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जलवायु परिवर्तन और कोरोना वायरस : पीने को पानी नहीं, हाथ कहां से धोएं

World Water Day is celebrated on 22 March.

22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 से बचने के लिए हाथ धोना को सबसे बुनियादी एहतियाती कदम बताया है। लेकिन दुनिया भर में लगभग 3 बिलियन लोगों को हाथ धोने की बुनियादी सुविधा तक की कमी है और 2.2 और 4.2 बिलियन लोगों को क्रमशः पानी और स्वच्छता सेवाओं की उपलब्धता नहीं है। ऐसे में जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस कहर बनकर भरा है, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और स्वच्छ ऊर्जा के मुद्दों पर सार्वजनिक समझ और प्रवचन के निर्माण पर केंद्रित एक दिल्ली स्थित कम्युनिकेशन स्ट्रेटजी संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) ने वैश्विक पैमाने पर जल की समस्या का विश्लेषण (Water problem analysis) करते हुए एक फैक्ट शीट जारी करते हुए दुनिया भर की सरकारों से कोविड-19 के मद्देनजर पानी को लेकर लचीली नीतियां (Flexible policies on water in view of Covid-19) बनाने और बुनियादी ढांचे को विकसित करने का आग्रह किया है।

वर्ष 2019 तक उपलब्ध डेटा के अनुसार 17 देश बेहद उच्च जल तनाव का सामना कर रहे थे, जिनमें से 12 देश मध्य पूर्व और अफ्रीका के थे, जिनमें दुनिया की एक-चौथाई आबादी रहती है। भारत इस सूची में तेरहवें स्थान पर है, लेकिन यहां अन्य पानी की कमी वाले देशों की आबादी की तुलना में तीन गुना आबादी रहती है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की प्रबंध निदेशिका आरती खोसला के मुताबिक जलवायु परिवर्तन जल संसाधनों पर दबाव को बढ़ाता रहेगा क्योंकि बढ़ते तापमान से सूखे की स्थिति पैदा होगी, मरुस्थलीकरण और हिमनद पिघलेंगे, जिससे मीठे पानी के महत्वपूर्ण स्रोत प्रभावित होंगे।

वह कहती हैं कि  2013 के एक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि जीवाश्म ईंधन संचालित ऊर्जा क्षेत्र में अनुमानित 22.7 बिलियन क्यूबिक मीटर मीठे पानी का उपयोग जारी है, जो 1.2 बिलियन लोगों की सबसे बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकता था।

फैक्ट सीट के मुताबिक दक्षिण एशिया के लिए, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में, जिसमें 86 मिलियन भारतीय शामिल हैं, ग्लेशियर 240 मिलियन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण जलापूर्ति का स्रोत हैं। यदि उत्सर्जन में गिरावट नहीं होती है, तो हिंदू कुश हिमालय में दो तिहाई ग्लेशियर सूख जाएंगे, जो पानी की सुरक्षा को प्रभावित करेंगे।

हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के 13 शहरों को कवर करने वाले एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि अपर्याप्त शहरी नियोजन और तेजी से जलवायु परिवर्तन के कारण उनके पानी के जोखिम में वृद्धि हुई है।

यह अनुमान है कि मरुस्थलीकरण से प्रत्यक्ष रूप से 250 मिलियन लोग प्रभावित हो रहे हैं, जबकि 1 बिलियन लोग अप्रत्यक्ष रूप से और 3 बिलियन हेक्टेयर शुष्क भूमि के नीचे से गुजर रहे हैं। हालांकि वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने से शुष्कता के उद्भव को सीमित किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन और कोरोना वायरस का संबंध | Relation of climate change and corona virus

जलवायु परिवर्तन से पहले से ही हमारे बर्फीले क्षेत्रों का भारी नुकसान हुआ है, जो खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। जैसे-जैसे ये क्षेत्र पिघलते रहेंगे, पानी की आपूर्ति कुल मिलाकर कम होती जाएगी। पिघलने वाले ग्लेशियर भी पानी की गुणवत्ता में कमी करेंगे, मानवजनित प्रदूषकों के उत्सर्जन में तेजी लाएंगे और पानी की आपूर्ति में विषाक्त भारी धातुओं को ला सकते हैं।

Shortage of water in times of Covid 19 & what it means

आईपीसीसी की महासागरों और क्रायोस्फीयर पर रिपोर्ट के लीड लेखक डॉ. अंजल प्रकाश के मुताबिक,

अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।

  “COVID-19 के वैश्विक मानचित्र से पता चलता है कि यह धीरे-धीरे वैश्विक दक्षिण के देशों में फैल रहा है। हम जानते हैं कि इन देशों में संकट से निपटने के लिए पानी, सैनिटोन और हाइजीन (वाश) और अपर्याप्त स्वास्थ्य बुनियादी सुविधाओं की कमी है। सौभाग्य से, पीने के पानी में COVID -19 वायरस का पता नहीं चला है। पारंपरिक जल उपचार पद्धतियां COVID-19 का कारण बनने वाले वायरस को निकाल सकती हैं या निष्क्रिय कर सकती हैं। हालांकि, वायरस को फैलने से रोकने के लिए सैनिटाइजेशन और स्वच्छता पहलुओं पर बहुत जोर दिया गया है। दुनिया भर में लगभग 3 बिलियन लोगों को बुनियादी हैंडवाशिंग फैसिलिटी की कमी है और ये लोग अधिक जोखिम में हैं। कोरोना संकट इस तथ्य को उजागर करता है कि विश्व स्तर पर, हम सबसे कमजोर कड़ी के रूप में आगे हैं। जब कोविड-19 का खतरा टल जाएगा तब हमें सारी दुनिया के लोगों के लिए हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य करना होगा।“

अमलेन्दु उपाध्याय

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पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

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पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की …