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भारत में हाल ही में हुए चुनाव : मीडिया पर क्यों नाराज हुए जस्टिस काटजू?

भारत में हाल ही में हुए चुनाव : मीडिया पर क्यों नाराज हुए जस्टिस काटजू?

हाल ही में भारत में हुए चुनावों–गुजरात और हिमाचल प्रदेश में राज्य विधानसभा चुनावों और दिल्ली में नगर निगम चुनावों– को लेकर जनता में बहुत उत्साह है। भारतीय मीडिया टीवी और प्रिंट दोनों ने इसे व्यापक रूप से कवर किया है ( और इसके सिवा संभवतः और कुछ नहीं कवर किया ) I

गुजरात में अपनी पार्टी की रिकॉर्ड तोड़ जीत पर भाजपा समर्थकों में, कांग्रेस समर्थकों द्वारा हिमाचल प्रदेश में अपनी पार्टी की तख़्ता पलट जीत पर (जो सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को सत्ता से हटाती है), और आम आदमी पार्टी के समर्थकों द्वारा उनकी पार्टी द्वारा पहली बार एमसीडी में बहुमत हासिल करने पर, अब तो खूब धूमधाम और शोर शराबा मचा हुआ है।

भारतीय मीडिया, खासकर टीवी चैनल, पिछले 2 दिनों से केवल इन घटनाओं पर चर्चा कर रहे हैं, जैसे कि भारत में और कुछ भी मायने नहीं रखता।

मेरे विचार से यह सब धूमधाम, हो-हल्ला और शोर शराबा मूर्खतापूर्ण है, और भारतीय जनता की मूर्खता को प्रकट करता है, साथ ही हमारे बड़े पैमाने पर बिके हुए मीडिया की जानबूझकर बड़े पैमाने पर वास्तविक, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को दरकिनार करने और भारत की जनता का ध्यान तुच्छताओं, अप्रासंगिकता और नगण्य मुद्दों की ओर मोड़ने की नीति है।

कृपया समझें।

प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था या क्रियाकलाप की कसौटी एक और केवल एक ही होती है: क्या वह लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाती है? क्या यह उन्हें बेहतर जीवन दिलाती है ? इस दृष्टिकोण से क्या गुजरात में भाजपा की जीत, हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत, और दिल्ली नगर निगम में आप की जीत, जनता के लिए मायने रखती है? बिल्कुल भी नहीं। वे जनता के लिए महत्वहीन और अप्रासंगिक हैं।

जनता के वास्तविक मुद्दे व्यापक गरीबी, भुखमरी, ( ग्लोबल हंगर इंडेक्स द्वारा सर्वेक्षण किए गए 121 देशों में भारत 101 से 107 वें स्थान पर फिसल गया है), बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, आसमान छूती कीमतों में वृद्धि,  जनता के लिए उचित स्वास्थ्य सेवा तथा अच्छी शिक्षा का अभाव,  व्यापक भ्रष्टाचार, आदि, हैं,  और यह बेरोकटोक जारी रहेंगे। हाल के चुनावों के नतीजों से जनता पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

हिन्दी में एक कहावत है ”कोई नृप होए, हमें का हानि” अर्थात ”इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है कि राजा कौन होगा?” ”

और फिर भी हमारा मीडिया दिन-ब-दिन इसके अलावा और कुछ नहीं चर्चा कर रहा है। इससे पता चलता है कि हमारा मीडिया जनता का ध्यान असल मुद्दों जो सामाजिक-आर्थिक हैं, से ध्यान हटाने और गैर-मुद्दों और तुच्छ मुद्दों, जैसे चुनाव आदि, की तरफ मोड़ने का एक उपकरण मात्र है।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

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