अच्छे दिन : कोरोना से भारत की लड़ाई को कमजोर कौन कर रहा है? आपदा में भी घोटाला !

#CoronavirusLockdown, #21daylockdown , coronavirus lockdown, coronavirus lockdown india news, coronavirus lockdown india news in Hindi, #कोरोनोवायरसलॉकडाउन, # 21दिनलॉकडाउन, कोरोनावायरस लॉकडाउन, कोरोनावायरस लॉकडाउन भारत समाचार, कोरोनावायरस लॉकडाउन भारत समाचार हिंदी में, भारत समाचार हिंदी में,

कोविड-19 महामारी (Covid-19 Epidemic,) के खिलाफ भारत के बारूद को गीला किए जाने में, एक घपलेबाजी के तत्व के ही सामने आने की कसर थी। कोरोना वाइरस के रैपिड टैस्ट किट के आयात के घोटाले के उजागर होने से, वह कसर भी पूरी हो गयी है।

बस घोटाले की ही कमी थी

अभी इस घोटाले की पर्तें खुल ही रही हैं। बहरहाल, इतना तो अब तक भी साफ हो चुका है कि टैस्ट किटों की इतनी महत्वपूर्ण तथा नाजुक खरीद, केंद्र सरकार द्वारा या उसकी ओर से आइसीएमआर द्वारा सीधे उत्पादकों से करने के बजाए, बिचौलिया कंपनियों के जरिए की गयी थी। इतना ही नहीं, इसमें बिचौलियों की दो-दो परतें काम कर रही थीं। नतीजा यह कि साढ़े बारह करोड़ रु. के करीब में खरीदी गयी टैस्टिंग किट, आयातकर्ता ने एक और बिचौलिये को 20 करोड़ रु. में बेचीं और इस बिचौलिये ने, जिसने जाहिर है कि मौजूदा शासन में अपनी पहुंच के बल पर, बिना आयात तक पहुंच के ही टैस्टिंग किट मुहैया कराने का आर्डर हासिल कर लिया था, अपनी खरीद से डेढ़ गुने दाम पर, 30 करोड़ रु. में वही टैस्टिंग किट सरकार को बेच दी।

उत्पादक कंपनी से खरीद के ढाई गुना दाम पर यह टैस्टिंग किट खरीदने की सफाई में, सरकार ने दुहरी दलील दी है, जो अपने दोनों पहलुओं में हास्यास्पद है। पहली दलील तो यह कि रैपिड टैस्टिंग किट (Rapid testing kit) की यही सबसे सस्ती पेशकश थी।

याद रहे कि यह दलील इसके बावजूद दी जा रही थी कि कोरियाई कंपनियों से इससे ठीक आधे दाम पर रैपिड टैस्टिंग किट, भारत के ही कुछ राज्यों ने खरीदे थे।

दूसरी दलील यह कि अब जबकि संदिग्ध गुणवत्ता के चलते उक्त आयातित टैस्टिंग किट वापस लौटाए जा रहे हैं, सरकार को इस सौदे में रत्तीभर नुकसान नहीं हुआ है क्योंकि उसने इन किटों के आयात के लिए कोई अग्रिम भुगतान नहीं किया था।

कहने की जरूरत नहीं है मुख्यधारा के मीडिया तथा खासतौर पर इलैक्ट्रिोनिक मीडिया पर अपनी ऑक्टोपसी जकड़ के बल पर मोदी सरकार ने आसानी से इस पूरे प्रकरण को उठने से पहले ही दबा दिया है।

यहां तक कि इस सवाल तक को दबा दिया गया है कि महामारी से लड़ाई के उपायों में भी घोटालेबाजी के पक्ष को अगर छोड़ भी दें तो, इस सौदे के चक्कर में रैपिड टैस्टिंग किटों जैसे अनिवार्य हथियार की अति-प्रतीक्षित उपलब्धता के काफी समय के लिए टल जाने से, महामारी के खिलाफ लड़ाई को लगे धक्के की जिम्मेदारी कौन लेगा?

रही बात प्रधानमंत्री मोदी के ‘‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’’ के दावों की तो, सिर्फ इतना याद दिला देना काफी होगा कि इस ‘‘टैस्ट किट घोटाले’’ को रोकने या पकड़ने में, मोदी सरकार की दूर-दूर तक कोई भूमिका नहीं है। सरकार की छोडि़ए, इसमें मुख्यधारा के मीडिया की भी शायद ही कोई भूमिका है।

यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब गुणवत्ता की शिकायतें आने के बाद, बिचौलियों की दो परतों के बीच की लड़ाई अदालत में पहुंच गयी और इस सौदे के विभिन्न पहलू सामने आ गए।

तानाशाहाना तौर-तरीके | Dictator modus operandi

PM Modi Speech On Coronavirus

          बेशक, ‘‘टेस्ट किट घोटाला’’ (Test kit scam) तो सिर्फ हिमखंड का पानी की सतह के ऊपर नजर आने वाला हिस्सा है। विभिन्न स्तरों पर आपात खरीद के नाम पर क्या कुछ नहीं हो रहा होगा, इसका इस उदाहरण से थोड़ा-बहुत अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है।

फिर भी, जैसाकि हमने शुरू में ही इशारा किया, घपले-घोटालों का पहलू, मौजूदा सरकार की कारगुजारियों का ऐसा अकेला या सबसे महत्वपूर्ण पहलू नहीं है, जो महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई को कमजोर कर रहा है। इससे कहीं महत्वपूर्ण पहलू, मोदी सरकार का महामारी जैसी स्वास्थ्य इमर्जेंसी (Health emergency) का फायदा उठाकर, अपना तानाशाहाना शिकंजा और ज्यादा कस लेना है। अब जबकि महामारी की चुनौती और उसका मुकाबला करने के इकलौते उपाय के रूप में देशबंदी थोपने के जरिए, असहमति व विरोध की राजनीतिक आवाजों को एक प्रकार से ‘‘पॉज’’ ही किया जा चुका है, एक प्रकार से शासन की सारी शक्तियों को मोदी-शाह जोड़ी ने, अपने हाथों में केंद्रित कर लिया है।

इस अधिनायकवाद का प्रदर्शन केंद्र के स्तर पर और अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में भी, खासतौर पर सीएए-विरोधी आंदोलन के महत्वपूर्ण (स्थानीय) संगठनकर्ताओं के खिलाफ तथा जम्मू-कश्मीर में पत्रकारों के खिलाफ और तथाकथित ‘‘शहरी नक्सली’’ ब्रांड किए गए सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ, महामारी के विरुद्घ लड़ाई के बीच में भी और सरासर अनुपातहीन दमनकारी कार्रवाइयों में तो हो ही रहा है। गौतम नवलखा व आनंद तेलमुम्बड़े से लेकर, डा0 कफील अहमद, दारापुरी, शफूरा जरगर और ऐसे ही दूसरे अनेक लोगों की अति-दमनकारी धाराओं में गिरफ्तारियां, इसी का उदाहरण हैं। कश्मीर को तो खैर, यह सरकार पहले ही भारतीय जनतंत्र के दायरे से बाहर धकेल चुकी थी।

लड़ाई के मोर्चे में सांप्रदायिक सेंध

सभी जानते हैं कि इस सबके पीछे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण/ विभाजन को आगे बढ़ाने का खेल भी है। बेशक यह संयोग ही नहीं है कि कोरोनावाइरस के खतरे को, एक पूरे समुदाय से ही खतरे में बदल दिया गया है। तब्लीगी जमात की गैर-जिम्मेदारी को हथियार बनाकर, खुद सरकार समेत समूचे संघ परिवार द्वारा छेड़ी गयी वाइरस को सांप्रदायिक टोपी पहनाने की इस मुहिम ने, जब तक शेष दुनियाभर में भारत की थू-थू नहीं करा दी और मुस्लिम जगत से कड़ी चेतावनियां नहीं आने लगीं, तब तक न प्रधानमंत्री को इसकी याद आयी और न उनके वैचारिक गुरु, आरएसएस प्रमुख को, कि ‘इस लड़ाई में हम सब का एक होना जरूरी है।’ और इस अपील के भी संघ-परिवार द्वारा महज रस्मअदायगी के ही रूप में लिए जाने का सबूत देते हुए, अगले ही दिन बिहार में बजरंगदलियों ने फल-सब्जी की दूकानों की हिंदू दूकानों के रूप में पहचान कराने के लिए झंडे लगा दिए और उत्तर प्रदेश के एक भाजपा विधायक ने इसकी सार्वजनिक अपील जारी कर दी कि मुसलमानों से सब्जी वगैरह नहीं खरीदें! यह इसके बावजूद है कि एक ग्रुप के रूप में तब्लीगी जमात से जुड़े लोग ही सबसे बड़ी संख्या में, कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद, इस बीमारी से लडऩे में दूसरे गंभीर रोगियों को बचाने के लिए, अपना रक्त-प्लाज्मा देने के लिए आगे आए हैं। कहने की जरूरत नहीं है मौजूदा शासन द्वारा संरक्षित इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने, भयावह महामारी से जुड़ी आशंकाओं के साथ जुडक़र, इस महामारी के सामुदायिक प्रसार को रोकने के काम को, बहुत मुश्किल बना दिया है।

लड़ाई में राज्यों का साथ देने से इंकार

Modi in Gamchha         फिर भी, महामारी का फायदा उठाकर तानाशाही थोपे जाने का, महामारी के खिलाफ लड़ाई को और भी कमजोर करने वाला पहलू, मोदी सरकार का राज्यों पर अपने मनमाने फैसले थोपने का है। लॉकडॉउन का निर्णय प्रधानमंत्री मोदी ने, जिस तरह से सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर पूरे देश पर थोपा था, उसके बारे में सभी जानते हैं। इसके चलते न तो राज्यों को तैयारी करने का मौका मिला और न लोगों को। इसके चलते जैसी भारी मुश्किलें लोगों को झेलनी पड़ीं और खासतौर पर प्रवासी मजदूरों के महापलायन जैसी लॉकडॉउन को ही खोखला करने वाली महा-समस्याएं सामने आयीं और अब तक बनी हुई हैं, उनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन, इसकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई है कि मोदी सरकार, राज्यों को महामारी के खिलाफ लडऩे के लिए व्यावहारिक माने में कोई भी मदद देने के लिए ही तैयार नहीं है, जबकि राज्य ही हैं जो सिर्फ चिकित्सकीय पहलू से ही इस लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर नहीं हैं, देशबंदी के बीच जनता को और खासतौर पर आय व भोजन के साधनों से दूर कर दिए गए मेहनतकशों व अन्य गरीबों को, वाइरस के साथ ही भूख-बेघरबारी के हमले से बचाने की लड़ाई में भी, वे ही अग्रिम मोर्चे पर हैं। पंजाब के वित्त मंत्री की मानें तो, इस सीमावर्ती राज्य को, इस महामारी से लड़ाई के लिए केंद्र से सिर्फ 72 करोड़ रु. की सहायता मिली है।

उधर केरल समेत कई राज्य सरकारें तो इसकी शिकायत कर रही हैं कि खतरनाक वाइरस के खिलाफ लड़ाई में केंद्र सरकार से कोई अतिरिक्त वित्तीय मदद मिलना तो दूर, जीएसटी क्षतिपूर्ति से लेकर मनरेगा तक, अनेक मदों में राज्यों का बकाया तक केंद्र ने नहीं चुकाया है। इसके अलावा, इस संकट के समय में भी, ऋण लेने के मामले में राज्यों के हाथ बांधकर रखे जा रहे हैं और उनसे सख्ती से केंद्र की थोपी ऋण सीमा का पालन करने के लिए कहा जा रहा है, जबकि केंद्र सरकार खुद फिर भी तरह-तरह के उपायों से, अपने लिए लगी सीमा को खींच-खांचकर बड़ा कर लेती है। इसके ऊपर से प्रधानमंत्री राहत को खाली कर, पीएम केयर के नाम से राजनीतिक सत्ता के शीर्ष से और भी सीधे-सीधे नियंत्रित फंड की ओर सारे सहायता अंशदान मोडऩे के जरिए, न सिर्फ ये सारे संसाधन प्रधानमंत्री के मनमाने नियंत्रण में ले आए गए हैं बल्कि राज्यों का इन साधनों से एक तरह से वंचित ही कर दिया गया है। सरकारी कर्मचारियों के सारे अंशदान ही इस निजी कोष में नहीं भेजे जा रहे हैं बल्कि बेशर्मी से यह एलान भी किया जा चुका है कि कार्पोरेटों के सीएसआर फंड से चंदा भी सिर्फ और सिर्फ इसी कोष में दिया जा सकता है, मुख्यमंत्री सहायता कोषों में नहीं।

केंद्रीयकृत और एकतरफा निर्णय | Centralized and unilateral decision

Coronavirus Outbreak LIVE Updates, coronavirus in india, Coronavirus updates,Coronavirus India updates,Coronavirus Outbreak LIVE Updates, भारत में कोरोनावायरस, कोरोना वायरस अपडेट, कोरोना वायरस भारत अपडेट, कोरोना, वायरस वायरस प्रकोप LIVE अपडेट,          इस सब के ऊपर से केंद्र सरकार ने महामारी से लडऩे के नाम पर, पूरे देश के लिए इकतरफा तरीके से नीतिगत-रणनीतिगत निर्णय लेने के सारे अधिकार ही नहीं हथिया लिए हैं, उन निर्णयों के जमीनी स्तर पर पालन से संबंधित ठोस निर्णय लेने के भी अधिकार उसने हड़प लिए हैं। यह तब है जबकि इस अति-केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया में विचार शून्यता इस कदर हावी है कि लॉकडॉउन (Lockdown) के हरेक चरण में उसके परिपालन के संबंध में जारी ठोस निर्देशों में इतनी बार संशोधन तथा पुनर्संशोधन करने पड़े हैं कि इन निर्देशों का ही मजाक बनकर रह गया है। इसके बावजूद, लॉकडॉउन के सरासर इकतरफा तथा बिना विचार-विमर्श के फैसले के बाद से, इस पूरी अवधि में प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए जो चार बैठकें की हैं (Prime Minister has held four meetings with Chief Ministers via video conferencing), उनका अनुभव राज्यों की मांगों तथा सुझावों को अनसुना करने की ही गवाही देता है। उल्टे आपदा कानून के अंतर्गत केंद्र के निर्णय के अधिकारों की आड़ में, लॉकडॉउन के दूसरे चरण के पहले हफ्ते के बाद, अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले क्षेत्रों के लिए सीमित छूटों के संबंध में भी, देश भर पर जिस तरह यांत्रिक तरीके से एक जैसे फैसले थोपे हैं, उसने लड़ाई को आगे ले जाने के रास्ते में मुश्किलें ही पैदा की हैं। मिसाल के तौर पर केरल में, जहां देश भर में सबसे बेहतर तरीके से कोरोना वाइरस के संक्रमण पर अंकुश लगाया गया है, राज्य सरकार को ऐसी कई रियायतें देने से रोका गया, जो उसके विचार में संक्रमण के खतरे पर अंकुश रखते हुए, एक हद तक छोटे पैमाने की आर्थिक गतिविधियां बहाल करने में मददगार हो सकती थीं। दूसरी ओर दिल्ली को, जहां संक्रमण तेजी से फैल रहा था, दूकानों आदि के संबंध में ऐसी रियायतें देने के लिए मजबूर किया गया, जो दिल्ली सरकार के ख्याल में संक्रमण की गति को और बढ़ा सकती हैं। हद तो यह है कि इसके लिए बाकायदा गृहमंत्रालय से आदेश जारी किया गया है कि आपदा कानून के तहत, राज्यों को उसके आदेशों का अक्षरश: पालन करना होगा। इतना ही नहीं, इकतरफा तरीके से कथित इंस्पैक्शन टीमें भेजकर, मोदी-शाह जोड़ी ने बंगाल समेत कुछ राज्यों से अनावश्यक टकराव की स्थिति पैदा कर दी है।

जनविरोधी रणनीति | Anti-people strategy

बहरहाल, इस सबसे भी बढ़कर कोरोना वाइरस के खिलाफ भारत की लड़ार्ई को कमजोर कर रही है मोदी सरकार की इस लड़ाई की बुनियादी रणनीति। मोदी सरकार सिर्फ और सिर्फ लॉकडॉउन के हथियार से यह लड़ाई लडऩा चाहती है। और इस लॉकडॉउन का पालन भी वह मूलत: कानून और व्यवस्था के  तकाजे के तौर पर और सबसे बढ़कर, पुलिस के डंडे तथा बलपूर्वक थोपे जा रहे प्रतिबंधों के जरिए, कराना चाहती है। इसका नतीजा यह है कि लॉकडॉउन की मदद से, संक्रमण के फैलाव की तेजी को कम करने के जरिए जो समय मिला है, उसका टैस्टिंग से लेकर उपचार तक की सामथ्र्य बढ़ाने के लिए जिस तरह उपयोग किया जाना चाहिए था, उसमें भारत पिछड़ता नजर आ रहा है। टैस्टिंग किट घोटाला इसी का एक संकेतक है, जिससे टैस्टिंग तेजी से बढऩे की उम्मीदों पर कम से कम फिलहाल पानी फिर गया है।

इसी का एक और संकेतक, खुद केंद्र की शीर्ष नौकरशाहों के स्तर की बैठक रेखांकित हुई यह सचाई है कि लॉकडॉउन के पूरे एक महीने बाद, 23 अप्रैल तक देश के 183 जिलों में कोविड मरीजों के लिए 100 आइसोलेशन बैड भी नहीं थे, जबकि इनमें से कम से कम 67 जिलों में इस वाइरस के संक्रमण के केस आ चुके थे। इसी प्रकार, 143 जिलों में गंभीर मरीजों के लिए एक भी आइसीयू बैड नहीं था, जबकि इनमें से 47 जिलों में संक्रमण के केस आ चुके थे। इसी प्रकार,123 जिलों में वेंटीलेटर की सुविधा वाला एक भी बैड नहीं था, जबकि इनमें से 39 जिलों में कोरोना संक्रमण के केस (Corona infection cases) आ चुके हैं। यानी इन जिलों में कोरोना के गंभीर मरीज तो पूरी तरह से भगवान के ही भरोसे हैं।

A welcome initiative from Rahul Gandhi

 

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

इस सब के चलते, लॉकडॉउन का जो कुछ भी लाभ मिल सकता था, हाथ से निकलता जा रहा है। लेकिन, मोदी सरकार ने चूंकि इस लॉकडॉउन से गरीब मजदूरों-किसानों पर पड़ रही मार की चिंता से खुद को मुक्त ही कर लिया है और गरीबों को उनके हाल पर तथा दानदाताओं के ही भरोसे छोड़ दिया है, उसे लॉकडॉउन जारी रखना ही आसान और सस्ता उपाय लग रहा है। आखिर, उसे लॉकडॉउन के चलते अपनी आजीविका से लेकर, शहरों में छत तक गंवा चुके और भुखमरी के कगार पर पहुंच गए मजदूरों के लिए कुछ करना तो है नहीं, सिवा भाषणों में उनकी चिंता का स्वांग करने के। अचरज नहीं होगा कि मोदी सरकार, सारी दुनिया में (जीडीपी के हिस्से के तौर पर) सबसे कम खर्चे में मुकम्मल लॉकडॉउन कराने वाली सरकार का रिकार्ड बना ले। ऐसे में 3 मई के बाद, कुछ बदलावों के साथ लॉकडॉउन-3 लगा दिया गया है। मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की ताजा बैठक के संकेत तो ऐसे ही हैं। यह मजदूरों की हालत और खराब कर, कोरोना के खिलाफ देश की लड़ाई को और कमजोर करने का ही काम करेगा।

0 राजेंद्र शर्मा

 

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें