुमार पीएचसी; चम्पा में मारुति टाउनशिप और रायपुर में प्रियदर्शनी नगर।

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