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कवि बोले, मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा

कवि बोले, मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा

Reaction on Facebook on Hyderabad encounter

नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2019. हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के आरोपियों की एनकाउंटर में हत्या पर सवाल भी उठना शुरू हो गए हैं। सवाल कानूनी और नैतिक दोनों हैं।

बता दें कि शुक्रवार की सुबह खबर मिली थी कि तेलंगाना पुलिस ने हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या की शिकार हुई पशु चिकित्सक के सभी आरोपियों की उसी स्थान पर गोली मारकर हत्या कर दी, जहां उनकी बेटी की 27 नवंबर को सामूहिक दुष्कर्म व हत्या करने के बाद उसके शव को जला दिया गया था।

इस पर प्रतिक्रियास्वरूप अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट (Ashok Kumar Pandey Facebook) में लिखा,

”कठुआ कांड के बाद विरोध प्रदर्शन चल रहा था। सीपी पर प्रदर्शन के बाद हम पुरानी दिल्ली गए। जामा मस्जिद से जुलूस निकलना था। शुरू हुआ। नारे लगने लगे – फाँसी दो, फाँसी दो। मैं चुपचाप निकल आया।

फाँसी गोली माँगती भीड़ मुझे वहशी लगती है। मुझे जूलियस सीज़र का वह दृश्य याद आता है जब भीड़ एक कवि को इसलिए मार देती है कि उसका नाम एक षड्यंत्रकारी का नाम भी था। मैंने कश्मीर ही नहीं दुनिया भर का मध्यकाल पढ़ा है। आँखें निकलवाने, ज़िंदा जला देने, लाश में भूसा भरवा देने और सर चौराहे पर टाँग देने की भयावह और वीभत्स घटनाएँ पढ़ी हैं। मुझे लगता रहा है कि वह वक़्त बीत गया।

लेकिन हत्यारों, बलात्कारियों और अपराधियों ने बार-बार याद दिलाया है कि वह वहशीपना है कहीं न कहीं। उनके लिए सज़ा ज़रूरी है। संविधान ने सिखाया कि सज़ा मतलब बदला नहीं होता।

लेकिन जब ऐसी भीड़ देखता हूँ, फाँसी-फाँसी चिल्लाती, हत्याओं का जश्न मनाती तो लगता है वह वहशीपना सिर्फ़ अपराधियों में नहीं। लगता है यह जो भीड़ है वह उतनी ही वहशी है। इनमें ही छिपे हैं वे लोग जो गर्भ में बेटियों को मार देते हैं। जो किसी पाकेटमार को पीट-पीट कर मार डालते हैं। जो किसी के घर में बीफ़ होने का आरोप लगाकर मार डालते हैं। सोशल पोज़िशनिंग यह करने की इजाज़त न भी दे तो उसे न्यायसंगत ठहराते हैं।

आप मान लीजिए कि कठुआ पर मेरा कन्सर्न फाँसी-फाँसी चिल्लाने वालों से कम था या आज इनकाउंटर का जश्न मना रहे लोगों से कम दुखी था मैं हैदराबाद की घटना के लिए लेकिन मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा। मैं बदला-बदला चीख़ते हुए मध्यकाल में नहीं जा सकता।

मैं अकेले होने पर भी न्याय -न्याय चीख़ता रहूँगा। कोई मेरी हत्या कर दे तो भी मैं उसके लिए फाँसी नहीं चाहूँगा।“

सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भी ट्वीट कर इस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया है।

लखनऊ की सोशल एक्टिविस्ट सदफ जफर ने फेसबुक (Sadaf Jafar Facebook) पर लिखा,

“सुना है एनकाउंटर करने वाले बहादुर पुलिसकर्मियों पर पुष्पवर्षा की गई…

क्या उनमें वो पुलिस वाले भी शामिल हैं जिन्होंने पीड़िता के परिवार से कहा था कि तुम्हारी लड़की किसी से साथ भाग गई होगी, खुद आ जायेगी।

नहीं पुष्पवर्षा नहीं ये इंसाफ को पुष्पांजलि अर्पित की जा रही है।

#Justice_RIP”

वरिष्ठ पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य ने फेसबुक (Ujjwal Bhattacharya Facebook) पर लिखा,

“बलात्कारी बलात्कार करते हैं, पुलिस एनकाउंटर करती है.

लेकिन मुझे सबसे ज़्यादा चिन्ता मध्यवर्ग के उल्लास से है.”

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