राजीव गांधी : तुमसा नहीं देखा

Rajeev Gandhi

राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई पर विशेष | Rajiv Gandhi’s death anniversary special on 21 May

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है,

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

पं. नेहरू ने जिस आत्मनिर्भर एवं समाजवादी भारत की परिकल्पना की थी, राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उसे मूर्त रूप प्रदान करने की कोशिश की। आज जिस डिजिटल इंडिया की चर्चा है उसकी संकल्पना उन्होंने ही तैयार की थी, इसीलिए उन्हें डिजिटल इंडिया का आर्किटेक्ट एवं सूचना तकनीक और दूर संचार क्रांति का जनक भी कहा जाता है।

युवाओं के सशक्तिकरण एवं सियासत तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मताधिकार की उम्र 21 से हटाकर 18 करने का श्रेय भी राजीव गांधी के हिस्से में ही जाता है। उन्होंने कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत कर उसकी पहुंच आमजन तक कर दी जिसका लाभ आज कोविड 19 संकट काल में पूरा देश उठा रहा है।

The first ATM in Delhi was inaugurated by Rajiv Gandhi.

विरोधी पार्टियों के कम्प्यूटरीकरण के विरोध एवं भारत बंद के आवाहन के बावजूद 1988 में दिल्ली में पहला एटीएम राजीव गांधी ने ही उद्घाटित किया था। आज बिना इसके सामान्य जीवन की कल्पना ही बेमानी है।

ये वही राजीव गांधी है जिन्होंने पंचायती राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) का पूरा प्रस्ताव नए तरीके से इस मकसद के लिए तैयार कराया जिससे सत्ता का विकेंद्रीकरण हो गरीब, मजलूम व वंचित समुदाय को अधिकतम लाभ मिल सके। इस वैज्ञानिक शिक्षा और सोंच की बात हम करते हैं, उसे विस्तारित और आधुनिकीकृत करने की योजना 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा राजीव गांधी ने ही की।

राजीव गांधी वो सीढ़ी हैं, जिस पर चढ़कर भारत न केवल दूरदराज गांव तक पहुंचा बल्कि अति आधुनिक भी हुआ। आज उनके इन्हीं कामों का श्रेय लेने की होड़ सरकारों में देखी जा सकती है।

राजीव गांधी बेहतरीन प्रधानमंत्री के साथ-साथ बेहतर इंसान और आकर्षक व्यक्तित्व के भी धनी और सामाजिक सद्भावना तथा सहअस्तित्व के सिद्धांत के हामी थे। जो भी उनसे मिलता था उनके मृदुल व्यवहार एवं सहजता का मुरीद हुए बिना नहीं रहता था। इसी लिये सरकार ने उनकी याद में सद्भावना पखवाड़ा मनाना तय किया था पर आजकल इस पखवाड़े को भी ग्रहण लग गया है।

राजीव गांधी से एक मुलाकात | A meeting with Rajiv Gandhi

बात राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के अंतिम दिनों की है। सुल्तानपुर का निवासी होने के कारण उनसे मिलना बड़ा आसान था और कई बार तो उनका सहृदय और निर्छल होना भी मुलाकात में बहुत सहायक साबित होता था। ऐसे ही एक बार सुल्तानपुर डाक बंगले में उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और बातों बातों में जब उन्हें पता चला कि मैं इतिहास का विद्यार्थी हूँ और मेरी रुचि और अध्ययन आजादी के आंदोलन में है तो बरबस उन्होंने कहा कि क्यों न 1857 की क्रांति में उत्तर प्रदेश की जनता की भागीदारी का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।

उन्होंने ये भी कहा कि सुल्तानपुर का गाँव-गाँव 1857 लोगों के संस्मरणो में भरा पड़ा है। मैंने कई बार अपने मंचों पर इसका बखान सुना है और कुछ जानने की कोशिश भी की है। बहुत बार सोचा कि इस पर कुछ करना चाहिए, लेकिन व्यस्तता के कारण ये मेरी प्राथमिकता में न आ सका, आपसे मुलाकात से फिर मेरी ये ख्वाहिश जाग उठी। आप कोई योजना बनाएं और विद्वानों से बात करें, किसी तरह की कमी आड़े हाथों नही आएगी।

मैंने कहा कि एक विनम्र सुझाव देना चाहता हूँ कि 1857 की क्रांति में मुसलमानों के रोल पर बातें करें तो कैसा रहेगा क्योंकि आज़ादी की लड़ाई में उनकी भागीदारी पर इतिहासकारों ने बहुत ही कम फोकस किया है।

राजीव जी का बड़ा ही वैज्ञानिक और सधा हुआ जवाब था कि डॉक्टर साहब देश की कोई भी ऐसी विधा नहीं है जो मुसलमानों के योगदान के बगैर मुकम्मल हो सके और आज़ादी की लड़ाई तो बिल्कुल नहीं। आधुनिक भारत की जो परिकल्पना है वो उनके बगैर अधूरी है। परन्तु हमें इतिहास को समग्रता में देखना होगा कि कैसे धर्म, जाति और भाषा की विभिन्नता के बावजूद सब लोग संकट का सामना एक साथ मिलकर करते हैं और यही साझी विरासत हमारी ताकत और दुनिया में भारत की पहचान है। इसे बचाये रखने का मतलब भारतीयता को बचाये रखना है।

ये थी राजीव गांधी की भारतीय समाज और इतिहास की समझ।

मैं मंत्रमुग्ध होकर उनकी बात सुनता रहा और अब मेरे पास जवाब देने के लिए शब्द ही नही बचे थे।

 

Dr. Mohd. Arif डॉ मोहम्मद आरिफ लेखक जाने माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता है
Dr. Mohd. Arif Dr. Mohd. Arif डॉ मोहम्मद आरिफ लेखक जाने माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता है

फिर राजीव जी के एक प्रस्ताव से मैं चौंक पड़ा कि इसे जिलेवार लिखा जाए और सुल्तानपुर का इतिहास लेखन आपके हवाले। हमने इसपर काम करना शुरू किया पर समय की गति कौन जानता है, राजीव जी नहीं रहे।

21 मई 1991 को उनकी हत्या हो गयी। मैं भी अपनी रोजी रोटी कमाने की व्यस्तता में इतना खो गया कि यह काम अधूरा रह गया। इधर कुछ दिनों से हमने इस काम की नए सिरे से रूपरेखा बनानी शुरू की है क्योंकि मुझे लगता है कि राजीव गांधी की पैनी निगाहों ने ये भांप लिया था कि आने वाला वक़्त तथ्यपरक इतिहास लेखन के लिए संकट भरा होगा। उनकी ये सोच आज सच साबित हो रही है और ऐतिहासिक तथ्यों को नकारने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।

उनकी सोच को अमल के लाना एक कर्ज़ है मुझ पर राजीव जी का, जिसे उतारने के लिए मैं आजकल काम कर रहा हूँ।

मेरी तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी इस महान भारतीय सपूत को——-

डॉ. मोहम्मद आरिफ

लेखक जाने-माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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