हर दौर में जीवन को प्यार करने वाले लोग होते हैं

Ram Gopal Bajaj

नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2020. कोरोना से लड़ाई अब और गहरी होती जा रही है। वहीं इसके इलाज की दिशा में नई प्रगति भी हो रही है। दिल्ली ने एक छोटी उम्मीद जगाई है जिसे देश के अन्य प्रदेशों में भी अपनाने की कोशिश जारी है। हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं इस बीमारी से जीत हासिल करने के लिए।

पर, इस उम्मीद के साथ ही कई गंभीर सवाल हमारे सामने आने वाले हैं। समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी हमारे जीने के ढंग को बदल देगी। कई गंभीर सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव भी देखें जा सकते हैं। ऐसे में हमें एक दूसरे का दामन थाम कर रखना चाहिए। साहित्य गवाह है कि प्यार और विश्वास से मानव ने हर असंभव लड़ाई पर जीत हासिल की है।

जीतना हम, एक-दूसरे के साथ होंगे, उतना ही हम इस लड़ाई में जीत के साथ होंगे।

राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा किए जा रहे छोटे-छोटे प्रयास मानवता की उम्मीद को हरा रखने के प्रयास हैं। फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम, वाट्सएप्प के जरिए पुस्तिका साझा करना, ज्यादा से ज्यादा ई-बुक उपलब्ध करवाना, ब्लॉग और अन्य वेबसाइट के जरिए पढ़ने के लिए कहानियाँ और लेख उपलब्ध करवाना – यह सभी प्रयास इस बड़ी लड़ाई पर जीत हासिल करने की दिशा में किए गए प्रयास हैं।

इसी सिलसिले में आज, रविवार का दिन भी कवि, पत्रकार और इतिहासकार की सोहबत में बीता।

रंगमंच के साथ 

भारतीय रंगमंच की दुनिया के दिग्गज कलाकार एवं निर्देशक राम गोपाल बजाज को लॉकडाउन में अपने घर पर रहते हुए, सक्रीन पर देखना और सुनना एक सुखद अनुभव था। राजकमल प्रकाशन के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर शनिवार की शाम राम गोपाल बजाज ने, गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि‘ से भावपूर्ण ढंग से अंश पाठ किया।

राम गोपाल बजाज ने कहा कि,

“रेत समाधि की अम्मा एक संयुक्त परिवार की आम दिखती हुई महिला है जो पत्नी, मां, दादी है। जीवन से बेज़ार, विधवा, बिस्तर पकड़ी हुई अम्मा को जब परिवार उठाने की कोशिश करता है तो वो उठकर गायब हो जाती है। जब वो वापिस मिलती हैं तो एक संपूर्ण बदले हुए रूप में। दरअसल, यह उपन्यास, एक औरत की जिजीविषा, दोस्ती, बंटवारा, माँ-बेटे, माँ-बेटी और प्यार के दीदार की कहानी है।“

गीतांजलि श्री का उपन्यास रेत समाधि राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

राजकमल प्रकाशन के फ़ेसबुक लाइव के आभासी मंच से जुड़कर आलोचक अमितेश कुमार ने, लॉकडाउन में रंगमंच की दुनिया के रंगों पर चर्चा करते हुए कहा कि, “थियेटर की बुनियाद ही सामाजिक और सामुदायिक है। फिलहाल हमें इन दोनों से दूर रहने को कहा गया है। आज रंगकर्मी और थियेटर एक ऐसे अंधेरे में हैं जिसमें रोशनी की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। रंगकर्मियों के सामने आजीविका का संकट बहुत गहरा है। कोरोना काल के ख़त्म होने के बाद हमारी जिम्मेदारी होगी कि हम थियेटर के साथ अपने रिश्ते को गाढ़ा कर, हर संभव कोशिश के साथ मंच की रोशनी को बुझने न दें।“

अन्नत आश्वासनों के अलावा मेरे पास और कोई नारा नहीं है…

“पिछले कई दिनों की चुप्पी के बाद लाइव जुड़कर एक सुखद अनुभव हो रहा है कि मेरे मित्र, पाठक सभी मुझसे जुड़े हुए हैं।“  यह कहना है कवि कुमार अम्बुज का।

रविवार की दोपहर राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव के आभासी मंच से जुड़कर कवि कुमार अम्बुज ने कई साहित्यिक कृतियों से गुजरते हुए मनुष्य की जिजीविषा एवं उसके अदम्य साहस की बात की। कविता के जरिए उन्होंने न केवल आज के समय की उलझनों को समझाने की कोशिश की, बल्कि कई अन्य साहित्यकारों की कृतियों में वर्णित भिन्न महामारियों के वर्णन से भी इस समय की पीड़ा को कम करने का रास्ता दिखाया।

लाइव बातचीत में कुमार अम्बुज ने कहा,

“यह अप्रत्याशित दौर है। हमारी कल्पना में, हमारी आशांकाओं में यह दौर नहीं था। लेकिन विचार करें तो हम पाएंगे कि पिछले कई सौ सालों में मनुष्य की जो विकास की यात्रा है, और जिस तरह प्रकृति के साथ एवं दूसरी प्रजातियों, या विचार, या रंग रूप के लोगों से हमने दूरी बना ली है, वह विनाश की तरफ ही बढ़ रहा है। धीरे-धीरे हम विकास की मूल अवधारणाओं के खिलाफ़ होते चले गए हैं।“

उन्होंने कहा,

“पुलिस, प्रशासन, स्वास्थकर्मी और तमाम जरूरी सामानों को उपलब्ध करवाने वाले लोग अपनी जान की परवाह न करते हुए हमारे लिए फ्रंट पर इस बीमारी से लड़ रहे हैं। साहित्य भी हमें बताता है कि हमेशा, एक ऐसा समूह सक्रिय रहता है जो जीवन को प्यार करता है और हमारी आशाओं को संजो कर रखता है। उसका मानना है कि बुरी भावनाओं से हम मनुष्यता को नहीं बचा पाएंगे।“

कुमार अम्बुज ने हमारे समय की चुनौतियों एवं चिंताओं पर बात करते हुए कहा,

“अपनी भिन्नताओं को अगर हम नहीं समझेंगे तो हम विभक्त हो जाएंगे।  जब हम विभक्त हो जाते हैं, तो जाहिर है कि मनुष्यता की लड़ाई, जो बीमारियों के प्रति, अशिक्षा के प्रति, अभिव्यक्ति की लड़ाई है, उसे हम लड़ने में असफल हो जाते हैं।“

कुमार अम्बुज ने लाइव कार्यक्रम में कई कविताओं का पाठ किया। उनके कविता संग्रह राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हैं।

राग दरबारी

लॉकडाउन के दौर में कई साहित्यिक उपन्यासों का जिक्र आभासी दुनिया में पाठकों ने बार-बार किया। निराला, मुक्तिबोध, हजारी प्रसाद द्विवेदी, केदारनाथ सिंह और बहुत सारे साहित्यकारों की रचनाओं को अपनी बात कहने के लिए हम दोहराते रहे हैं। राग दरबारी हिन्दी का ऐसा उपन्यास है जिसने काल की सीमा को लांघ दिया है। यह उपन्यास हर दौर का सच बयां करता है।

रविवार की शाम पत्रकार जितेन्द्र कुमार ने राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से लाइव आकर राग दरबारी का रोचक अंदाज में अंश पाठ किया। लाइव कार्यक्रम में उपन्यास के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने कहा, “राग दरबारी ऐसा उपन्यास है जिसने हमारे बोलने की शब्दावली को पूरी तरह से बदल दिया है। हम जब खुद अपनी बात अपने शब्दों में नहीं कह पाते तो हम राग दरबारी का सहारा लेते। 55 साल के बाद भी यह किताब बहुत महत्वपूर्ण है।“

लेखक श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी का अनुवाद अंग्रेजी सहित 15 अन्य भाषाओं में हो चुका है। यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

फूल तुम्हें भेजा है…

क्या आपने फूल खायें हैं?

वैसे, ‘स्वाद-सुख के रविवार के कार्यक्रम में फूल खाने का मतलब फूलों की मार से नहीं, बल्कि फूलों के स्वादिष्ट व्यंजनों से है। इतिहासकार एवं खान-पान विशेषज्ञ पुष्पेश पंत के संग रविवार के दिन राजकमल प्रकाशन फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम से जुड़कर लोग चल पड़े फूलों की सैर पर…

सिनेमा में ‘फूल खानेवालों’ का ज़िक्र बहुत बार होता रहा है। साहित्य में भी ‘कमल का फूल खानेवालों’ का ज़िक्र होमर और टेनिसन ने किया है। आज, ‘स्वाद-सुख’ में फूलों की सब्ज़ी, पकौड़े, खीर का ज़िक्र करते हुए पुष्पेश पंत ने कहा,

“हिन्दुस्तान में जो फूल ज्यादा खाया जाता है वो है- केले का फूल। बंगाल में इसे ‘मोचा’ कहते हैं। ‘मोचा-कटलेट’ बंगाल में बहुत पसंद किया जाता है।“

उड़ीसा, तमिलानाडु, कर्नाटक के अलावा अन्य कई प्रांतों में ‘केले के फूल’ से कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। दक्षिण में इसकी भाजी और तरी वाली सब्ज़ी भी खाने को मिलती है। वैसे, इसे बनाने में मेहनत बहुत ज्यादा है इसलिए रोज़मर्रा के खाने में यह कम ही बनाया जाता है।

असम में इसे मछली या अन्य नॉन-वेज खाने के साथ मिलाकर तैयार किया जाता है।

बंगाल में ‘कोहडा’ और ‘अगस्त के फूल’ की भी भाजी बनती है। ये एक तरह का पकौड़ा होता है जिसे थोड़ा सा बेसन में लपेटकर तला जाता है।

कच्ची कली ‘कचनार’ की और उसकी बना दे कोई कलेजी तो दिल बाग़-बाग़ हो जाता है ! फूलों की कलेजी में ‘सेमल के फूल’ भी कम नहीं होते।

स्वाद पारखी पुष्पेश पंत ने लाइव बातचीत में कहा,

“झारखंड में फूलों का संसार बहुत बड़ा है। इसमें सबसे प्रमुख ‘महुआ’ है। महुआ के फूलों से लड्डू, जैम और हलुआ बनाया जाता है। यहाँ ‘सहजन के फूलों’ की भाजी भी बहुत प्रचलित है। इसका प्रयोग दक्षिण में भी बहुत किया जाता है।“

महाराष्ट्र में ‘अम्बाड़ी के फूलों’ की चटनी और भाजी दोनों बनाए जाते हैं। ‘पारिजात के फूलों’ का भी प्रयोग चावल के साथ-साथ अन्य व्यंजनों में किया जाता है।

वैसे, कड़वाहट वाले फूलों में ‘नीम के फूल’ की भाजी छत्तीसगढ़ में खाने को मिलती है। दक्षिण में नीम के सूखे फूलों को कुचल कर, उसमें लहसुन और प्याज़ मिलाते हैं और फिर उसमें बहुत सारा घी मिलाकर उसे थोड़ा पका लिया जाता है। इसका मज़ा चावल के साथ ज्यादा आता है। घी इसकी कड़वाहट को बहुत कम कर देती है।

गुलाब के फूलों का भी प्रयोग फिलहाल खीर और मिठाई में तो बहुत ज्यादा किया जाता है। लेकिन, आमतौर पर हम इसकी उपेक्षा ही करते हैं। बिहार में ‘पटसन के फूलों’ की भी भाजी बनायी जाती है। गाँव-देहात के इलाकों में इसका प्रयोग बहुत आम है।

पहाड़ी लाल फूल ‘बुरांस’ का ज़िक्र तो जरूरी है। इसे खाने के साथ-साथ पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। बुरांस के फूलों से बनी शरबत का जिक्र जल्द ही स्वाद सुख के अगले कार्यक्रम में किया जाएगा।

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