रवि किरण जैन ने कहा जस्टिस सुधीर अग्रवाल कोरोना महामारी से निपटने में सहायता के लिए अपनी जेड प्लस सुरक्षा छोड़ें

Ravi Kiran Jain a senior advocate of the Allahbad High Court

Ravi Kiran Jain said Justice Sudhir Aggarwal give up his Z Plus security to help deal with Corona epidemic

वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रवि किरण जैन का बार के नाम खुला खत

Senior advocate Mr. Ravi Kiran Jain’s open letter to the bar

लखनऊ, 22 अप्रैल 2020 : उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रवि किरण जैन (Senior Advocate of High Court and National President of Human Rights Organization PUCL, Mr. Ravi Kiran Jain) ने एक हाई कोर्ट बार के नाम एक खुला पत्र जारी करके न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल द्वारा जारी किये गए उस पत्र का जवाब दिया है और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है जिसमें न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल (Justice Mr. Sudhir Aggarwal) द्वारा कोरोना महामारी से निपटने में सहायता करने हेतु सभी न्यायमूर्तियों को अपने वेतन और पेंशन का दस व पाँच फीसदी दान देने को कहा है और एडवोकेट एक्ट के तहत चयनित सभी वरिष्ठ अधिवक्ताओं को प्रति माह पचास हज़ार रुपये अंश दान करने को कहा है ।

श्री अग्रवाल ने यह पत्र माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय के साथ हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, एडवोकेट एसोसिएशन व अवध बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को भेजा है ।

श्री रवि किरण जैन ने कहा है कि 23 अप्रैल को रिटायर होने वाले जस्टिस अग्रवाल को सबसे पहले शासन को पत्र लिख कर अपने साथ लगी जेड प्लस सुरक्षा को वापस कर लेने का अनुरोध करना चाहिए जिसका  सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या मामले में दिये गए निर्णय के बाद कोई औचित्य नही है ।  जेड प्लस स्तर की सुरक्षा हट जाने से कर दाताओं के जेब से जमा बहुत बड़ी धन राशि की बचत होगी ।

श्री जैन ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अंश दान को लेकर एक बहुत ज्वलंत सवाल उठाया है जिससे पूरा हाई कोर्ट प्रभावित और पीड़ित है।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के गिरावट के इस दौर में माननीय न्यायमूर्तियों के सन्तानों और निकट सम्बन्धियो का एक ऐसा सक्रिय समूह स्थापित हो गया है जिन्हें वरिष्ठ अधिवक्ताओं की जगह  मनमाफिक आदेश पाने की इच्छा में वादकारी अपना अधिवक्ता नियुक्त कर रहा है।

प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ श्री सिरवाई ने बहुत पहले संविधान सम्बंधित अपनी पुस्तक में इस खतरे की तरफ आगाह किया था  और लिखा था कि एक जज का पुत्र अपने पिता के कोर्ट में बहस नहीं कर सकता पर कई जज एक दूसरे के सन्तानों और सगे सम्बन्धियों को लाभ पहुँचा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में प्रसिद्ध जज नियुक्ति केस में भी यह सवाल उठा था कि उच्च न्यायालयों में जजों ने एक तरह का कॉपरेटिव सोसाइटी बना लिया है जिससे एक दूसरे के सन्तानों की हितरक्षा किया जाता है। इस प्रवृत्ति से न्यायपालिका के स्तर में बहुत गिरावट आई है।

आज स्थिति और भी दयनीय और शोचनीय हो गई है। आज वरिष्ठ अधिवक्ताओं की जगह न्यायमूर्तियों की सन्तानों और सगे सम्बन्धियों को वरीयता मिल रही है ।

श्री जैन ने कहा कि यह वरिष्ठ अधिवक्ताओं कि अपनी जिम्मेदारी है कि वे अपने विवेक से इस आपदा में धन से सहयोग करें। जस्टिस अग्रवाल को यह पत्र वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नहीं लिखना चाहिए।

श्री रवि किरण जैन ने इस पत्र की प्रतियां माननीय चीफ जस्टिस और जस्टिस सुधीर अग्रवाल को भी अग्रसारित किया है।

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